पश्चिमी राजस्थान के टेक्सटाइल उद्योग को बचाने की जंग, जोधपुर हैंड प्रोसेस टेक्सटाइल एसोसिएशन के अध्यक्ष उमेश लीला से राइजिंग भास्कर की विशेष बातचीत।
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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जोधपुर का टेक्सटाइल और हैंड प्रोसेसिंग उद्योग केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि पश्चिमी राजस्थान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। वर्षों से यह उद्योग हजारों परिवारों को रोजगार देता रहा है और जोधपुर को देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाता रहा है। बंधेज, टेक्सटाइल प्रिंटिंग, हैंड प्रोसेसिंग और निर्यात के क्षेत्र में जोधपुर ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। लेकिन वर्तमान समय में यह उद्योग अपने सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों, पर्यावरणीय मानकों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच फंसे इस उद्योग की सैकड़ों इकाइयां बंद हो चुकी हैं। हजारों श्रमिक बेरोजगार हो गए हैं और करोड़ों रुपये का व्यापार प्रभावित हुआ है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में जोधपुर हैंड प्रोसेस टेक्सटाइल एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर सर्वसम्मति से चुने गए उद्योगपति एवं समाजसेवी उमेश लीला उद्योग जगत की उम्मीद बनकर सामने आए हैं।
राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित ने उमेश लीला से विस्तार से बातचीत कर उद्योग की वर्तमान स्थिति, समस्याओं, संभावित समाधान, सरकारी सहयोग और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा की। प्रस्तुत है इस विशेष बातचीत के प्रमुख अंश।
प्रश्न 1 : सबसे पहले आपको जोधपुर हैंड प्रोसेस टेक्सटाइल एसोसिएशन का अध्यक्ष बनने पर बधाई। 16 वर्षों बाद हुए इस बदलाव को आप किस रूप में देखते हैं?
उमेश लीला : बहुत-बहुत धन्यवाद। सबसे पहले मैं एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि 16 वर्षों बाद चुनाव नहीं हुए, बल्कि एसोसिएशन के लगभग 350 सदस्यों ने सर्वसम्मति से मेरा नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया। यह मेरे लिए सम्मान के साथ-साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी है।
सच कहूं तो मैं स्वयं इस पद को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं था क्योंकि वर्तमान परिस्थितियों में यह पद किसी सम्मान से अधिक चुनौतियों का प्रतीक है। लेकिन उद्योग और श्रमिकों के हित को देखते हुए मैंने यह जिम्मेदारी स्वीकार की। आज टेक्सटाइल उद्योग जिस संकट से गुजर रहा है, उसमें किसी न किसी को आगे आकर नेतृत्व करना ही था।
प्रश्न 2 : वर्तमान में टेक्सटाइल उद्योग की वास्तविक स्थिति क्या है?
उमेश लीला : स्थिति अत्यंत गंभीर है। यह केवल जोधपुर का संकट नहीं है बल्कि पूरे पश्चिमी राजस्थान की अर्थव्यवस्था पर छाया हुआ संकट है। आज जोधपुर की लगभग 307 टेक्सटाइल इकाइयां पूर्ण रूप से बंद पड़ी हैं। इन इकाइयों से जुड़े लगभग डेढ़ लाख श्रमिक सीधे तौर पर बेरोजगार हो चुके हैं। यदि अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े परिवारों और अन्य क्षेत्रों को जोड़ लें तो लगभग सात लाख लोगों की आजीविका प्रभावित हुई है।
इनमें अधिकांश श्रमिक दैनिक आय पर निर्भर रहते हैं। वे सुबह काम करते हैं और शाम को परिवार के लिए राशन लेकर जाते हैं। ऐसे परिवारों के सामने आज जीवनयापन का संकट खड़ा हो गया है।
प्रश्न 3 : इस संकट के पीछे मुख्य कारण क्या हैं?
उमेश लीला : मुख्य कारण पर्यावरणीय नियमों के पालन को लेकर उत्पन्न हुई परिस्थितियां हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद उद्योगों पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। हम पर्यावरण संरक्षण के पक्षधर हैं और मानते हैं कि किसी भी उद्योग को नियमों के भीतर रहकर ही काम करना चाहिए। लेकिन वर्तमान स्थिति में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिन पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए जब उद्योग पूरी तरह बंद हैं, तब भी ड्रेनेज में पानी का प्रवाह जारी है। यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं अवैध गतिविधियां अभी भी संचालित हो रही हैं।
आज भी पाली और बालोतरा जैसे क्षेत्रों से कपड़ा धुलाई के लिए जोधपुर लाया जा रहा है। कुछ अवैध इकाइयां कार्य कर रही हैं, जबकि नियमों का पालन करने वाले उद्योगपति नुकसान उठा रहे हैं। यही सबसे बड़ी विडंबना है।
प्रश्न 4 : आप बार-बार अवैध इकाइयों का उल्लेख कर रहे हैं। यह समस्या कितनी गंभीर है?
उमेश लीला : बहुत गंभीर है। यदि नियमों का पालन करने वाले उद्योग बंद रहें और अवैध गतिविधियां जारी रहें तो इसका नुकसान पूरे उद्योग को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ दिनों में प्रशासन द्वारा कई स्थानों पर कार्रवाई की गई है। अवैध इकाइयां पकड़ी गई हैं, माल जब्त हुआ है और वाहन भी पकड़े गए हैं। एसोसिएशन लगातार प्रशासन को जानकारी दे रही है ताकि ऐसी गतिविधियों पर पूर्ण रोक लग सके। हम चाहते हैं कि सभी उद्योग समान नियमों के अंतर्गत कार्य करें। यदि उद्योग चालू होंगे तो पूरी पारदर्शिता और नियमों के पालन के साथ ही होंगे।
प्रश्न 5 : सरकार और प्रशासन से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?
