भारत विकास परिषद का “परिंडा अभियान” बना संवेदना, संस्कृति और सह-अस्तित्व का संदेश
RAC ट्रेनिंग सेंटर में लगाए गए 25 परिंडे, भीषण गर्मी में पंछियों को मिलेगा जीवनदान
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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जोधपुर की तपती दोपहर… आसमान से उतरती आग… धरती पर तमतमाती गर्म हवाएं… और इन सबके बीच किसी पेड़ की सूखी डाल पर बैठा एक प्यासा पक्षी। उसकी आंखों में पानी की तलाश है, उसके पंखों में थकान है और उसकी चहचहाहट मानो इंसान से करुणा की पुकार कर रही हो। ऐसे कठिन समय में यदि कोई व्यक्ति एक छोटे से परिंडे में जल भर देता है, तो वह केवल पानी नहीं रखता, बल्कि जीवन बचाने की साधना करता है।
इसी जीवन-संवेदना को साकार रूप देते हुए भारत विकास परिषद, जोधपुर मुख्य शाखा द्वारा मंगलवार, 19 मई 2026 को मंडोर रोड स्थित R.A.C. ट्रेनिंग सेंटर में 25 परिंडे लगाए गए। यह अभियान केवल एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि प्रकृति, पक्षियों और मानवता के बीच टूटते रिश्तों को पुनः जोड़ने का एक भावनात्मक प्रयास बन गया।
कार्यक्रम IPS कमांडेंट पंकज यादव के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर प्रथम बटालियन RAC के डिप्टी कमांडेंट राजीव परिहार, सहायक कमांडेंट बुद्धाराम, नरेंद्र कुमार पारीक सहित अनेक अधिकारियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। सभी ने इस पहल को समय की आवश्यकता बताते हुए कहा कि भीषण गर्मी में पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करना केवल सेवा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।
“परिंडा” केवल मिट्टी का पात्र नहीं, जीवन की करुणा का प्रतीक
राजस्थान की संस्कृति में “परिंडा” कोई नया शब्द नहीं है। गांवों की चौपालों, घरों की छतों और पेड़ों की डालियों पर वर्षों से पानी से भरे परिंडे मानव और प्रकृति के प्रेम का प्रतीक रहे हैं। जब आधुनिकता की दौड़ में इंसान कंक्रीट के जंगल खड़े कर रहा है, तब पक्षियों के लिए जल और आश्रय की कमी लगातार बढ़ती जा रही है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि गर्मियों में तापमान 45 डिग्री से ऊपर पहुंचने पर पक्षियों के लिए पानी खोजना अत्यंत कठिन हो जाता है। कई पक्षी निर्जलीकरण के कारण दम तोड़ देते हैं। ऐसे में एक छोटा-सा परिंडा अनेक पंखों को जीवन दे सकता है। भारत विकास परिषद के अध्यक्ष सुरेशचंद्र भूतड़ा और पर्यावरण संयोजक नीरज मूंदड़ा ने कहा कि “परिंडा अभियान” केवल पक्षियों के लिए पानी रखने की औपचारिकता नहीं, बल्कि संवेदना का संस्कार है। यह हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी केवल मनुष्यों की नहीं, बल्कि हर जीव की साझी धरोहर है।
भारतीय संस्कृति में जीव दया को मिला सर्वोच्च स्थान
भारतीय संस्कृति और हिंदू शास्त्रों में जीव मात्र के प्रति करुणा को धर्म का मूल माना गया है। वेदों, उपनिषदों, पुराणों और संत साहित्य में बार-बार यह संदेश मिलता है कि प्रकृति और प्राणियों की रक्षा ही सच्चा धर्म है।
ऋग्वेद में समस्त जीवों के कल्याण की कामना की गई है। वहीं महाभारत में कहा गया है कि “अहिंसा परमो धर्मः” अर्थात अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है। यह अहिंसा केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि हर जीव के प्रति दया और संरक्षण का भाव रखती है। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में गायों, बछड़ों और पक्षियों के प्रति प्रेम का विशेष वर्णन मिलता है। संत कबीर ने कहा था—“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय, मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए।” इस दोहे की भावना केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि हर प्राणी के प्रति साझा जीवन दृष्टि को दर्शाती है।
जैन और बौद्ध दर्शन में तो जीव दया को साधना का आधार माना गया है। महावीर स्वामी ने प्रत्येक जीव में आत्मा का निवास बताया। वहीं गौतम बुद्ध ने करुणा को मानव जीवन का सबसे बड़ा गुण कहा।
संतों और महापुरुषों ने भी दिया प्रकृति संरक्षण का संदेश
भारतीय संत परंपरा में अनेक संतों और महापुरुषों ने पक्षियों और प्रकृति के प्रति दया का संदेश दिया। संत जंभेश्वर जी महाराज, जिनकी शिक्षाओं पर आधारित बिश्नोई समाज आज भी वन्य जीवों और पक्षियों की रक्षा के लिए समर्पित है, उन्होंने प्रकृति संरक्षण को धर्म का अंग बनाया।
