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Wednesday, July 8, 2026, 11:26 pm

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फादर्स डे : दो प्रेरक पत्र- पिता के नाम

21 जून 2026 को फादर्स डे है। हमारे लिए तो रोज ही फादर्स डे हैं। पर जब एक परंपरा है तो उसका निर्वहन करना भी एक जिम्मेदारी है। वैसे जिम्मेदारियों से ना एक पिता भागता है ना एक बेटा। क्योंकि आने वाले समय में बेटा भी जब एक पिता बनता है तो पता चलता है कि पिता होने के मायने क्या है। राइजिंग भास्कर का ग्रुप एडिटर होने के नाते मैं अपने पिता श्री बालकिशन पुरोहित और मेरी धर्मपत्नी श्रीमती राखी पुरोहित अपने पिता श्री बृजकिशोर व्यास के नाम मार्मिक व भावनात्मक पत्र लिखते हुए पाठकों को बताना चाहते हैं कि पिता का जिनके सिर पर आशीर्वाद है वे दुनिया के सबसे अमीर आदमी हैं। – संपादक
राइजिंग भास्कर. जोधपुर 
प्रिय पापा श्री बालकिशन पुरोहित जी,

सादर चरण स्पर्श।

फादर्स डे के इस पावन अवसर पर जब मैं आपको यह पत्र लिखने बैठा हूँ, तब मन अनेक स्मृतियों, भावनाओं और कृतज्ञता से भर उठा है। जीवन में कुछ ऋण ऐसे होते हैं जिन्हें कोई संतान कभी चुका नहीं सकती। माता-पिता का ऋण उनमें सबसे बड़ा होता है। यह पत्र भी आपके प्रति मेरे मन में बसे सम्मान, प्रेम और कृतज्ञता की एक छोटी-सी अभिव्यक्ति मात्र है।

पापा, जीवन पथ पर चुनौतियों का सामना करना मैंने आपसे सीखा है। आज जब लोग मेरी पत्रकारिता, मेरे संघर्षों या मेरी उपलब्धियों की चर्चा करते हैं, तब मुझे लगता है कि वे उस वृक्ष को देख रहे हैं जिसकी जड़ें आपने अपने पसीने, अपने त्याग और अपने संघर्षों से सींची थीं।

मुझे याद है कि आपने हम सब भाई-बहनों का पालन-पोषण करने के लिए कितनी कठिन परिस्थितियों का सामना किया। आपने 15 पैसे प्रति सीमेंट कट्टा उठाकर मजदूरी की। आज की पीढ़ी शायद कल्पना भी नहीं कर सकती कि परिवार को दो वक्त की रोटी देने के लिए कोई व्यक्ति कितनी कठोर मेहनत करता होगा। लेकिन आपने कभी शिकायत नहीं की। आपने कभी परिस्थितियों को दोष नहीं दिया। आपने हमेशा कर्म को ही अपना धर्म माना।

कभी चाय की दुकान लगाई, कभी दूसरी नौकरियाँ कीं। आपने एमईएस जैसी अनुशासित और कठोर सेवा में काम किया। भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय देशहित में गड्ढे खोदने जैसे कठिन कार्य भी किए। आपने जीवन में अनेक प्रकार की जिम्मेदारियाँ निभाईं। अंततः अस्पताल में रोगियों की सेवा को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में काम करते हुए आपने यह सिद्ध कर दिया कि कोई काम छोटा नहीं होता। छोटा या बड़ा केवल मनुष्य का दृष्टिकोण होता है। ईमानदारी और निष्ठा से किया गया हर कार्य महान होता है।

पापा, आपने कभी हमें अमीरी के सपने नहीं दिखाए, लेकिन आपने हमें आत्मसम्मान का मूल्य सिखाया। आपने हमें सिखाया कि मनुष्य की असली पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि उसके चरित्र से होती है। आपने हमें यह भी सिखाया कि कठिनाइयों से भागने वाला व्यक्ति कभी जीवन में विजेता नहीं बन सकता।

आपका सपना था कि मैं आईएएस अधिकारी बनूँ। आपने हमेशा चाहा कि आपका बेटा प्रशासनिक सेवा में जाकर बड़ा अधिकारी बने। लेकिन शायद नियति ने मेरे लिए कोई दूसरा रास्ता चुना था। जब मैं हिन्दुस्तान अखबार में रिपोर्टर बना और मुझे समाज के वास्तविक प्रश्नों, पीड़ाओं और संघर्षों को देखने का अवसर मिला, तब मुझे महसूस हुआ कि मेरी मंजिल कुछ और है।

जब मैंने देखा कि आम आदमी की आवाज़ कितनी बार अनसुनी रह जाती है, तब मैंने तय किया कि मुझे कुर्सी का अधिकारी नहीं, बल्कि कलम का सिपाही बनना है। मैंने निश्चय किया कि मैं पत्रकारिता के माध्यम से समाज के प्रश्नों को उठाऊँगा, पीड़ितों की आवाज़ बनूँगा और सच्चाई के पक्ष में खड़ा रहूँगा।

पापा, आपने अपनी नौकरियों में कभी किसी अधिकारी की अनुचित खुशामद नहीं की। आपने आत्मसम्मान के साथ जीवन जिया। मुझे आज भी आपका वह किस्सा याद है जब आपने एक रोगी का अपमान करने वाले डॉक्टर का विरोध किया था। उस घटना ने मेरे मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। मैंने सीखा कि अन्याय चाहे किसी भी रूप में सामने आए, उसका विरोध करना चाहिए।

शायद यही कारण है कि मैंने भी अपने जीवन में यह संकल्प लिया कि मेरी कलम कभी अन्याय के सामने नहीं झुकेगी। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मैं सत्य का साथ नहीं छोड़ूँगा। पत्रकारिता मेरे लिए केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व है।

पापा, जीवन में ऐसे अनेक अवसर आए जब मैं टूट सकता था। कई बार संघर्ष इतने कठिन लगे कि आगे का रास्ता दिखाई नहीं देता था। कभी आर्थिक चुनौतियाँ सामने आईं, कभी पेशेगत कठिनाइयाँ, कभी रिश्तों और जिम्मेदारियों का दबाव। लेकिन हर बार मुझे आपके संघर्ष याद आए। मैं सोचता था कि जिस व्यक्ति ने 15 पैसे के लिए सीमेंट के कट्टे उठाए, जिसने परिवार के लिए अपना जीवन खपा दिया, उसका बेटा इतनी आसानी से हार कैसे मान सकता है?

आपकी मेहनत मेरी प्रेरणा बनती गई और मैं आगे बढ़ता गया।

आज मैं यह भी महसूस करता हूँ कि जीवन की इस यात्रा में मेरी धर्मपत्नी राखी पुरोहित का साथ मेरे लिए ईश्वर का आशीर्वाद है। हमने मिलकर अनेक कठिन दौर देखे हैं और आगे भी जो भी चुनौतियाँ आएँगी, उनका सामना साथ मिलकर करेंगे। भाइयों की शुभकामनाएँ, बहन का स्नेह, आपका आशीर्वाद और मम्मी की ममता हमारे जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है।

पापा, जोधपुर में व्यस्तताओं के कारण मैं लंबे समय तक जैसलमेर नहीं आ पाता। यह बात मुझे कई बार भीतर से उदास करती है। लेकिन यह सोचकर संतोष मिलता है कि आप मम्मी का पूरा ध्यान रखते हैं। उनकी सेवा करते हैं। आपकी इस जिम्मेदारी के कारण मैं अपने कर्तव्यों का निर्वहन निश्चिंत होकर कर पाता हूँ।

दूरी भले ही हमें भौगोलिक रूप से अलग करती हो, लेकिन प्रेम और विश्वास की डोर हमें हर पल जोड़े रखती है। आपकी जीवन भर की तपस्या ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है। उसी पूँजी के बल पर मुझे अभी बहुत आगे जाना है।

मुझे यह देखकर भी संतोष होता है कि आपका पोता श्रेयस अब जिम्मेदारियों को समझने लगा है। मुझे विश्वास है कि वह भी अपने परिश्रम और संस्कारों के बल पर जीवन में अपना मुकाम बनाएगा। मैं चाहता हूँ कि वह भी आपसे वही सीखे जो मैंने सीखा—ईमानदारी, आत्मसम्मान, परिश्रम और मानवता।

पापा, जीवन के इस लंबे सफर में मुझे अनेक अच्छे लोग मिले। कुछ ने मार्गदर्शन दिया, कुछ ने सहयोग किया और कुछ ने केवल एक अच्छा शब्द कहकर मेरा उत्साह बढ़ाया। मैं उन सभी लोगों का ऋणी हूँ। मैंने हमेशा यह सिद्धांत अपनाया है कि भलाई का उत्तर भलाई से देना चाहिए। जिन्होंने मेरे जीवन में प्रकाश दिया, उन्हें मैं कभी नहीं भूल सकता।

और जिन्होंने मेरे मार्ग में काँटे बिछाने का प्रयास किया, उनके लिए भी मेरे मन में कोई द्वेष नहीं है। उन्हें दंड देना मेरा काम नहीं, ईश्वर का काम है। मैं केवल अपने कर्मों पर विश्वास करता हूँ।

पुनः मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि आपकी दी हुई सीख के अनुसार मैं अपनी कलम को पीड़ित मानवता, सत्य और न्याय के लिए समर्पित रखूँगा। यदि मेरी लेखनी किसी जरूरतमंद के काम आ सके, किसी पीड़ित को न्याय दिला सके या किसी निराश व्यक्ति में आशा जगा सके, तो मैं समझूँगा कि आपके संस्कारों का कुछ अंश मुझमें जीवित है।

पापा, मेरे जीवन में भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति भी मुझे निरंतर शक्ति देती है। मैं उन्हें अपना सारथी मानता हूँ। जब-जब जीवन के कुरुक्षेत्र में कठिनाइयाँ सामने आती हैं, तब-तब मुझे लगता है कि वे मेरे रथ के आगे खड़े हैं और कह रहे हैं—”कर्म करो, परिणाम की चिंता मत करो।”

इसी विश्वास के कारण मैं कभी घबराता नहीं हूँ। चुनौतियाँ आती हैं, लेकिन मुझे भयभीत नहीं कर पातीं। आज फादर्स डे पर मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि यदि इस जन्म में आपके उपकारों का एक छोटा-सा भाग भी चुका सका तो स्वयं को सौभाग्यशाली मानूँगा। आपकी मेहनत, आपका संघर्ष, आपका प्रेम और आपके संस्कार मेरे जीवन की सबसे बड़ी धरोहर हैं।

ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि आपका साया सदैव हमारे सिर पर बना रहे। आपका स्वास्थ्य अच्छा रहे, आपकी मुस्कान बनी रहे और आपका आशीर्वाद हमें हमेशा मिलता रहे। यदि अगले जन्म का कोई सत्य है, तो मेरी यही कामना है कि हर जन्म में मुझे आपका पुत्र बनने का सौभाग्य प्राप्त हो।

आपका पुत्र,

दिलीप कुमार पुरोहित

ग्रुप एडिटर
राइजिंग भास्कर

प्रिय पापा श्री बृजकिशोर जी व्यास,

सादर चरण स्पर्श।

फादर्स डे के इस विशेष अवसर पर जब मैं कलम उठाकर आपको पत्र लिखने बैठी हूँ, तब शब्द बार-बार भावनाओं के आगे छोटे पड़ जाते हैं। जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनका मूल्य किसी उपमा, किसी परिभाषा या किसी शब्दकोश में नहीं मिलता। पिता का रिश्ता उन्हीं में से एक है। पिता वह छत है जो धूप में तपती है ताकि बच्चों को छाया मिल सके। पिता वह दीपक है जो स्वयं जलता है ताकि परिवार का रास्ता रोशन हो सके। और मेरे लिए, पापा, आप केवल मेरे पिता ही नहीं, बल्कि मेरे जीवन के प्रथम शिक्षक, प्रथम प्रेरक, प्रथम मार्गदर्शक और मेरे व्यक्तित्व के शिल्पकार हैं।

आज जब मैं अपने जीवन की उपलब्धियों, संघर्षों और सपनों की ओर पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो हर रास्ता आकर आपके चरणों में समाप्त होता दिखाई देता है। मेरी हर सफलता के पीछे आपका त्याग खड़ा दिखाई देता है। मेरी हर मुस्कान के पीछे आपकी अनगिनत चिंताएँ दिखाई देती हैं। मेरी हर उपलब्धि के पीछे आपकी वह तपस्या दिखाई देती है, जिसे शायद आपने कभी तपस्या माना ही नहीं, क्योंकि आपके लिए परिवार ही आपका धर्म था, परिवार ही आपकी साधना थी और परिवार ही आपकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी।

पापा, आपने और मम्मी श्रीमती विजयलक्ष्मी व्यास ने जिस परिवार रूपी पौधे को अपने स्नेह, संस्कार और संघर्षों के जल से सींचा, वह आज एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका है। हम दोनों बहनें—श्रीमती अंजुलता पुरोहित और मैं, राखी पुरोहित—तथा हमारे दोनों भाई अरविंद व्यास और विनोद व्यास, आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में जो भी हैं, वह आपकी मेहनत, आपके संस्कार और आपके विश्वास का परिणाम है।

आपका जीवन किसी प्रेरक पुस्तक से कम नहीं है। रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में अपनी यात्रा प्रारंभ करना और अपनी कर्मनिष्ठा, ईमानदारी तथा अद्भुत कार्यक्षमता के बल पर कार्यालय अधीक्षक के पद तक पहुँचना कोई साधारण उपलब्धि नहीं है। यह उस व्यक्ति की कहानी है जिसने परिस्थितियों को अपनी नियति नहीं बनने दिया, बल्कि अपने परिश्रम से अपनी नियति स्वयं लिखी।

मुझे आज भी लगता है कि आपने जीवन भर स्वयं सफर किया ताकि आपका परिवार सफर न करे। आपने रेल की पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों के साथ अपना समय, अपनी ऊर्जा और अपने सपने समर्पित कर दिए, ताकि आपके बच्चों के सपनों को पंख मिल सकें। आपने कभी दिन नहीं देखा, कभी रात नहीं देखी। आपने केवल अपने बच्चों का भविष्य देखा। आपने कभी अपनी इच्छाओं का हिसाब नहीं रखा, लेकिन हमारी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखा।

जब दूसरे लोग अपने लिए सपने देखते थे, तब आप हमारे लिए सपने देखते थे। जब दूसरे लोग अपनी खुशियों की योजना बनाते थे, तब आप हमारे भविष्य की योजना बनाते थे। शायद यही कारण है कि आज हम सभी भाई-बहन अपने-अपने जीवन में सम्मानपूर्वक खड़े हैं।

पापा, आपके आशीर्वाद से मुझे राइजिंग भास्कर में एडिटर-इन-चीफ की जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिला। यह केवल एक पद नहीं है, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व का एक बड़ा दायित्व है। इसके साथ ही आकाशवाणी में सूत्रधार के रूप में जो जिम्मेदारी मुझे मिली है, वह भी मेरे लिए गौरव का विषय है। एक लेखिका, पत्रकार, कवयित्री, गायिका और कहानीकार के रूप में जो पहचान मुझे मिली है, उसकी जड़ें भी आपके संस्कारों में ही हैं।

आपने मुझे सिखाया कि सफलता का अर्थ केवल ऊँचे पद पर पहुँचना नहीं होता, बल्कि अच्छे इंसान बने रहना होता है। आपने सिखाया कि ईमानदारी कभी पुरानी नहीं होती। आपने सिखाया कि संघर्ष जीवन का अभिशाप नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की प्रक्रिया है। आपने सिखाया कि यदि रास्ता कठिन हो तो भी सिद्धांतों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

आज फादर्स डे पर मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि यदि आपकी सीख, आपका संरक्षण और आपका आशीर्वाद न होता, तो मैं यहाँ तक कभी नहीं पहुँच पाती। लेकिन पापा, मैं यह भी जानती हूँ कि मेरा सफर अभी समाप्त नहीं हुआ है। अभी बहुत दूर तक जाना है। अभी सफलता के कई नए अध्याय लिखने हैं। अभी अनेक सपनों को साकार करना है। रास्ता लंबा है, चुनौतियाँ भी आएँगी, समय भी परीक्षा लेगा, लेकिन मुझे विश्वास है कि आपके सिद्धांतों की पगडंडी पर चलते हुए मैं अपने सपनों का महल अवश्य खड़ा करूँगी।

मैं आज आपके चरण स्पर्श करते हुए एक संकल्प लेना चाहती हूँ। मैं पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसा कोई कार्य नहीं करूँगी जिससे आपके सिद्धांतों को ठेस पहुँचे। मैं अपनी लेखनी को सदैव सत्य, संवेदना और समाजहित के लिए समर्पित रखूँगी। यदि कभी मेरी कलम किसी गरीब की पीड़ा को आवाज दे सके, किसी जरूरतमंद की आँखों के आँसू पोंछ सके, किसी वंचित व्यक्ति के जीवन में आशा का दीप जला सके, तो मैं समझूँगी कि आपके संघर्षों की तपस्या सफल हो रही है।

पापा, आपने मुझे जीवनसाथी के रूप में दिलीप कुमार पुरोहित जैसा व्यक्तित्व दिया, इसके लिए मैं आपका जितना धन्यवाद करूँ उतना कम है। वे केवल मेरे पति ही नहीं, बल्कि मेरे मित्र, मेरे मार्गदर्शक और मेरे सपनों के सहयात्री हैं। राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर के रूप में वे निरंतर मेरा उत्साह बढ़ाते हैं। हमारा आपसी विश्वास हमारी सबसे बड़ी ताकत है और आपका आशीर्वाद हमारी सबसे बड़ी पूँजी।

जब भी जीवन कठिन मोड़ पर खड़ा होता है, तब आपकी बातें, आपकी सीख और आपका संघर्ष हमें नई दिशा दिखाते हैं। ऐसा लगता है जैसे अंधेरे रास्तों में कोई दीपक जल उठा हो। आपकी प्रेरणा हमें हर दिन नई ऊर्जा देती है और आगे बढ़ने का साहस प्रदान करती है।

अच्छा पापा, आज अपनी बात को यहीं विराम देती हूँ। आपसे अभी बहुत सारी बातें करनी हैं। अगली बार जब जैसलमेर आऊँगी तो घंटों आपके पास बैठकर पुरानी यादों के पन्ने पलटूँगी। आपके अनुभव सुनूँगी, आपकी हँसी सुनूँगी और आपके स्नेह का वही स्पर्श फिर महसूस करूँगी, जिसने हमेशा मुझे मजबूत बनाया है।

ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि आपको दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और निरंतर प्रसन्नता प्रदान करे। आपका आशीर्वाद सदैव हम सब पर बना रहे। यही हमारी सबसे बड़ी संपत्ति है, यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है और यही हमारी सबसे बड़ी पहचान है।

आपकी पुत्री

राखी पुरोहित
एडिटर इन चीफ
राइजिंग भास्कर
Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor