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Thursday, July 9, 2026, 2:35 am

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डॉ. प्रमोद त्रिपाठी की सलाह : तड़के का स्वाद सेहत पर भारी ना हा जाए?

डॉ. प्रमोद त्रिपाठी लोगों को कर रहे जागरूक, बोले— “गलत तरीके से गर्म किया गया तेल शरीर की कोशिकाओं को पहुंचा सकता है नुकसान”
 कौन है डॉ. प्रमोद त्रिपाठी ? : प्रमोद त्रिपाठी पुणे के चिकित्सक, डायबिटीज रिवर्सल विशेषज्ञ और फ्रीडम फ्रॉम डायबिटिज संस्था के संस्थापक हैं। वे खानपान, योग, व्यायाम और लाइफस्टाइल सुधार के जरिए मधुमेह नियंत्रण व स्वास्थ्य जागरूकता पर काम करते हैं। सोशल मीडिया और सेमिनारों के माध्यम से वे लोगों को प्राकृतिक और संतुलित जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग स्वाद और सुविधा के लिए खाना तो बना रहे हैं, लेकिन कई बार खाना बनाने का तरीका ही बीमारियों की जड़ बन जाता है। खासतौर पर भारतीय रसोई में इस्तेमाल होने वाला “तड़का” यदि गलत तरीके से लगाया जाए तो यह शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है। स्वास्थ्य जागरूकता से जुड़े वीडियो और व्याख्यानों में डॉ. प्रमोद त्रिपाठी अक्सर इस विषय पर लोगों को सतर्क करते नजर आते हैं।

डॉ. प्रमोद त्रिपाठी के अनुसार शरीर की हर कोशिका के बाहर एक झिल्ली यानी “सेल मेम्ब्रेन” होती है, जो कोशिका की सुरक्षा और उसके कामकाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि यदि यह झिल्ली खराब हो जाए तो इंसुलिन सही तरीके से काम नहीं कर पाता, जिससे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।

वे लोगों को समझाते हैं कि रसोई में तेल को बार-बार अत्यधिक गर्म करना या धुआं निकलने तक गर्म करना शरीर में “ट्रांस फैट” पैदा करता है। यही ट्रांस फैट धीरे-धीरे शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है।

सेल मेम्ब्रेन को बताते हैं शरीर का असली सुरक्षा कवच

डॉ. प्रमोद त्रिपाठी के अनुसार कोशिका की बाहरी झिल्ली में लाखों रिसेप्टर्स होते हैं, जो शरीर के हार्मोन्स और पोषक तत्वों के साथ तालमेल बनाते हैं। उनका कहना है कि डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल और हाई बीपी जैसी बीमारियों में इन रिसेप्टर्स की कार्यक्षमता कम हो जाती है। वे यह भी बताते हैं कि शरीर की कोशिका बिना डीएनए के कुछ समय तक जीवित रह सकती है, लेकिन बिना सेल मेम्ब्रेन के नहीं। इसलिए इस झिल्ली की सुरक्षा बेहद जरूरी है।

1910 से शुरू हुई ट्रांस फैट की कहानी

डॉ. प्रमोद त्रिपाठी अक्सर अपने व्याख्यानों में बताते हैं कि वर्ष 1910 के आसपास तेल को “हाइड्रोजेनेट” करने की तकनीक सामने आई। इससे तेल लंबे समय तक खराब नहीं होता था और बेकरी उत्पाद अधिक कुरकुरे बनते थे। बाद में यही हाइड्रोजेनेटेड ऑयल “डालडा” और ट्रांस फैट के रूप में दुनिया भर में फैल गया।

वे बताते हैं कि शुरुआती वर्षों में इसके दुष्प्रभावों को गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन बाद में वैज्ञानिक अध्ययनों में सामने आया कि इससे हृदय, किडनी और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। इसके बाद कई देशों की स्वास्थ्य एजेंसियों ने ट्रांस फैट को लेकर चेतावनी जारी की।

तड़के के दौरान सबसे बड़ी गलती

डॉ. प्रमोद त्रिपाठी की मंशा है कि लोग खाना बनाते समय कुछ छोटी-छोटी सावधानियां अपनाएं। वे कहते हैं कि जैसे ही तेल धुआं छोड़ने लगता है, उसी समय उसमें ट्रांस फैट बनने लगता है। उनके अनुसार सड़क किनारे मिलने वाले समोसे, पकौड़े और अन्य तली हुई चीजों में अक्सर एक ही तेल को बार-बार इस्तेमाल किया जाता है। इससे तेल की गुणवत्ता खराब होती जाती है और स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है।

जानिए : कौन-सा तेल कितना सुरक्षित?

1. रिफाइंड ऑयल
  • रासायनिक प्रक्रिया से तैयार
  • अधिक गर्म होने पर नुकसानदायक
  • ट्रांस फैट बनने की आशंका ज्यादा
2. फिल्टर्ड ऑयल
  • पारंपरिक तरीके से निकाला जाता है
  • स्वाद और सुगंध बनी रहती है
  • नियमित उपयोग के लिए बेहतर माना जाता है
3. कोल्ड प्रेस्ड ऑयल
  • कम तापमान पर तैयार
  • पोषक तत्व अधिक सुरक्षित
  • स्वास्थ्य के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प
4. एक्स्ट्रा वर्जिन ऑयल
  • पहली बार निकाला गया प्राकृतिक तेल
  • सलाद या हल्की कुकिंग के लिए उपयोगी
  • ज्यादा गर्म करने पर गुण कम हो सकते हैं

सीड ऑयल पर भी रख रहे अपनी राय

हाल के समय में सीड ऑयल यानी बीजों से बनने वाले तेलों पर दुनिया भर में चर्चा हो रही है। इस पर डॉ. प्रमोद त्रिपाठी का कहना है कि भारत में पारंपरिक रूप से सरसों और तिल के तेल का उपयोग लंबे समय से होता आया है और इनमें एंटीऑक्सीडेंट तथा विटामिन-ई जैसे तत्व पाए जाते हैं। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि जब इन्हीं तेलों को अत्यधिक रिफाइन किया जाता है तो उनमें ओमेगा-6 फैटी एसिड की मात्रा बढ़ सकती है, जो शरीर में सूजन और अन्य समस्याओं का कारण बन सकता है।

काम की बातें : डॉ. त्रिपाठी के अनुसार सुरक्षित तड़के के 7 नियम

  • रिफाइंड ऑयल का रोजाना उपयोग कम करें
  • फिल्टर्ड या कोल्ड प्रेस्ड तेल को प्राथमिकता दें
  • तेल कम मात्रा में इस्तेमाल करें
  • तेल को धुआं निकलने तक गर्म न करें
  • मसाले जल्दी डाल दें
  • एक ही तेल को बार-बार गर्म न करें
  • तड़का 10-15 सेकंड से ज्यादा न पकाएं

मूंगफली और नारियल तेल को बताते हैं बेहतर विकल्प

डॉ. प्रमोद त्रिपाठी अक्सर लोगों को फिल्टर्ड ग्राउंडनट यानी मूंगफली तेल तथा नारियल तेल का उपयोग बढ़ाने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि नट ऑयल्स में हेल्दी फैट्स और ओमेगा-3 पाए जाते हैं, जो हृदय और मस्तिष्क के लिए लाभकारी हो सकते हैं। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि शरीर को कुछ मात्रा में तेल की जरूरत होती है और पूरी तरह “जीरो ऑयल” डाइट भी कई बार नुकसान पहुंचा सकती है।

स्वाद भी रहे, सेहत भी सुरक्षित

डॉ. प्रमोद त्रिपाठी का मुख्य संदेश यही है कि भारतीय खाना और तड़का पूरी तरह गलत नहीं है, बल्कि उसे बनाने का तरीका महत्वपूर्ण है। यदि तेल सही चुना जाए, कम मात्रा में इस्तेमाल हो और उसे जरूरत से ज्यादा गर्म न किया जाए तो कई स्वास्थ्य जोखिमों से बचा जा सकता है। वे लोगों को जागरूक करते हुए कहते हैं कि “सेल मेम्ब्रेन को सुरक्षित रखिए, वही शरीर को सुरक्षित रखेगा।”

सावधानी : किन चीजों से बढ़ता है खतरा?

  • बार-बार इस्तेमाल किया गया तेल
  • धुआं छोड़ता हुआ तेल
  • ज्यादा तली-भुनी चीजें
  • लगातार रिफाइंड ऑयल का उपयोग
  • सड़क किनारे बार-बार गर्म किए गए तेल में बने खाद्य पदार्थ

डॉ. प्रमोद त्रिपाठी की सलाह क्या कहती है?

वे मानते हैं कि संतुलित मात्रा में सही प्रकार के तेल का उपयोग और कम तापमान पर खाना पकाना शरीर के लिए बेहतर हो सकता है। हालांकि किसी भी स्वास्थ्य सलाह को अपनाने से पहले व्यक्ति को अपनी शारीरिक स्थिति और चिकित्सकीय सलाह का ध्यान रखना चाहिए।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor