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Thursday, July 9, 2026, 5:55 am

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राइजिंग भास्कर 4th एनिवर्सरी काव्य धारा-6 : कवयित्री : पूजा अग्रवाल

कवयित्री : पूजा अग्रवाल

परिचय  (पूजा अग्रवाल। चर्चित कवयित्री। प्रकाशित कृति – यादों का मौसम। प्रकाशनाधीन : 1 सोचा ना था राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा चयनित, 2 दरमियां तेरे मेरे (लघुकविता संग्रह ), लेखन विधाएं : कविता, गीत, ग़ज़ल, दोहे तथा कहानी, शोध पत्र : 1 विभिन्न साहित्य लेखन शैलियों में AI का प्रयोग एक विश्लेषणात्मक अध्ययन, 2 राष्ट्रीय एकात्मकता चुनौतियां एवं समाधान, अन्य: – आकाशवाणी केंद्र जोधपुर तथा चैनल 24 द्वारा रचनाओं का प्रसारण, देश के अनेक मंचों पर काव्य पाठ एवं सम्मान। सम्प्रति: असिस्टेंट प्रोफेसर। पता: शिव मंदिर, शंकर नगर, जोधपुर राज.)

नई शुरुआत

कभी-कभी सब कुछ
खत्म होना बेहद
ज़रूरी हो जाता है
चाहे फिर वो कोई रिश्ता हो,
जज़्बात हो या विश्वास

आधे – अधूरे सपने
ख़्वाहिशें, रिश्ते
सब बेमानी हैं
हकीकत के धरातल पर
नहीं उतर पाते जो खरे

घसीटते रहना उन्हें
सालता है ताउम्र मन को
इसलिए कभी- कभी
बेहद जरुरी है
सब खत्म होना
एक नई शुरुआत के लिए

000

मनी प्लांट सी मैं

मैं मनी प्लांट की बेल सी
कोमल, नाजुक, सुंदर
भर दूंगी तुम्हारे जीवन को
खुशियों से
कर दूंगी स्वच्छ
तुम्हारे आस-पास के वातावर‌ण को
पर मैं तीखे शब्दों की धूप
ना सह सकूँगी
मुझे नहीं चाहिए कुछ भी ज्यादा
बस प्रेम और जज्बातों की
गुनगुनी गमर्माहट ही काफी हैं मेरे लिए
सौम्य शांत वातावरण है प्रिय मुझे
मिला सहारा तो लिपट कर
बढ़ती रहूंगी ऊपर की ओर
नहीं तो मोड़ लूँगी राह अपनी

मै सहारे की मोहताज नहीं
मेरा हर पत्ता मेरे अस्तित्व से जुड़ा है
मुझसे अलग होकर भी मेरा हिस्सा
मुझे नए सिरे से करता है विस्तृत
क्यूँ कि
सीख लिया है टूट कर
एक नई शुरुआत करना मैंने

000

शब्द मरते नहीं

सहेज कर रखना तुम
मुझको और मेरी यादों को
अपने शब्दोंं में
मेरा रंग -रूप वक़्त के साथ
फीका पड़ता जाएगा
एक दिन मैं भी ढल जाऊँगी
गुजरे वक्त सी
परंतु तुम्हारे शब्द
सालों- साल , सदियों तक
अमर रहेंगे और
कहीं ना कहीं मैं भी
रहूँगी जिंदा तुम्हारे उन
शब्दों और कविताओं में
जो शायद तुम
चाहते थे मुझे सुनाना
क्यों कि
शब्द मरते नहीं हैं l

000

ख्वाहिशों के बीज

मन की बंजर
जमीन पर
बोये हैं
ख्वाहिशों के बीज मैंने
के कभी थक कर
ठहर जाऊँ या के
मै मान लूँ हार
या के
पहुँच ना पाऊँ
तुम तक
तो कम से कम
मन्शाओं की बेल
के सहारे पा सकूँ
सान्निध्य तुम्हारा।
000

सब कुछ 

तुम जानते हो
मैनें क्या खोया है
अपना
हँसना-रोना
अल्हड़पन, बचपन,
लड़ना – झगड़ना
रूठना- मनाना
स्नेहिल डाँट -फटकार
शिकवे – शिकायतें
देखभाल, परवाह
निस्वार्थ प्रेम ,ममता
समर्पण ,धैर्य,शक्ति,
गुरु, पथ- प्रर्दशक
अपना सब कुछ
एक शब्द में कहूँ तो …..
माँ।

000

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor