भारतीय विरासत संरक्षण विशेषज्ञ विक्रम सिंह राठौड़ से राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित की विशेष बातचीत।
(विक्रम सिंह राठौड़ परिचय : भारतीय विरासत संरक्षण के विशेषज्ञ, प्रतिष्ठित आर्ट हेरिटेज कंज़र्वेशनिस्ट एवं कंसल्टेंट (Art Heritage Conservationist & Consultant) हैं, जो कला, ऐतिहासिक धरोहरों, पुरानी पांडुलिपियों, चित्रों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के क्षेत्र में लंबे समय से कार्यरत हैं। राठौड़ ने भारत सहित विभिन्न देशों में आयोजित अंतरराष्ट्रीय शोध एवं संरक्षण कार्यक्रमों में भाग लेकर अपनी विशेषज्ञता का परिचय दिया है। राठौड़ ने अमेरिका के GRFCC, ओमाहा (USA) में शोध कार्य किया है। इसके अलावा उन्होंने विश्व के प्रतिष्ठित संस्थानों जैसे विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम (V&A Museum), लंदन, तथा ब्रिटिश लाइब्रेरी, लंदन (UK) में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पेपर कंज़र्वेशन सम्मेलनों में सहभागिता की है। ब्राज़ील के ओलिंडा (Olinda) में आयोजित इंडोर क्लाइमेट मैनेजमेंट कार्यक्रम तथा अमेरिका के मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम, न्यूयॉर्क में आयोजित फोटोग्राफ संरक्षण सम्मेलन में भी उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। शैक्षणिक रूप से वे बी.एससी. (B.Sc.), एम.ए. (M.A.), बिज़नेस मैनेजमेंट तथा CCPPM जैसी योग्यताएँ रखते हैं। कला एवं विरासत संरक्षण के क्षेत्र में उनके अनुभव और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता ने उन्हें इस क्षेत्र के अग्रणी विशेषज्ञों में स्थापित किया है। विक्रम एस. राठौड़ का उद्देश्य ऐतिहासिक धरोहरों, प्राचीन दस्तावेजों, कलाकृतियों और सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है। वे संरक्षण संबंधी परामर्श, शोध तथा प्रशिक्षण के माध्यम से देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
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दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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भारत को दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में गिना जाता है। यहां के किले, महल, बावड़ियां, मंदिर, स्मारक, लोक परंपराएं और सांस्कृतिक धरोहरें केवल इतिहास की निशानियां नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का प्रतिबिंब हैं। लेकिन तेजी से बदलती दुनिया, शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की कमी के बीच इन धरोहरों का संरक्षण एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इन्हीं विषयों पर राइजिंग भास्कर ने हेरिटेज विशेषज्ञ विक्रम सिंह राठौड़ से विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश।
प्रश्न 1: सबसे पहले यह बताइए कि हेरिटेज क्या है और इसके कितने प्रकार होते हैं?
विक्रम सिंह राठौड़: हेरिटेज अर्थात विरासत वह धरोहर है जो हमें हमारे पूर्वजों से प्राप्त होती है और जिसे हम आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखते हैं। सामान्यतः हेरिटेज को दो प्रमुख वर्गों में बांटा जाता है। पहला है टेंजिबल (Tangible) हेरिटेज, अर्थात वह विरासत जिसे हम देख और छू सकते हैं। इसमें किले, महल, स्मारक, मंदिर, बावड़ियां, ऐतिहासिक इमारतें, मूर्तियां और पुरातात्विक स्थल शामिल हैं। दूसरा है इंटेंजिबल (Intangible) हेरिटेज, अर्थात वह विरासत जिसे छुआ नहीं जा सकता, लेकिन जो हमारी संस्कृति और पहचान का हिस्सा है। इसमें लोककथाएं, लोकगीत, पारंपरिक ज्ञान, रीति-रिवाज, हस्तशिल्प, भाषाएं और सांस्कृतिक परंपराएं शामिल हैं। यदि हम राजस्थान की बात करें तो यहां दोनों प्रकार की विरासतें अत्यंत समृद्ध रूप में मौजूद हैं।
प्रश्न 2: वर्तमान समय में हेरिटेज संरक्षण इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है?
विक्रम सिंह राठौड़: आज का युग तीव्र विकास का युग है। शहरों का विस्तार हो रहा है, नई परियोजनाएं बन रही हैं और आधुनिक जीवनशैली तेजी से बदल रही है। ऐसे में यदि हम अपनी विरासत को संरक्षित नहीं करेंगे तो आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास और सांस्कृतिक जड़ों से कट जाएंगी। हेरिटेज केवल अतीत की याद नहीं है, बल्कि यह हमारी पहचान, हमारी सभ्यता और हमारे विकास की कहानी भी है। किसी भी देश की सांस्कृतिक ताकत उसकी विरासत में निहित होती है। संरक्षण के माध्यम से हम इतिहास को सुरक्षित रखते हैं और आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देते हैं कि उनके पूर्वजों ने किस प्रकार का सामाजिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य विकास किया था।
प्रश्न 3: क्या हेरिटेज संरक्षण पर्यटन और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है?
विक्रम सिंह राठौड़: बिल्कुल। वास्तव में हेरिटेज संरक्षण का सबसे बड़ा लाभ पर्यटन के क्षेत्र में दिखाई देता है। जब किसी किले, महल, स्मारक या ऐतिहासिक स्थल का संरक्षण किया जाता है, तो वह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाता है। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है, होटल उद्योग विकसित होता है, हस्तशिल्प को बढ़ावा मिलता है और पूरे क्षेत्र की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। राजस्थान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां के किले और महल विश्वभर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। यदि इन धरोहरों का संरक्षण न किया जाए तो पर्यटन उद्योग पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। इसलिए हेरिटेज संरक्षण केवल सांस्कृतिक दायित्व नहीं, बल्कि आर्थिक विकास का भी महत्वपूर्ण माध्यम है।
प्रश्न 4: भारत जैसे विशाल देश में हेरिटेज संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?
विक्रम सिंह राठौड़: भारत की सबसे बड़ी चुनौती इसकी विशालता और विरासत की व्यापकता है। हमारे देश में हजारों स्मारक, ऐतिहासिक भवन और पुरातात्विक स्थल मौजूद हैं। इन सभी का संरक्षण करना आसान कार्य नहीं है। सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हैं—पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की कमी, प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी, तकनीकी ज्ञान का अभाव, अवैध अतिक्रमण, अनियोजित शहरीकरण, जागरूकता की कमी, प्राकृतिक आपदाएं और जलवायु परिवर्तन। इन चुनौतियों का समाधान केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए समाज, निजी क्षेत्र और विशेषज्ञ संस्थाओं की भी भागीदारी आवश्यक है।
प्रश्न 5: क्या आपको लगता है कि भारत में हेरिटेज मैनेजमेंट को लेकर पर्याप्त जागरूकता नहीं है?
विक्रम सिंह राठौड़: यह कहना गलत नहीं होगा कि अभी भी व्यापक स्तर पर जागरूकता की कमी है। कई बार लोग अनजाने में ऐतिहासिक इमारतों को नुकसान पहुंचा देते हैं। कहीं दीवारों पर नाम लिख दिए जाते हैं, कहीं अवैध निर्माण हो जाते हैं और कहीं पुरानी संरचनाओं की अनदेखी की जाती है। यदि समाज को यह समझ आ जाए कि विरासत केवल सरकार की नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है, तो संरक्षण की दिशा में बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है।
प्रश्न 6: जलवायु परिवर्तन का हेरिटेज संरक्षण पर कितना प्रभाव पड़ रहा है?
विक्रम सिंह राठौड़: पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन हेरिटेज संरक्षण के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। अत्यधिक वर्षा, बढ़ता तापमान, आर्द्रता में परिवर्तन, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक घटनाएं ऐतिहासिक संरचनाओं को नुकसान पहुंचा रही हैं। कई स्मारकों की दीवारों में दरारें पड़ रही हैं, पत्थरों का क्षरण बढ़ रहा है और संरचनाओं की मजबूती प्रभावित हो रही है। इसलिए अब संरक्षण की पारंपरिक पद्धतियों के साथ-साथ जलवायु-अनुकूल संरक्षण रणनीतियों को अपनाना जरूरी हो गया है।
प्रश्न 7: हेरिटेज संरक्षण में सरकार और निजी क्षेत्र की क्या भूमिका होनी चाहिए?
विक्रम सिंह राठौड़: आज के समय में केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। सरकार को नीतियां बनानी चाहिए, वित्तीय सहायता उपलब्ध करानी चाहिए और संरक्षण कार्यों की निगरानी करनी चाहिए। वहीं निजी क्षेत्र को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के माध्यम से आगे आना चाहिए। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत भी अनेक ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण में योगदान दिया जा सकता है। जब सरकार, विशेषज्ञ और निजी क्षेत्र मिलकर कार्य करेंगे, तभी बड़े स्तर पर संरक्षण संभव होगा।
प्रश्न 8: हेरिटेज मैनेजमेंट में प्रशिक्षित विशेषज्ञों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है?
विक्रम सिंह राठौड़: यह अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। यदि किसी ऐतिहासिक संरचना पर बिना तकनीकी समझ के कार्य किया जाए तो लाभ के बजाय नुकसान हो सकता है। हेरिटेज संरक्षण के लिए ऐसे विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है जो इतिहास, पुरातत्व, वास्तुकला, संरचनात्मक इंजीनियरिंग, पर्यटन, पर्यावरण और प्रबंधन की समझ रखते हों।
गलत तरीके से किए गए संरक्षण कार्य कई बार मूल संरचना को स्थायी नुकसान पहुंचा देते हैं। इसलिए प्रशिक्षित और योग्य विशेषज्ञों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 9: भारत में हेरिटेज मैनेजमेंट की पढ़ाई और करियर के अवसर क्या हैं?
विक्रम सिंह राठौड़: आज हेरिटेज मैनेजमेंट तेजी से उभरता हुआ क्षेत्र है।
इस क्षेत्र में डिप्लोमा, पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा, मास्टर डिग्री और विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम उपलब्ध हैं। कुछ विश्वविद्यालय दो वर्षीय मास्टर डिग्री कार्यक्रम संचालित कर रहे हैं, वहीं कई संस्थान छह माह से एक वर्ष तक के विशेष कोर्स भी चलाते हैं। इस क्षेत्र में करियर की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। छात्र निम्न क्षेत्रों में अवसर प्राप्त कर सकते हैं—हेरिटेज मैनेजर,
कंजर्वेशन स्पेशलिस्ट, म्यूजियम क्यूरेटर, आर्कियोलॉजिकल रिसर्चर, टूरिज्म प्लानर, हेरिटेज कंसल्टेंट, सांस्कृतिक परियोजना प्रबंधक।
प्रश्न 10: युवाओं को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
विक्रम सिंह राठौड़: मैं युवाओं से कहना चाहूंगा कि वे अपनी विरासत को केवल पुराने स्मारकों के रूप में न देखें। यह हमारी पहचान, हमारी संस्कृति और हमारे गौरव का प्रतीक है। यदि हम अपनी विरासत को बचाएंगे तो आने वाली पीढ़ियां भी अपने इतिहास से जुड़ी रहेंगी।
युवाओं को हेरिटेज संरक्षण अभियानों में भाग लेना चाहिए, ऐतिहासिक स्थलों का सम्मान करना चाहिए और समाज में जागरूकता फैलानी चाहिए। भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत केवल पत्थरों की बनी इमारतें नहीं हैं, बल्कि यह हमारी सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान की जीवंत धरोहर है। यदि आज संरक्षण के प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां इतिहास के अनेक अमूल्य अध्यायों से वंचित रह जाएंगी। सरकार, निजी क्षेत्र, विशेषज्ञ संस्थाएं और आम नागरिक मिलकर ही इस जिम्मेदारी को निभा सकते हैं। जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और संसाधनों की चुनौतियों के बीच हेरिटेज संरक्षण केवल सांस्कृतिक आवश्यकता नहीं बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व भी बन चुका है। विरासत का संरक्षण दरअसल अतीत को बचाने का नहीं, बल्कि भविष्य को सुरक्षित करने का अभियान है। यही संदेश आज भारत के प्रत्येक नागरिक तक पहुंचना चाहिए।