राजस्थान की धरती पर अमृता देवी बिश्नोई और खेजड़ली बलिदान की गाथा आज भी पर्यावरण संरक्षण का विश्व प्रसिद्ध उदाहरण है। वहां पेड़ों और जीवों की रक्षा के लिए 363 लोगों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे।
महात्मा गांधी ने कहा था कि “किसी राष्ट्र की महानता और उसकी नैतिक प्रगति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां जानवरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।”
स्वामी विवेकानंद ने भी प्रकृति और जीवों के प्रति दया को मानवता का आधार बताया था। यही कारण है कि भारतीय समाज में गर्मियों के दिनों में पक्षियों के लिए जल रखना पुण्य कार्य माना जाता रहा है।
भीषण गर्मी में जीवन बचाने जैसा है यह अभियान
जोधपुर सहित पूरे राजस्थान में इन दिनों भीषण गर्मी का दौर चल रहा है। दोपहर में सड़कें तपने लगती हैं और पेड़ों की छांव भी गर्म महसूस होती है। ऐसे समय में छोटे पक्षियों के लिए पानी मिलना अत्यंत कठिन हो जाता है।विशेषज्ञ बताते हैं कि गौरैया, कबूतर, मैना, बुलबुल और अन्य छोटे पक्षी पानी की कमी के कारण तेजी से प्रभावित होते हैं। शहरीकरण के कारण पुराने पेड़ कम हो रहे हैं और छतों पर पानी रखने की परंपरा भी घटती जा रही है।
भारत विकास परिषद द्वारा लगाया गया यह “परिंडा अभियान” इसलिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह समाज को केवल संदेश नहीं देता, बल्कि व्यवहारिक रूप से प्रेरित भी करता है।
समाज को संवेदनशील बनाने की जरूरत
कार्यक्रम में परिषद के अध्यक्ष सुरेश चंद्र भूतड़ा, सचिव राजेंद्र कुमार मंत्री, सेवा संयोजक सीताराम राठी और परिंडा प्रभारी श्याम सुंदर धूत ने लोगों से अपील की कि वे अपने घरों, छतों, बालकनी और आसपास के पेड़ों पर परिंडे लगाएं।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता केवल तकनीकी विकास की नहीं, बल्कि भावनात्मक विकास की भी है। यदि इंसान प्रकृति और जीवों के प्रति संवेदनशील नहीं रहेगा, तो पर्यावरण संतुलन लगातार बिगड़ता जाएगा।
परिषद पदाधिकारियों ने कहा कि पक्षियों का कलरव केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं, बल्कि पर्यावरण संतुलन का संकेत भी है। यदि पक्षी कम होंगे तो प्रकृति का संतुलन भी प्रभावित होगा।
नई पीढ़ी को भी देना होगा प्रकृति प्रेम का संस्कार
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को बचपन से ही जीव दया और पर्यावरण संरक्षण के संस्कार दिए जाने चाहिए। यदि बच्चे अपने घर की छत पर पक्षियों के लिए पानी रखते हैं, तो उनमें संवेदनशीलता और जिम्मेदारी दोनों विकसित होती हैं। आज मोबाइल और डिजिटल दुनिया में प्रकृति से दूरी बढ़ती जा रही है। ऐसे अभियानों के माध्यम से नई पीढ़ी को प्रकृति से जोड़ने का अवसर मिलता है।
□ प्रेरणा :
हिंदू शास्त्रों में जीव दया का संदेश
- “अहिंसा परमो धर्मः” — महाभारत
- वेदों में समस्त जीवों के कल्याण की कामना
- जैन दर्शन में प्रत्येक जीव में आत्मा का वास
- बौद्ध धर्म में करुणा को सर्वोच्च गुण माना गया
- संत साहित्य में प्रकृति प्रेम और सह-अस्तित्व का संदेश
□ क्या करें आप?
पक्षियों के लिए ऐसे बनें सहारा
- घर की छत या बालकनी में परिंडा रखें
- प्रतिदिन स्वच्छ पानी भरें
- दाना-पानी की नियमित व्यवस्था करें
- मिट्टी के पात्र का उपयोग करें
- बच्चों को भी इसके लिए प्रेरित करें
□ अभियान :
भारत विकास परिषद की सहभागिता
- 25 परिंडे लगाए गए
- स्थान : RAC ट्रेनिंग सेंटर, मंडोर रोड
- IPS कमांडेंट पंकज यादव का सान्निध्य
- RAC अधिकारियों की सक्रिय भागीदारी
- पर्यावरण संरक्षण और जीव सेवा का संदेश
□ विचार कीजिए :
क्यों जरूरी हैं पक्षी?
- पर्यावरण संतुलन बनाए रखते हैं
- बीज फैलाकर हरियाली बढ़ाते हैं
- कीट नियंत्रण में मददगार
- प्रकृति की सुंदरता और संगीत का आधार
- जैव विविधता की महत्वपूर्ण कड़ी
पक्षियों की चहचहाट में सुनाई देती है करुण पुकार
जब धरती तपती है तो सबसे पहले प्यास की आवाज पक्षियों की चहचहाहट में सुनाई देती है। वे बोल नहीं सकते, मांग नहीं सकते, शिकायत नहीं कर सकते। लेकिन उनकी मौन पीड़ा को समझना ही मानवता है।
एक छोटा-सा परिंडा, एक कटोरी पानी और थोड़ी-सी संवेदना… शायद यही वह संस्कृति है जिसने भारत को “वसुधैव कुटुंबकम्” का संदेश देने वाला देश बनाया। भारत विकास परिषद का यह अभियान केवल पक्षियों के लिए पानी रखने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि इंसानियत को जीवित रखने की एक सुंदर पहल बनकर सामने आया है।





