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“स्वाइप करो, बाद में चुकाओ” का बढ़ता जाल: क्या भारत का मिडिल क्लास कर्ज की खतरनाक सुरंग में प्रवेश कर रहा है?

क्रेडिट कार्ड, EMI और “Buy Now Pay Later” संस्कृति ने बदली भारतीयों की खर्च करने की आदतें, RBI ने दी गंभीर चेतावनी

दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली

9782414079 diliprakhai@gmail.com

भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। ऑनलाइन शॉपिंग, कैशलेस भुगतान, ईएमआई संस्कृति और “बाय नाउ पे लेटर” जैसे विकल्पों ने उपभोक्ताओं के जीवन को आसान जरूर बनाया है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा आर्थिक और सामाजिक खतरा भी आकार ले रहा है—“डेट ट्रैप” यानी कर्ज का जाल।

हाल ही में Reserve Bank of India (RBI) की रिपोर्ट ने इस चिंता को गंभीरता से सामने रखा है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में पिछले चार वर्षों में क्रेडिट कार्ड के उपयोग में ढाई गुना से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। लोग अब नकद और डेबिट कार्ड की तुलना में अधिक खर्च क्रेडिट यानी उधार के माध्यम से कर रहे हैं।

यह बदलाव केवल भुगतान प्रणाली का परिवर्तन नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की आर्थिक मानसिकता में आ रहे बदलाव का संकेत भी है। जहां एक ओर बढ़ता उपभोग और बाजार अर्थव्यवस्था को गति दे रहा है, वहीं दूसरी ओर बढ़ता व्यक्तिगत कर्ज लाखों परिवारों को आर्थिक अस्थिरता की ओर धकेल सकता है।

चौंकाने वाले आंकड़े: चार साल में कई गुना बढ़ा क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल

आरबीआई और बैंकिंग सेक्टर से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि—

  • वर्ष 2021 में लगभग 8.9 लाख करोड़ रुपए के क्रेडिट कार्ड ट्रांजैक्शन हुए थे।
  • वर्ष 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 23 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।
  • 2021 में लगभग 216 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए थे।
  • 2025 में यह संख्या बढ़कर लगभग 570 करोड़ ट्रांजैक्शन तक पहुंच गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय उपभोक्ता तेजी से “क्रेडिट आधारित खर्च” की ओर बढ़ रहे हैं।

जानिए: आखिर क्या है “डेट ट्रैप”?

डेट ट्रैप यानी कर्ज का जाल

जब व्यक्ति अपनी आय से अधिक खर्च करने लगता है और पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज लेने लगता है, तब वह धीरे-धीरे “डेट ट्रैप” में फंस जाता है।

इसके संकेत:

हर महीने केवल Minimum Due भरना
क्रेडिट कार्ड से घरेलू खर्च चलाना
एक कार्ड का भुगतान दूसरे कार्ड से करना
लगातार EMI बढ़ना
बचत समाप्त होना
सैलरी आते ही पूरा पैसा कट जाना

आखिर भारतीयों को “क्रेडिट” इतना आकर्षक क्यों लग रहा है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारण हैं।

1. डिजिटल उपभोग संस्कृति का विस्फोट

ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म और डिजिटल भुगतान ऐप्स ने खरीदारी को बेहद आसान बना दिया है। अब व्यक्ति को जेब में नकद रखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मोबाइल स्क्रीन पर सिर्फ एक क्लिक से हजारों रुपए खर्च हो जाते हैं। इससे खर्च का “मनोवैज्ञानिक दर्द” कम महसूस होता है।

2. “Buy Now Pay Later” का भ्रम

“अभी खरीदिए, बाद में भुगतान कीजिए” वाली अवधारणा ने लोगों को तत्काल खरीदारी के लिए प्रेरित किया है। उपभोक्ताओं को लगता है कि अभी भुगतान नहीं करना पड़ रहा, इसलिए खरीदारी आसान है। लेकिन वास्तविकता यह है कि यह खर्च भविष्य की आय पर बोझ बनता जाता है।

3. EMI संस्कृति का बढ़ता प्रभाव

पहले लोग उतना ही खरीदते थे जितना भुगतान कर सकते थे। अब EMI ने महंगी वस्तुओं को भी “सुलभ” बना दिया है। मोबाइल, टीवी, कार, फर्नीचर, छुट्टियां—सब कुछ EMI पर उपलब्ध है। छोटी-छोटी मासिक किस्तें लोगों को कम बोझ लगती हैं, लेकिन कई EMI मिलकर बड़ी आर्थिक समस्या बन जाती हैं।

मानव मनोविज्ञान भी बड़ा कारण

वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार क्रेडिट कार्ड उपभोक्ताओं को यह महसूस नहीं होने देता कि पैसा वास्तव में खर्च हो रहा है। जब कोई व्यक्ति नकद खर्च करता है, तो उसे तुरंत आर्थिक कमी महसूस होती है। लेकिन क्रेडिट कार्ड में भुगतान बाद में होता है, इसलिए व्यक्ति अधिक खर्च कर देता है। यही कारण है कि कई लोग अपनी वास्तविक आय क्षमता से कहीं अधिक खर्च करने लगते हैं।

सच्चाई: “Minimum Due” सबसे बड़ा भ्रम कैसे?

बहुत से लोग सोचते हैं कि Minimum Due भरने से समस्या खत्म हो जाती है। लेकिन सच्चाई यह है—

बाकी रकम पर भारी ब्याज लगता रहता है
ब्याज पर भी ब्याज जुड़ता है
पेनल्टी चार्ज अलग लगते हैं
अगला बिल और बड़ा हो जाता है

उदाहरण:

अगर 1 लाख रुपए बकाया हैं और केवल 5 हजार Minimum Due भरा गया, तो बाकी राशि पर 30% से 45% तक वार्षिक ब्याज लग सकता है।

महंगाई और नौकरी असुरक्षा ने बढ़ाई परेशानी

भारत में बढ़ती महंगाई और आर्थिक दबाव भी लोगों को क्रेडिट पर निर्भर बना रहे हैं। कई मध्यमवर्गीय परिवार अब रोजमर्रा के खर्च भी क्रेडिट कार्ड से चला रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि—

  • स्कूल फीस
  • मेडिकल खर्च
  • किराया
  • किराना
  • ईंधन
  • बच्चों की पढ़ाई

जैसी जरूरतें भी अब कई परिवारों के लिए चुनौती बन रही हैं।

AI और आर्थिक बदलाव का प्रभाव

पिछले कुछ वर्षों में तकनीकी बदलाव, ऑटोमेशन और AI आधारित कार्यप्रणाली के कारण कई क्षेत्रों में रोजगार प्रभावित हुए हैं। नौकरी असुरक्षा बढ़ने से लोगों की आय पर दबाव आया है। ऐसे में क्रेडिट कार्ड “तत्काल राहत” जैसा दिखाई देता है, लेकिन लंबे समय में यही राहत संकट बन सकती है।

RBI आखिर इतना चिंतित क्यों है?

Reserve Bank of India लगातार इस विषय पर चेतावनी दे रहा है क्योंकि यदि बड़ी संख्या में लोग कर्ज नहीं चुका पाए, तो इसका असर पूरे बैंकिंग सिस्टम पर पड़ सकता है। यदि—

  • क्रेडिट कार्ड डिफॉल्ट बढ़ते हैं
  • Non Performing Assets (NPA) बढ़ते हैं
  • बैंक रिकवरी नहीं कर पाते

तो यह वित्तीय स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है। यानी समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक जोखिम भी बन सकती है।

एक पहलू : कौन लोग सबसे ज्यादा खतरे में?

सबसे ज्यादा जोखिम में ये वर्ग

मिडिल क्लास परिवार
नई नौकरी करने वाले युवा
कम बचत वाले परिवार
कई EMI लेने वाले लोग
 “Lifestyle Spending” करने वाले उपभोक्ता
Minimum Due भरने वाले कार्ड यूजर

बैंकों को कैसे फायदा होता है?

क्रेडिट कार्ड कंपनियों और बैंकों की आय का बड़ा हिस्सा—

  • ब्याज
  • लेट फीस
  • पेनल्टी
  • प्रोसेसिंग चार्ज
  • रोलओवर चार्ज

से आता है। जब ग्राहक पूरा भुगतान नहीं करता और केवल Minimum Due भरता है, तो बैंक लंबे समय तक ब्याज कमाते रहते हैं।

कैसे पहचानें कि आप “डेट ट्रैप” में फंस रहे हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार कुछ स्पष्ट संकेत हैं—

1. सैलरी का बड़ा हिस्सा EMI में जा रहा हो

यदि आपकी आय का 40% से अधिक हिस्सा EMI और कार्ड भुगतान में जा रहा है, तो यह खतरे का संकेत है।

2. जरूरतों के लिए भी क्रेडिट कार्ड उपयोग करना

यदि किराना, बिजली बिल और दैनिक खर्च भी उधार से चल रहे हैं, तो स्थिति गंभीर हो सकती है।

3. एक कर्ज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेना

यह डेट ट्रैप का सबसे बड़ा संकेत माना जाता है।

4. बचत समाप्त हो जाना

यदि आपके पास आपातकालीन बचत नहीं बची है, तो आर्थिक संकट कभी भी बड़ा रूप ले सकता है।

तरीका: खुद को डेट ट्रैप से कैसे बचाएं?

विशेषज्ञों की सलाह

जरूरत और लग्जरी में फर्क समझें
क्रेडिट कार्ड का पूरा बिल भरें
केवल Minimum Due पर निर्भर न रहें
एक साथ कई EMI न लें
मासिक बजट बनाएं
अनावश्यक ऑनलाइन शॉपिंग रोकें
खर्च सीमा तय करें
Emergency Fund बनाएं

युवाओं में तेजी से बढ़ रहा “Lifestyle Debt”

सोशल मीडिया ने भी इस संस्कृति को बढ़ावा दिया है। ब्रांडेड मोबाइल, महंगे गैजेट, विदेश यात्राएं, ऑनलाइन सेल और दिखावटी जीवनशैली ने युवाओं पर “खर्च करने का दबाव” बढ़ाया है। अब कई लोग “कमाई के अनुसार जीवन” की बजाय “दिखावे के अनुसार जीवन” जीने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या क्रेडिट हमेशा बुरा है?

विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि हर प्रकार का कर्ज खराब नहीं होता। यदि—

  • समय पर भुगतान हो
  • आय के अनुसार खर्च हो
  • क्रेडिट स्कोर संभालकर रखा जाए

तो क्रेडिट कार्ड उपयोगी वित्तीय साधन हो सकता है। समस्या तब शुरू होती है जब उपभोग नियंत्रण से बाहर हो जाता है।

आर्थिक साक्षरता की सबसे ज्यादा जरूरत

भारत में बड़ी संख्या में लोग क्रेडिट कार्ड के वास्तविक ब्याज, चार्ज और जोखिम को पूरी तरह नहीं समझते। इसलिए वित्तीय विशेषज्ञ “Financial Literacy” यानी आर्थिक जागरूकता को सबसे बड़ा समाधान मानते हैं।स्कूल और कॉलेज स्तर पर भी वित्तीय शिक्षा की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

सुविधा और वित्तीय अनुशासन का संतुलन जरूरी

क्रेडिट कार्ड और डिजिटल भुगतान आधुनिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। वे सुविधा देते हैं, लेन-देन को आसान बनाते हैं और आर्थिक गतिविधियों को गति देते हैं। लेकिन जब सुविधा अनुशासन के बिना इस्तेमाल होने लगे, तब वही सुविधा संकट बन जाती है। Reserve Bank of India की चेतावनी केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि आने वाले समय के संभावित आर्थिक खतरे का संकेत भी है। भारतीय समाज को अब यह समझना होगा कि “क्रेडिट” अस्थायी राहत दे सकता है, लेकिन अनियंत्रित कर्ज धीरे-धीरे आर्थिक स्वतंत्रता छीन सकता है। इसलिए समझदारी इसी में है कि जरूरत, आय और खर्च के बीच संतुलन बनाए रखा जाए, ताकि “स्वाइप की सुविधा” भविष्य का बोझ न बन जाए।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor