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Thursday, July 9, 2026, 12:04 am

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भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति और पहचान :  प्रो. (डॉ.) गायत्रीबाला पांडा

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर 

9783414079 diliprakhai@gmail.com

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित ओड़िया की सुप्रसिद्ध कवयित्री प्रो. (डॉ.) गायत्रीबाला पांडा ने कहा है कि भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति और पहचान है।

वे मंगलवार को यहां उनके सम्मान में कथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान की ओर आयोजित एक साहित्यिक गोष्ठी को संबोधित कर रही थीं।
इस अवसर उन्होंने साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत अपनी उड़िया काव्य कृति ‘दयानदी’ के राजस्थानी अनुवाद के लिए सुप्रतिष्ठ राजस्थानी साहित्यकार, कवि एवं अनुवादक मीठेश निर्मोही का विशेष आभार व्यक्त करते हुए कहा कि अनुवाद केवल भाषा का नहीं, बल्कि संस्कृति, संवेदना और जीवन-दृष्टि का भी रूपांतरण है। एक भाषा की आत्मा को दूसरी भाषा में सजीव बनाए रखना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है, जिसे मीठेश निर्मोही ने अपनी संवेदनशीलता, समर्पण और साहित्यिक दक्षता सफलतापूर्वक निभाया है।

यहां उम्मेद चौक स्थित राजोला भवन में प्रख्यात शायर एवं उपन्यासकार हबीब कैफ़ी की अध्यक्षता में आयोजित इस गोष्ठी में अपने संबोधन में प्रो. (डॉ.) पांडा ने यह भी कहा कि राजस्थान सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध प्रदेश है। जोधपुर की अपनी पहली यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहां की संस्कृति, इतिहास और आत्मीयता का अनुभव उनके लिए अत्यंत सुखद एवं अविस्मरणीय रहा। उन्होंने कथा संस्थान की ओर से किए गए सम्मान के लिए कथा संस्थान,उस से जुड़े साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों के प्रति आभार भी व्यक्त किया।

इस अवसर पर अपनी साहित्यिक यात्रा का उल्लेख करते हुए प्रो. (डॉ.) पांडा ने यह बताया कि वे छह–सात वर्ष की आयु से ही कविता लिख रही हैं और उनकी सृजन-यात्रा आज भी निरंतर जारी है। उन्होंने कहा कि कविता उनके लिए जीवन, समाज और मनुष्य की संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने का सबसे प्रभावी माध्यम है।

इस अवसर पर उन्होंने अपने चर्चित काव्य-संग्रह ‘दयानदी’ से कविता ‘दयानदी’ तथा तथा अपनी अन्य तीन चर्चित कविताओं ‘देवीपीठ’, ‘कुंभमेला’ और ‘आदिवासी’ शीर्षक कविताओं का प्रभावपूर्ण पाठ किया। उपस्थित श्रोताओं ने उनकी कविताओं में निहित मानवीय सरोकारों, सांस्कृतिक चेतना तथा प्रकृति-बोध तथा मीठेश निर्मोही द्वारा प्रस्तुत “दया नदी” शीर्षक कविता के राजस्थानी अनुवाद, गोष्ठी के अध्यक्ष हबीब कैफ़ी की की ग़ज़ल हो सकता है कल पढ़े अख़बार में/इश्क़ बिकने आया है बाजार में, राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कृत डॉ.पद्मजा शर्मा के गीत- “बिटिया कैसे धरूं मैं अब धीर ” दशरथ कुमार सोलंकी ने’सत्य के साथ छल’ तथा कुलदीप भाटी ने ‘प्रूफ रीडर और हाशिए के लोग ‘शीर्षक, कमलेश तिवारी,जितेन्द्र जालोरी आदि ने अपनी प्रतिनिधि कविताओं का पाठ किया जिसे खूब सराहा गया।

इससे पूर्व कथा संस्थान के सचिव साहित्यकार मीठेश निर्मोही ने अतिथि साहित्यकार प्रो. (डॉ.) गायत्रीबाला पांडा को शॉल ओढ़ाकर तथा उपस्थित सभी साहित्यकारों ने माल्यार्पण कर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन आकाशवाणी के पूर्व केन्द्र निदेशक एवं साहित्यकार डॉ. कालूराम परिहार ने किया।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor