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Thursday, July 9, 2026, 3:23 am

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विश्व पर्यावरण दिवस स्टोरी-1… क्या हम अगली महामारी को खुद जन्म दे रहे हैं?

जंगल काटे, नदियाँ प्रदूषित कीं, मरुस्थल का संतुलन बिगाड़ा… अब वैज्ञानिकों की चेतावनी—यदि नहीं चेते तो COVID-19 से भी बड़ी आपदा का खतरा

विशेष रिपोर्ट: दिलीप कुमार पुरोहित

9783414079 diliprakhai@gmail.com

पांच वर्ष पहले पूरी दुनिया एक ऐसे संकट के सामने खड़ी थी, जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। एक सूक्ष्म वायरस ने विश्व की महाशक्तियों को घुटनों पर ला दिया। अस्पताल भर गए, अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गईं, करोड़ों लोग घरों में कैद हो गए और लाखों लोगों ने अपनों को खो दिया। COVID-19 ने मानव सभ्यता को यह अहसास कराया कि तकनीकी और वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद प्रकृति के सामने इंसान कितना असहाय हो सकता है।

COVID-19 की उत्पत्ति को लेकर वैज्ञानिक जगत में अब भी बहस जारी है। कुछ विशेषज्ञ इसे प्राकृतिक रूप से विकसित वायरस मानते हैं, जबकि कुछ प्रयोगशाला संबंधी संभावनाओं की जांच की मांग करते रहे हैं। लेकिन इस बहस से अलग एक तथ्य पर लगभग पूरी वैज्ञानिक बिरादरी सहमत दिखाई देती है—यदि मानव समाज पर्यावरण के साथ इसी तरह खिलवाड़ करता रहा तो भविष्य में नई महामारियों का खतरा बढ़ सकता है।

विश्व पर्यावरण दिवस पर सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या हम अगली महामारी को स्वयं जन्म दे रहे हैं?

प्रकृति का संतुलन बिगड़ा तो खतरा बढ़ा

पृथ्वी पर लाखों वर्षों से वन्यजीव, सूक्ष्म जीव और मानव अपने-अपने प्राकृतिक दायरे में रहते आए हैं। जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि वे जैव विविधता के विशाल भंडार हैं। यहां हजारों प्रकार के जीव-जंतु, पक्षी, कीट और सूक्ष्म जीव रहते हैं।

जब जंगल काटे जाते हैं, तब केवल पेड़ नहीं गिरते, बल्कि पूरा पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित होता है। वन्यजीवों को अपना प्राकृतिक आवास छोड़ना पड़ता है। वे मानव बस्तियों की ओर बढ़ते हैं। इससे इंसानों और वन्यजीवों के बीच संपर्क बढ़ता है और ऐसे वायरस या बैक्टीरिया, जो पहले केवल जानवरों तक सीमित थे, मनुष्यों तक पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि दुनिया में उभरने वाले अधिकांश नए संक्रामक रोगों की जड़ें पशुओं और वन्यजीवों से जुड़ी रही हैं। इसे वैज्ञानिक भाषा में “जूनोटिक संक्रमण” कहा जाता है।

जंगलों का विनाश और बीमारियों का रिश्ता

पिछले कुछ दशकों में दुनिया ने अभूतपूर्व स्तर पर वनों की कटाई देखी है। खेती, खनन, सड़क निर्माण, औद्योगिक परियोजनाओं और शहरी विस्तार के लिए करोड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र समाप्त हो चुके हैं। पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि जब प्राकृतिक आवास नष्ट होते हैं, तब जानवर नए क्षेत्रों में प्रवास करते हैं। उनके साथ कई प्रकार के रोगजनक भी नए क्षेत्रों में पहुंचते हैं।

उदाहरण के लिए चमगादड़ अनेक प्रकार के वायरसों के प्राकृतिक वाहक माने जाते हैं। सामान्य परिस्थितियों में ये वायरस उनके शरीर में सीमित रहते हैं, लेकिन जब उनका आवास नष्ट होता है और उनका संपर्क मनुष्यों या पालतू पशुओं से बढ़ता है, तब संक्रमण फैलने की संभावना बढ़ जाती है।

जैव विविधता की कमी भी खतरे की घंटी

विशेषज्ञ मानते हैं कि जैव विविधता प्रकृति की सुरक्षा ढाल है। जब किसी क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की प्रजातियां मौजूद होती हैं, तब रोगजनकों का प्रसार सीमित रहने की संभावना अधिक होती है। लेकिन जब जैव विविधता घटती है और कुछ सीमित प्रजातियां ही बचती हैं, तब संक्रमण तेजी से फैल सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक जैव विविधता संरक्षण को केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा का मुद्दा भी मानते हैं।

जलवायु परिवर्तन और नई बीमारियां

पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और मौसम के पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन का एक कम चर्चित पहलू भी है—संक्रामक रोगों का बढ़ता खतरा। गर्म होती जलवायु के कारण मच्छरों, कीटों और रोग फैलाने वाले अन्य जीवों का भौगोलिक विस्तार बढ़ रहा है। पहले जो रोग केवल कुछ विशेष क्षेत्रों तक सीमित थे, वे अब नए इलाकों में भी दिखाई देने लगे हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में कई नए संक्रमण उभर सकते हैं।

नदियां और जल स्रोत भी खतरे में

दुनिया भर में नदियां, झीलें और भूजल स्रोत प्रदूषण की चपेट में हैं। औद्योगिक अपशिष्ट, रासायनिक पदार्थ और प्लास्टिक प्रदूषण ने जल संसाधनों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। दूषित जल केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट भी है। जलजनित रोगों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रदूषित जल स्रोतों में रोगजनक सूक्ष्म जीवों के विकास और प्रसार की परिस्थितियां भी बन सकती हैं।

मरुस्थल का बदलता संतुलन

राजस्थान सहित दुनिया के कई शुष्क क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों का असर दिखाई दे रहा है। अत्यधिक भूजल दोहन, वनस्पति का नुकसान और भूमि क्षरण प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मरुस्थलीय क्षेत्रों का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ने से स्थानीय जैव विविधता प्रभावित होती है। इससे खाद्य श्रृंखला और प्राकृतिक रोग नियंत्रण तंत्र भी कमजोर हो सकते हैं।

कोविड-19 ने क्या सिखाया?

कोविड-19 ने स्पष्ट कर दिया कि एक स्वास्थ्य संकट कितनी तेजी से वैश्विक आर्थिक और सामाजिक संकट में बदल सकता है।

  • करोड़ों नौकरियां प्रभावित हुईं।
  • शिक्षा व्यवस्था बाधित हुई।
  • मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ीं।
  • वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं टूट गईं।
  • स्वास्थ्य प्रणालियों पर अभूतपूर्व दबाव पड़ा।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगली महामारी केवल स्वास्थ्य संकट नहीं होगी, बल्कि आर्थिक और सामाजिक स्थिरता के लिए भी बड़ी चुनौती बन सकती है।

वैज्ञानिकों की बड़ी चेतावनी

विश्व के अनेक वैज्ञानिक संगठनों और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि महामारी की रोकथाम केवल अस्पतालों और दवाइयों से संभव नहीं है।

महामारी रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है—

  • जंगलों का संरक्षण
  • जैव विविधता की रक्षा
  • वन्यजीव आवासों का संरक्षण
  • प्रदूषण नियंत्रण
  • जलवायु परिवर्तन पर प्रभावी कार्रवाई

अर्थात पर्यावरण संरक्षण ही भविष्य की स्वास्थ्य सुरक्षा का आधार बन सकता है।

क्या भारत तैयार है?

भारत जैव विविधता के लिहाज से दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में शामिल है। यहां हिमालय, रेगिस्तान, तटीय क्षेत्र, वर्षावन और विशाल वन्यजीव क्षेत्र मौजूद हैं। लेकिन तेजी से बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और संसाधनों के बढ़ते दोहन ने पर्यावरण पर दबाव बढ़ाया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत के लिए विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। यदि यह संतुलन बिगड़ा तो इसके परिणाम केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि स्वास्थ्य, कृषि और अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा।

पर्यावरण बचाना ही भविष्य बचाना है

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधारोपण का प्रतीकात्मक कार्यक्रम नहीं है। यह आत्ममंथन का अवसर है। प्रकृति बार-बार संकेत दे रही है कि पृथ्वी के संसाधन असीमित नहीं हैं। जंगल, नदियां, पहाड़, रेगिस्तान और समुद्र केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं।यदि मानव समाज पर्यावरणीय चेतावनियों को अनदेखा करता रहा तो भविष्य में ऐसी महामारियां सामने आ सकती हैं जिनका प्रभाव COVID-19 से भी अधिक व्यापक हो। प्रकृति के साथ संघर्ष में इंसान कभी विजेता नहीं बन सकता। इसलिए पर्यावरण संरक्षण अब केवल हरित अभियान नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की आवश्यकता बन चुका है। आज विश्व पर्यावरण दिवस पर सबसे बड़ा संदेश यही है—

यदि हम प्रकृति को बचाएंगे तो प्रकृति हमें बचाएगी।

 

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor