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Sunday, August 23, 2026, 5:21 am

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Lifestyle

एक वृक्ष की अंतिम यात्रा

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लेखक आनंद M वासु की संवेदना से प्रेरित एक भावपूर्ण पत्र

प्रिय मानव समाज,

जब मनुष्य जन्म लेता है, तब वह अकेला आता है। और जब वह इस संसार से विदा होता है, तब भी अकेला ही जाता है। जीवन की सारी दौड़, सारी उपलब्धियाँ, सारे रिश्ते और सारी इच्छाएँ अंततः उसी श्मशान की राख में विलीन हो जाती हैं, जहाँ केवल स्मृतियाँ बचती हैं।
परंतु आज मैं आपसे मृत्यु की नहीं, बल्कि उस जीवन की बात करना चाहता हूँ जो हमारी मृत्यु के बाद भी जीवित रह सकता है। मैं उस वृक्ष की बात करना चाहता हूँ, जो हमारे साथ अंतिम यात्रा तक जाता है।
सोचिए…
एक वृक्ष कितने वर्षों तक धरती पर खड़ा रहता है। वह धूप सहता है, आँधियाँ झेलता है, वर्षा में भीगता है और हर ऋतु में स्वयं को बदलता है। वह किसी से कुछ माँगता नहीं। वह केवल देता है—छाया देता है, फल देता है, फूल देता है, पक्षियों को घर देता है, गिलहरियों को आश्रय देता है और मनुष्य को साँसें देता है।
लेकिन विडंबना देखिए…
मनुष्य अपनी अंतिम यात्रा में भी उसी वृक्ष को काट लेता है।
श्मशान की लकड़ियाँ केवल लकड़ियाँ नहीं होतीं। वे किसी वृक्ष का जीवन होती हैं। वे किसी चिड़िया का उजड़ा हुआ घर होती हैं। वे किसी गिलहरी की टूटी हुई दुनिया होती हैं। वे किसी ऋतु का अधूरा गीत होती हैं।
जब कोई व्यक्ति मरता है, तब उसके परिवार के लोग रोते हैं। लेकिन क्या कभी हमने सोचा कि उस वृक्ष की भी एक मृत्यु होती है, जिसे हम अपने अंतिम संस्कार के लिए काटते हैं?
वह वृक्ष भी तो अपने पीछे एक संसार छोड़कर आता है।
किसी कवि ने ठीक ही कहा है—
“पेड़ केवल पेड़ नहीं होते, वे पृथ्वी की धड़कन होते हैं।”
आज दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है। नदियाँ सूख रही हैं। पक्षियों की आवाज़ें कम होती जा रही हैं। जंगल सिमट रहे हैं। शहरों में साँस लेना कठिन हो रहा है। और इस सबके बीच हम अब भी हजारों वृक्ष केवल परंपराओं के नाम पर काट रहे हैं।
परंपराएँ तब तक सुंदर होती हैं, जब तक वे जीवन की रक्षा करें।
यदि कोई परंपरा प्रकृति का गला घोंटने लगे, तो उसे बदलना ही सच्ची मानवता है।
लेखक आनंद M वसु की यह इच्छा केवल एक व्यक्ति की अंतिम इच्छा नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय के लिए एक चेतावनी है।
वे कहते हैं कि उनका अंतिम संस्कार किसी विद्युत दाहगृह में हो, ताकि एक वृक्ष बच सके।
सोचिए, कितनी महान संवेदना है इस विचार में।
एक मनुष्य अपनी मृत्यु के बाद भी जीवन बचाना चाहता है।
आज हम अपने बच्चों के लिए धन जमा करते हैं, मकान बनाते हैं, गाड़ियाँ खरीदते हैं। लेकिन क्या हम उनके लिए स्वच्छ हवा भी बचा रहे हैं?
क्या हम उनके लिए हरे-भरे वृक्ष छोड़ रहे हैं?
यदि आने वाली पीढ़ियाँ केवल कंक्रीट के जंगलों में जन्म लेंगी, तो वे प्रकृति से प्रेम करना कैसे सीखेंगी?
यदि चिड़ियों की चहचहाहट ही समाप्त हो जाएगी, तो बच्चों की कविताओं में “कोयल” और “गौरैया” केवल शब्द बनकर रह जाएँगे।
एक वृक्ष केवल ऑक्सीजन नहीं देता।
वह संस्कृति देता है।
वह संवेदना देता है।
वह धैर्य सिखाता है।
वह निस्वार्थ सेवा का सबसे बड़ा उदाहरण होता है।
जब कोई वृक्ष कटता है, तब केवल लकड़ी नहीं गिरती—धरती का एक हिस्सा मौन हो जाता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी सोच बदलें।
यदि संभव हो तो विद्युत दाहगृहों को अपनाएँ।
यदि लकड़ी का उपयोग करना ही पड़े, तो उतने वृक्ष अवश्य लगाएँ।
अपने बच्चों को केवल सफलता नहीं, संवेदनशीलता भी सिखाएँ।
उन्हें बताइए कि वृक्षों के बिना जीवन केवल मशीनों का संसार बन जाएगा।
कल्पना कीजिए उस दिन की, जब हर व्यक्ति अपनी अंतिम इच्छा में लिखे—
“मेरी मृत्यु के बाद कोई वृक्ष न काटा जाए।”
यदि ऐसा होने लगे, तो यह केवल पर्यावरण आंदोलन नहीं रहेगा, बल्कि मानव चेतना का पुनर्जागरण बन जाएगा।
एक दिन हम सबको जाना है।
हमारे नाम मिट जाएँगे।
हमारी तस्वीरों पर धूल जम जाएगी।
लेकिन यदि हमारे कारण एक वृक्ष बच गया, तो वह वृक्ष हमारी सबसे सुंदर विरासत होगा।
उसकी शाखाओं पर बैठी चिड़ियाँ हमारी स्मृति में गीत गाएँगी।
उसकी छाया में खेलते बच्चे हमारी उपस्थिति महसूस करेंगे।
उसके पत्तों से गुजरती हवा कहेगी—
“यह वह मनुष्य था, जिसने मृत्यु में भी जीवन को चुना।”
इसलिए आइए, आज एक संकल्प लें—
हम केवल अपने लिए नहीं जिएँगे।
हम उन वृक्षों के लिए भी जिएँगे, जो बिना कुछ कहे हमें जीवन देते हैं।
क्योंकि अंत में…
जब सब कुछ समाप्त हो जाएगा,
तब शायद संसार को हमारी संपत्ति याद न रहे,
लेकिन बचा हुआ एक वृक्ष अवश्य याद रहेगा

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor