कवि : डॉ. राजगोपाल करवा, सोलापुर
“यह क्या कम है…”
हमने आपसे सिर्फ मोहब्बत की नहीं थी,
उसे अपनी रूह में उतारा था।
जो कुछ अपना था हमारे पास,
सब आपके नाम कर डाला था।
फिर भी न जाने तुम्हारे दिल में,
कौन-सी एक कमी रह गई,
जिसे भरने की कोशिश में
हमारी पूरी जिंदगी ही गुजर गई।
तुम हमारे नहीं, तो क्या ग़म है,
हम तुम्हारे तो हैं — यह क्या कम है।
दोस्ती भी हमने
कोई रिश्ता समझकर नहीं निभाई थी,
वह तो दिल की आदत बन गई थी,
जो हर हाल में साथ निभाती थी।
उसमें न हिसाब था,
न कोई सौदा, न शर्तें थीं,
बस कुछ सच्चे एहसास थे,
और कुछ मासूम सी उम्मीदें थीं।
फिर भी शायद हमारी वफ़ा,
तुम्हारे दिल को छू न पाई।
तुम हमारे नहीं, तो क्या ग़म है,
हम तुम्हारे तो हैं — यह क्या कम है।
काम को हमने काम नहीं,
अपनी पहचान बना लिया था,
दिन-रात की मेहनत से
अपने सपनों को सजाया था।
पर अफसोस इतना है कि
मेहनत नहीं देखी गई,
कुछ चेहरों के बदलते रंगों में
हमारी सादगी और सच्चाई कहीं हार गई।
“दुनिया ने पहचाना नहीं, तो क्या ग़म है
हम खुद को तो पहचानते हैं — यह क्या कम है।”
हमेशा सच का हाथ थामा,
हर दर्द को हँसकर सह लिया,
सबको खुशियाँ बाँटते-बाँटते
खुद को कहीं पीछे छोड़ दिया।
फिर इस दुनिया ने भी
अपना रंग दिखा ही दिया,
दिल ने मुस्कुराते हुए कहा —
“और इसे भी जिंदगी का तजुर्बा समझ लिया।”
अब बस एक सवाल
अक्सर मन में आता है —
झूठे-सच्चे सपनों के सहारे,
खुद को समझाते रहना…
हर बार टूटकर भी,
फिर मुस्कुराते रहना…
“कभी-कभी थक जाता है मन,
अपने ही सवालों का बोझ उठाते-उठाते,
फिर चुपचाप खुद से पूछता है —”
आख़िर कब तक…?
आख़िर कब तक…?
कुछ पल खामोश रहा मन
तभी भीतर से एक आवाज़ आई —
“जब तक रगों में लहू है,
और साँसों में रवानी है,
तब तक मुस्कुराना ही
अपनी असली कहानी है।”
जो खो गया सफर में,
उसका अब मलाल क्या,
सच्चाई की राह पर,
हार-जीत का सवाल क्या?
ग़म इस बात का नहीं कि
दुनिया ने क्या किया या क्या दिया
फ़ख्र इस बात का है कि
हमने कभी हमारा दामन मैला नहीं होने दिया।
कोई हमारा नहीं, तो क्या ग़म है,
हम खुद के तो हैं – यह क्या कम है?
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बदल गया हूं
मैं…
मैं कुछ बदल गया हूँ।
मैं शांत हो गया हूँ।
मैं तृप्त हो गया हूँ।
मानो मेरा नया जन्म हुआ है।
मेरे मन के अनुसार हो या न हो,
मेरी इच्छा के अनुसार घटे या न घटे,
जो मैं चाहता हूँ वह मिले या न मिले,
जो मैं सोचता हूँ वैसा हो या न हो,
फिर भी मैं निश्चिंत हूँ।
फिर भी मैं व्यस्त हूँ।
फिर भी मैं स्वस्थ हूँ।
और सबसे बड़ी बात—
मैं खुश हूँ।
अब मुझे किसी बदलाव की अपेक्षा नहीं,
किसी सुधार की ज़िद भी नहीं।
मैं अब भावनाओं के बहाव में नहीं बहता,
और सम्मान की प्यास भी शेष नहीं रही।
मैं स्वयं में ही प्रसन्न हूँ,
अपने काम में ही मग्न हूँ।
आज में जी रहा हूँ,
मैं जैसा हूँ, वैसा ही पूर्ण हूँ।
अब मुझे दुनिया की अपेक्षाओं की परवाह नहीं।
सांसारिक शोर-शराबे से थोड़ा दूर हूँ।
अपने ही अंतर्मन में झाँक रहा हूँ,
अपने भीतर के प्रसन्न इंसान को खोज रहा हूँ।
उसे समझने का प्रयास कर रहा हूँ,
स्वयं से प्रेम करना सीख रहा हूँ।
उसी से शांति का अनुभव हो रहा है,
और उसी शांति में सच्चा आनंद छिपा है।
अब मुझे किसी बात की जल्दी नहीं,
किसी बात का अफ़सोस भी नहीं।
जो हुआ, शायद वही उचित था,
और जो होगा, उसे भी स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ।
मैं इस दुनिया से दूर नहीं हुआ हूँ,
बल्कि स्वयं के और अधिक निकट आ गया हूँ।
और शायद…
यही जीवन का सच्चा सार है।
यह अनुवाद मूल मराठी कविता की आत्मा, सरलता और आध्यात्मिक भाव को बनाए रखता है, साथ ही हिंदी में स्वाभाविक और साहित्यिक प्रवाह भी देता है।
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आनंद”…
“आनंद तुम्हें कहाँ मिलता है?”
एक मित्र ने मुझसे सहज ही पूछा।
मैं उसकी ओर देखकर हल्के से मुस्कुराया और कहा—
“आनंद कहीं नहीं मिलता।
वह खोजने की कोई चीज नहीं है।”
उसने फिर पूछा,
“तो फिर तुम हमेशा इतने खुश कैसे रहते हो?”
मैंने शांत स्वर में कहा—
“अरे पगले,
मेरा आनंद मेरे पास है,
और तुम्हारा आनंद तुम्हारे ही पास है।
हम स्वयं को ही आनंदित रख सकते हैं,
कोई दूसरा हमें आनंदी नहीं रख सकता।”
आनंद तो….
एक छोटे से मासूम बच्चे जैसा होता है।
उसे स्नेह से दुलारना पड़ता है,
प्यार से गले लगाना पड़ता है,
उसके साथ मन की बातें करनी पड़ती हैं।
मुस्कुराकर उसके सामने जाना पड़ता है,
तब वह हम पर प्रसन्न हो जाता है।
सच कहूँ…
आनंद बहुत सरल होता है,
साफ होता है
निर्मल होता है,
निष्कलुष होता है।
उसे हमसे कोई बड़ी अपेक्षाएँ नहीं होतीं।
बस उसे चाहिए होता है…
थोड़ा-सा निष्कपट मन,
थोड़ा-सा प्रेम,
और एक छोटा-सा प्रयास।
एक बार यदि हमने ठान लिया—
“मैं आनंदित रहूँगा।”
फिर परिस्थितियाँ कैसी भी हों,
आसपास का वातावरण कैसा भी हो,
लोग कैसे भी व्यवहार करें…
हमारा आनंद कोई हमसे छीन नहीं सकता।
मैंने उससे कहा—
“खुश रहना बहुत आसान है, मेरे दोस्त…
बस एक बार खुद से प्रेम करके देखो,
और जीवन को भी पूरे मन से स्वीकार करके देखो।”
वही तुम्हारा सच्चा मित्र है,
वही तुम्हारी साँस है,
वही तुम्हारी जान है,
वही तुम्हारी ज़िंदगी है।
वह हमेशा तुम्हारे साथ रहता है,
बस उसे संभालना आना चाहिए।
मैं आनंद को दुनिया भर में खोजता रहा…
लेकिन वह मिला अपने ही अंतर्मन में।
आनंद कोई मंज़िल नहीं,
वह एक सुंदर यात्रा है।
वह मन में रहता है
और स्वयं को स्वीकार करने में बसता है।
क्योंकि…
“आनंद कोई लक्ष्य नहीं,
वह जीने का एक तरीका है।”
इसलिए…
कभी रुकिए…
खुद से खुलकर बात कीजिए..
अपने मन से सिर्फ एक सवाल पूछिए—
“क्या मैं सचमुच आनंदित हूँ?”
अगर जवाब “नहीं” हो,तो बाहर मत ढूँढ़िए।
एक बार अपने भीतर झाँककर देखिए।
शायद…
आनंद वहीं शांत भाव से आपका इंतज़ार कर रहा हो।
क्योंकि…
“आनंद कभी खोता नहीं,
खो जाती है उस तक पहुँचने वाली राह।”
और जब वह राह मिल जाती है,
तो इंसान बाहर सुख ढूँढ़ना छोड़ देता है…
और आनंद के साथ जीना शुरू कर देता है।
सच तो यह है…
आनंद….
एक सुंदर सफर है।
वह जीने का एक तरीका है।
हर पल को उत्सव की तरह जीने की कला है।
वह बाँटने से बढ़ने वाला उपहार है।
और सबसे बड़ी बात…
“आनंद अपने ही अंतर्मन में प्रकट होने वाला ईश्वर है…।”
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“अंदर का मैं…”
अरे, क्यों रोना?
बीती हुई बातों को बार-बार याद करके…
क्यों दुखी होना?
उन बातों के लिए,जो हमारे हाथ में ही नहीं हैं।
जो बीत गया, उसे जाने दो
जो नहीं है, उसका हठ छोड़ दो
जो है, उसी में खुशी ढूँढ़ो,
ज़िंदगी और भी खूबसूरत लगने लगेगी।
जो चल रहा है, जैसे चल रहा है,
उसे वैसे ही स्वीकारना सीखो।
हर बात को मनचाहे ढंग से मोड़ने की कोशिश में,
अनजाने में हम अपना सुख खो बैठते हैं।
ज़िंदगी की धारा के साथ प्रेम से जिना,
कभी-कभी सबसे बड़ी समझदारी होती है
क्योंकि ज़िंदगी को जीतने से ज़्यादा,
उसे पूरे मन से जीना, उसे महसूस करना…
यही अधिक महत्वपूर्ण है।
कभी-कभी डर लगता है,
खुद को सच्चा समझने से
अपने भीतर की आवाज़ सुनने से पहले ही,
दूसरों की राय सुनने की आदत जो पड़ गई है।
लेकिन जब उस डर को पार कर लेते हैं,
तो एक नया साहस मिलता है
अपनी ही नज़रों से खुद को देखते हुए,
सच्चा संतोष मिलता है।
खुद को जानने के लिए,
अपने अंतरमन में उतरने के लिए,
खुद से प्रेम करने के लिए,
शायद… यही सबसे सही समय है।
और सच कहूँ तो—
खुद को खुश रखने का रास्ता
कहीं बाहर नहीं होता,
वह तो हमारे
अपने दिल में ही छिपा होता है।
शांत क्षणों में ही वास्तव में
अंदर का “मैं” साफ़ दिखाई देता है।
शोर-शराबे में खोई हुई अपनी ही
आवाज़ फिर से सुनाई देने लगती है।
इसलिए…
खुद को देखो,
खुद से संवाद करो,
खुद को पहचानने की कोशिश करो,
और खुद पर विश्वास रखो।
खुद को पहचानने का सफ़र
वास्तव में सबसे सुंदर होता है।
क्योंकि उसी राह पर चलते-चलते,
हमें अपना असली “मैं” मिल जाता है।
जिस दिन यह समझ में आ जाएगा कि…
यही अंदर का “मैं”
बाहर वाले “मैं” को खुश रखता है,
समझो—आपका जीवन सार्थक हो गया।
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तू कहीं भी रहे….
तू कहीं भी रहे, तेरे साथ मेरा दिल तो है
उसके साथ यादों की मंजिल तो है।
तू मेरे साथ है या नहीं है, फिर भी ऐ हमसफर
तेरे हाथ की लकीरों में मेरा नाम तो है।
कैसे दिन गुजरे, पता नहीं चला
दिन से रात कब हुई मालूम नहीं पड़ा।
हंसते खेलते जिंदगी के कितने मौसम बीत गए
तू नहीं तो क्या, तेरी यादें आज भी मेरे साथ।
हम अपने काम में शायद ज्यादा व्यस्त थे
तुम्हें बहुत कम वक्त हम दे पाए।
फिर भी तूने कभी शिकायत नहीं की
क्योंकि हम दोनो हर सफर में साथ-साथ चले
खाना बनाना और प्यार से खिलाना
यह तेरी जिंदगी का सबसे प्यारा शौक था।
हर एक को अपनेपन से अपनाती थी तू
तेरी है दीवानगी मुझे बहुत पसंद थी।
तेरा दिल इतना अच्छा, इतना प्यारा था
हर दर्द को अपना समझने वाला था
तेरे प्यार में कोई शर्त नहीं थी
बस देना ही तेरी फितरत थी।
सबके साथ अच्छा रहना
उनके साथ प्यार से बातें करना
हर अजनबी को अपना बना लेना
यही तेरे व्यक्तित्व का सुंदर गहना था
तुम सिर्फ मेरे परिवार के साथ नहीं थी
दुनिया को साथ में समेट लिया था
तेरी सोच बस इतनी ही थी कि
जो पास में है, या साथ है… वही मेरी दुनिया है।
तुम साथ नहीं हो इसका फर्क तो हर पल पड़ता है
तेरी यादें आज भी मेरे हाथ में थामे रहती है
हर खुशी में तेरा चेहरा नजर आता है
हर तन्हाई में तेरा एहसास मेरे साथ चलता है।
किस-किसको बताएंगे जुदाई का सबब हम
दिल की यह खामोशी कौन समझ पाएगा
चुपके से किसी रोज ख्वाब बनकर आना…
आ फिर से…
पर मुझे छोड़ के जाने के लिए मत आना।
इसलिए सबसे मेरी गुजारिश है…
अपने साथी के साथ प्यार से दिन गुजारो,
वह जैसा है, उसे वैसे ही अपनाओ।
कुछ मीठी यादें जरूर संजो लेना,
क्योंकि…
साथ छूट जाने के बाद, इंसान तो नहीं रहता…
लेकिन, यही यादें ही जिंदगी का सहारा बनती हैं।
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