उमेश लीला : हम किसी विशेष राहत की मांग नहीं कर रहे, बल्कि न्यायसंगत समाधान चाहते हैं। हमने केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, उद्योग मंत्री के.के. विश्नोई, विधायक अतुल भंसाली सहित कई जनप्रतिनिधियों से मुलाकात की है। सभी ने सकारात्मक सहयोग का आश्वासन दिया है। हमारी मांग है कि राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उद्योगों की वास्तविक स्थिति को मजबूती से रखे। यह केवल उद्योगपतियों का मुद्दा नहीं है, बल्कि लाखों लोगों के रोजगार का प्रश्न है।
प्रश्न 6 : उद्योग चालू करने के लिए एसोसिएशन क्या प्रयास कर रही है?
उमेश लीला : हम समाधान आधारित दृष्टिकोण पर काम कर रहे हैं। एसोसिएशन और जेपीसीआर (JPCR) मिलकर सभी आवश्यक अनुपालनों को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं। कई उद्योगपतियों ने व्यक्तिगत स्तर पर जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) सिस्टम लगाने का निर्णय लिया है। इसके लिए कुछ उद्योगपतियों ने डेढ़ करोड़ से ढाई करोड़ रुपये तक के निवेश के साथ ऑर्डर भी दे दिए हैं। आज कई उद्योगपति बैंक से ऋण लेकर पर्यावरण-अनुकूल तकनीक अपनाने के लिए तैयार हैं। इससे यह स्पष्ट है कि उद्योग जगत समाधान चाहता है, टकराव नहीं।
प्रश्न 7 : वर्तमान में सबसे बड़ी प्रशासनिक समस्या क्या है?
उमेश लीला : सबसे बड़ी समस्या अनुमति प्रक्रियाओं में देरी है। एक ओर सरकार कहती है कि उद्योग जीरो लिक्विड डिस्चार्ज सिस्टम लगाएं, दूसरी ओर जब उद्योगपति इसे स्थापित करना चाहते हैं तो उन्हें ‘कंसेंट टू एस्टेब्लिश’ और ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ जैसी स्वीकृतियां समय पर नहीं मिल रही हैं। यदि उद्योगपति करोड़ों रुपये का निवेश करने को तैयार हैं, तो उन्हें आवश्यक प्रशासनिक सहयोग भी मिलना चाहिए। इससे उद्योगों के पुनः संचालन की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
प्रश्न 8 : क्या आपको लगता है कि उद्योग और पर्यावरण के बीच संतुलन संभव है?
उमेश लीला : बिल्कुल संभव है। हमारा स्पष्ट मत है कि उद्योग और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। हम चाहते हैं कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहे और रोजगार भी बचा रहे। आधुनिक तकनीक, जीरो लिक्विड डिस्चार्ज सिस्टम और कठोर निगरानी के माध्यम से यह संतुलन स्थापित किया जा सकता है। भविष्य में किसी प्रकार की त्रुटि न हो, इसके लिए हम स्वयं उद्योगों में पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यवस्था मजबूत कर रहे हैं।
प्रश्न 9 : उद्योग जगत और श्रमिकों के लिए आपका संदेश?
उमेश लीला : मैं सभी उद्योगपतियों, श्रमिकों और जनप्रतिनिधियों से अपील करना चाहता हूं कि हम इस संकट को अवसर में बदलें। नियमों का पूर्ण पालन करें, अवैध गतिविधियों से दूरी रखें और मिलकर उद्योग को पुनर्जीवित करें। हमें विश्वास है कि सरकार, न्यायपालिका, प्रशासन और उद्योग जगत के सामूहिक प्रयासों से यह संकट समाप्त होगा और जोधपुर का टेक्सटाइल उद्योग एक बार फिर देश-दुनिया में अपनी पहचान स्थापित करेगा। मेरा मानना है कि वर्तमान संकट केवल उद्योग का संकट नहीं बल्कि पश्चिमी राजस्थान की सामाजिक और आर्थिक संरचना से जुड़ा विषय है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकला तो लाखों परिवारों की आजीविका प्रभावित होगी। वहीं यदि सरकार, प्रशासन और उद्योग जगत मिलकर काम करें तो जोधपुर का टेक्सटाइल उद्योग पहले से अधिक मजबूत होकर उभर सकता है। उद्योग जगत पर्यावरण संरक्षण के प्रति हम प्रतिबद्ध हैं और समाधान के लिए हर संभव सहयोग देने को तैयार हैं।
प्रश्न : आप सरकार से कुछ कहना चाहेंगे?
उमेश लीला : जी, सरकार से यही कहना चाहूंगा कि जयपुर में राजस्थान सरकार की नाक के नीचे करीब 5 हजार टेक्सटाइल की फैक्ट्रियां चल रही हैं। अधिकृत आंकड़े 2500 बताए जा रहे हैं, जिसमें एनओसी सिर्फ 143 के पास हैं। सांगानेर से द्रव्यवती, नेवटा में जहर घुल रहा है। राजस्थान पत्रिका में इस संबंध में बड़ी न्यूज भी प्रकाशित हो चुकी है। जयपुर में कई फैक्ट्रियां खेतों में चेल रही है, कोई एनओसी नहीं हैं। खेतों में ही पानी जा रही है। कोई ट्रीटमेंट नहीं हो रहा है। एक ही स्टेट में यह अलग-अलग नियम क्यों? सरकार को चाहिए कि राज्य में समान नियम लागू करें और उद्योगों को बचाएं और श्रमिकों के रोजगार पर जो संकट खड़ा हुआ है, उससे निजात दिलाएं।







