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Thursday, July 9, 2026, 12:01 am

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गौ संवर्द्धन आश्रम, मोकलावास : जहां गौसेवा, ग्राम विकास और भारतीय जीवन दर्शन का साकार रूप दिखाई देता है

दिलीप कुमार पुरोहित. मोकलावास. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.co

राजस्थान के जोधपुर जिले के छोटे से ग्राम मोकलावास में स्थित गौ संवर्द्धन आश्रम आज उन लोगों के लिए आकर्षण और प्रेरणा का केंद्र बन चुका है, जो गौ संरक्षण, संवर्द्धन, प्राकृतिक चिकित्सा, पर्यावरण संरक्षण, जैविक कृषि और भारतीय जीवन मूल्यों को व्यवहार में देखना चाहते हैं। यह केवल एक गौशाला नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवंत प्रयोगशाला है जहाँ परंपरा और नवाचार का अनूठा संगम दिखाई देता है।

लक्ष्य पर्यावरण एवं जनकल्याण संस्था द्वारा संचालित यह आश्रम पिछले दो दशकों में एक ऐसे राष्ट्रीय मॉडल के रूप में विकसित हुआ है, जिसने यह सिद्ध किया है कि यदि संकल्प दृढ़ हो तो गौसेवा को ग्राम विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता से जोड़ा जा सकता है।

एक घटना जिसने बदल दी जीवन की दिशा

गौ संवर्द्धन आश्रम की स्थापना के पीछे संस्था के सचिव श्री राकेश निहाल का संघर्ष, संवेदनशीलता और दूरदर्शिता है। लगभग 27 वर्षों तक अध्यापन कार्य से जुड़े रहने वाले श्री राकेश निहाल के जीवन में एक निर्णायक मोड़ तब आया जब वर्ष 2007 में उनके कैंसरग्रस्त ससुर को पंचगव्य चिकित्सा से नया जीवन प्राप्त हुआ। इस अनुभव ने उन्हें देशी गायों, पंचगव्य चिकित्सा और भारतीय ज्ञान परंपरा की शक्ति का प्रत्यक्ष परिचय कराया।

इसके बाद उन्होंने अपना जीवन गौ संवर्द्धन और ग्रामोत्थान के लिए समर्पित कर दिया। सीमित संसाधनों, कठिन परिस्थितियों और सामाजिक चुनौतियों के बीच शुरू हुई यह यात्रा आज हजारों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है। इस संघर्ष यात्रा में उनके परिवार का अथक अनवरत सहयोग शामिल है जो आज भी जारी है। श्री राकेश जी की स्वर्गीय माताजी श्रीमती लीलावती निहाल (कई राज्यस्तर पुरस्कारों से सम्मानित ) एक प्रख्यात समाजसेविका व पर्यावरणविद रह चुकी है और पिता श्री सहीराम निहाल जी ने इस बंजर धरती को आज के हरे भरे परिदृश्य तक लाने के लिए आजीवन संघर्ष किया जो अविस्मरणीय है।

बंजर भूमि से विकसित हुआ आत्मनिर्भरता का केंद्र

जिस भूमि पर आज गौ संवर्द्धन आश्रम खड़ा है, वह कभी साधारण और कम उपयोगी मानी जाती थी। निरंतर श्रम, जल संरक्षण, वृक्षारोपण और प्राकृतिक संसाधनों के समुचित उपयोग ने इसे एक समृद्ध एवं जीवंत परिसर में बदल दिया।

आश्रम में वर्षाजल संचयन की ऐसी व्यवस्था विकसित की गई है कि वर्षा की एक-एक बूंद को संरक्षित किया जा सके। बांध एनीकटों और जल संरचनाओं के माध्यम से भू-जल स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। एक समय जहाँ जल स्तर लगभग 410 फीट की गहराई पर था, वहीं आज वह लगभग 120 फीट तक पहुँच चुका है। यह उपलब्धि जल संरक्षण के क्षेत्र में आश्रम की दूरदर्शी सोच को दर्शाती है।

थारपारकर नस्ल संरक्षण का राष्ट्रीय अभियान

गौ संवर्द्धन आश्रम की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधियों में संकटग्रस्त थारपारकर नस्ल का संरक्षण और संवर्द्धन शामिल है। आश्रम में विशेष रूप से उच्च गुणवत्ता वाले नंदियों का पालन-पोषण किया जाता है। बछड़ों को प्रारंभिक अवस्था से ही पारंपरिक प्राकृतिक पद्धतियों से तैयार किया जाता है ताकि वे भविष्य में श्रेष्ठ प्रजनन क्षमता वाले नंदी बन सकें।

अब तक देशभर में 198 उत्कृष्ट थारपारकर नंदियों का वितरण किया जा चुका है। इन नंदियों ने अनेक गौशालाओं, पंचायतों और किसानों के बीच देशी नस्ल संरक्षण के अभियान को नई दिशा प्रदान की है।

जहाँ गोबर केवल अपशिष्ट नहीं, संसाधन है

आश्रम का दर्शन इस विचार पर आधारित है कि गाय का प्रत्येक उत्पाद उपयोगी है। यहाँ गोबर और गौमूत्र को केवल कृषि तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इनके आधार पर अनेक उपयोगी उत्पाद विकसित किए गए हैं।

गोबर एवं गौमूत्र से साबुन, धूपबत्ती, दंतमंजन, जैविक खाद, प्राकृतिक कीट नियंत्रक, फर्श क्लीनर, त्वचा उपयोगी उत्पाद तथा अन्य दैनिक उपयोग की सामग्री तैयार की जाती है। इन उत्पादों ने ग्रामीण महिलाओं और युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर सृजित किए हैं।

आश्रम में संचालित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से हजारों ग्रामीणों को गौ आधारित उत्पाद निर्माण और लघु उद्यम स्थापित करने का प्रशिक्षण दिया जा चुका है।

प्राकृतिक जीवनशैली का जीवंत अनुभव

गौ संवर्द्धन आश्रम की सबसे अनूठी पहचान उसकी जीवनशैली है। परिसर में गोबर और मिट्टी आधारित निर्माण का व्यापक उपयोग किया गया है। भवनों की दीवारें, कुछ संरचनाएँ और वातावरण प्राकृतिक सिद्धांतों पर आधारित हैं, जो गर्मी के मौसम में भी शीतलता का अनुभव कराते हैं।

यहाँ भोजन मिट्टी के बर्तनों में तैयार किया जाता है। दही, छाछ, मक्खन और घी का निर्माण पारंपरिक बिलौना पद्धति से किया जाता है। रसोई व्यवस्था भारतीय संस्कृति और आयुर्वेदिक जीवनशैली के अनुरूप विकसित की गई है। आगंतुकों को ऐसा अनुभव होता है मानो वे भारतीय ग्राम्य संस्कृति के जीवंत संग्रहालय में प्रवेश कर गए हों।

शिक्षा, शोध और प्रशिक्षण का केंद्र

गौ संवर्द्धन आश्रम आज केवल सेवा केंद्र नहीं, बल्कि शिक्षा और शोध का भी प्रमुख संस्थान बन चुका है।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जोधपुर द्वारा आश्रम को मान्यता प्राप्त केंद्र का दर्जा प्रदान किया गया है। वर्तमान में यहाँ तीन प्रमुख पाठ्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं—

* स्वावलंबी चिकित्सा का 6 माह का आधारभूत पाठ्यक्रम
* एक वर्षीय पंचगव्य चिकित्सा प्रमाण-पत्र पाठ्यक्रम
* दो वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन पंचगव्य थेरेपी

देशभर से विद्यार्थी, चिकित्सक, शोधार्थी और गौसेवक यहाँ आकर प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। उन्हें पंचगव्य चिकित्सा, प्राकृतिक उपचार, गौशाला प्रबंधन, जैविक खेती, नस्ल संवर्द्धन तथा गौ आधारित उद्यमिता का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा और स्वास्थ्य का नया आयाम

आश्रम में पंचगव्य चिकित्सा और प्राकृतिक उपचार पद्धतियों पर निरंतर कार्य किया जा रहा है। “आचार्य हस्ति अहिंसात्मक चिकित्सा शोध संस्थान” के माध्यम से स्वास्थ्य जागरूकता, पंचकर्म और प्राकृतिक चिकित्सा संबंधी गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित स्वास्थ्य शिविरों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों से हजारों परिवार लाभान्वित हो चुके हैं। आश्रम का प्रयास है कि कम लागत, सुलभ और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।

वृक्ष, चारागाह और पर्यावरण संरक्षण

पर्यावरण संरक्षण आश्रम की कार्यशैली का अभिन्न अंग है। अब तक 81,000 से अधिक वृक्ष लगाए जा चुके हैं। सेवण, धामण और अन्य देशी घासों के मॉडल चारागाह विकसित किए गए हैं, जो पशुधन संरक्षण के साथ-साथ जैव विविधता को भी बढ़ावा देते हैं।

आश्रम परिसर और आसपास का क्षेत्र आज हरित विकास और प्राकृतिक संतुलन का उदाहरण बन चुका है। वृक्षारोपण, चारागाह विकास, जल संरक्षण और जैविक खेती के समन्वित प्रयासों ने इसे पर्यावरणीय दृष्टि से एक अनुकरणीय मॉडल बना दिया है।

परिवार : आत्मनिर्भर गाँव की ओर एक कदम

गौ संवर्द्धन आश्रम का मूल उद्देश्य केवल गौ संरक्षण नहीं, बल्कि गौ आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण है। यहाँ की गतिविधियाँ किसानों, महिलाओं, युवाओं और विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कार्य कर रही हैं।

आश्रम यह संदेश देता है कि यदि गौशालाओं को वैज्ञानिक प्रबंधन, उत्पाद निर्माण, चिकित्सा, अनुसंधान और प्रशिक्षण से जोड़ा जाए तो वे ग्रामीण विकास की सशक्त इकाई बन सकती हैं।

एक विचार, जो आंदोलन बन रहा है

आज गौ संवर्द्धन आश्रम मोकलावास केवल राजस्थान की पहचान नहीं रहा, बल्कि देशभर में गौ आधारित समग्र विकास के एक सफल मॉडल के रूप में स्थापित हो चुका है। यह स्थान बताता है कि गौसेवा केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी बन सकती है।

संघर्ष से शुरू हुई यह यात्रा आज हजारों लोगों को प्रेरित कर रही है। मोकलावास का यह आश्रम भारतीय परंपरा की जड़ों से जुड़कर आधुनिक भारत के लिए एक नई दिशा प्रस्तुत कर रहा है—एक ऐसी दिशा जहाँ प्रकृति, संस्कृति, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता साथ-साथ आगे बढ़ते हैं।

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor