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Sunday, August 23, 2026, 6:33 am

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राइजिंग भास्कर 4th एनिवर्सरी काव्य धारा-7: कवि : अशफाक अहमद ‘फौजदार’

कवि : अशफाक अहमद ‘फौजदार’

परिचय ( अशफाक अहमद उपनाम फौजदार। पिताजी का नाम स्व कामरेड अशरफ़ फौजदार, स्वतंत्रता सेनानी। माताजी का नाम स्व बेगम बतूल। जन्म 14 सितंबर 1953, शिक्षा- बीए, अभिरुचि पठन पाठन। लेखन विभिन्न विधाओं में। बयान और अन्य किताबों में रचनाएं प्रकाशित। 7 भाषाओं हिंदी, उर्दू, सिंधी, गुजराती, बंगाली, पंजाबी व अंग्रेजी का ज्ञान।)

दिये सा जलता हूं…

सपने देखा करता हूं।
गोया आशिक जैसा हूं।।

ग़म की आग में जलकर ही।
कुन्दन बन कर निकला हूं।।

रोशन हो जाये दुनिया।
यार दिये सा जलता हूं।।

कोई ठोकर ना खाए।
दीपक रोशन करता हूं।।

बच्चे आराम से गुजरेंगे।
राह के कंकड़ चुनता हूं।।

लोग सभी खुश हो जाये।
मैं अच्छी बातें करता हूं।।

मैं भी कह दूं अच्छा शायद।
मीर ओ ग़ालिब को पढ़ता हूं।।

000

हौसला हमारा है…

हां इश्क तो हमारा है।
पर गम भी प्यारा है।

दिल ही तो हमारा है।
पर ईश्क तुम्हारा है।

तूंफा तो तुम्हारा है।
पर हौसला हमारा है।

चाहे तोे वस्ल हो न हो।
पर वादा ग्वारा है।

वे गुनगुना रही गजल।
क्या ही खूब नज़ारा है।

तुम चाहे जुल्म करलो।
सब्र का ही सहारा है।

जालिम तुम पछताओगे।
ये तर्जबा हमारा है।

ये है उन का ही करम ।
गम से तो किनारा है।

खिड़की खोली नहीं।
अँधेरा क्योँ ग्वारा है।

कोशिश की ही नहीं।
तारों का सहारा है।

000

अपना लहजा बदला…

बच्चों का कितना बस्ता बदला।
बचपन में कितना बच्चा बदला।

जब वे मेरी जिंदगी में आई तो।
मेरे घर का भी तो नक्शा बदला।।

मैं कब तक सुनता कड़वी बातें।
मैं ने भी अपना लहज़ा बदला।।

सब तो गुम हैं दौलत को पाने में।
सब ने अपना तौर तरीका बदला।।

जाने कितनी मिन्नतें की मां बाप ने।
तब औलाद ने उनका चश्मा बदला।।

दुनियां वालों कुर्सी की खातिर तो।
रहज़न ने रहबर सा हुलिया बदला।।

मैं यार गरीबी के दौर से गुजरा तो।
अशफाक लोगों ने रास्ता बदला।।

000

सब खुश हो, कुछ तो कर…

कुछ तो कह।
चुप मत रह।

इश्क में तो।
कुछ गम सह।

सच बोले तो।
तन्हां तन्हां रह।

खुद खत्म हो।
दरया सा वह।

सागर में सब।
मिल कर रह।

वे मिल जाए।
दिल खुश हो।

दिल वाये जन्नत।
खिदमत ए मां।

सब खुश हो।
कुछ तो कर।

000

कड़वा सच

सच लगे तो सह लेना।
झूठ लगे तो बता देना।।

सच हमेशा कड़वा होता है।
तुम सब को ये समझा देना।

लोगों सिद्धांतों का क्या है।
पल में पाला बदल लेना।।

गर घर में शांति चाहते हो।
पत्नि की हाँ मे हाँ मिला देना।

राजकोष पर हक गरीबों का है।
उनको तो वादों से ही बहला देना।

बाहर वाली के उपहार अपनी जगह।
घरवाली को सूती साड़ी दिलवा देना।

गरीब की थाली से दाल गायब है।
आप महँगाई बराबर बढाते रहना।

अन्तिम सत्ता तो प्रजा के हाथ।
प्रजातंत्र की बात समझाते रहना।।

गर कोई भी कारस्तानी करे तो।
उसको अच्छा सबक सिखा देना।।

अशफाक की बातें कड़वी जरुर हैं ।
गर यह सच्ची लगे ताली बजा देना।।

000

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor