बढ़ता मोटापा, मधुमेह और पोषण की कमी बनी चिंता, विशेषज्ञ बोले—सिर्फ प्रतिबंध नहीं, जागरूकता और स्वस्थ खानपान भी है जरूरी
दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली
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बच्चों में तेजी से बढ़ता मोटापा, मधुमेह का खतरा, विटामिन की कमी और अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड की बढ़ती खपत अब केवल परिवारों की नहीं बल्कि पूरे देश की चिंता बन चुकी है। इसी बीच कर्नाटक सरकार ने स्कूलों और उनके आसपास जंक फूड की बिक्री पर रोक लगाने की योजना बनाकर एक महत्वपूर्ण पहल की है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह की व्यवस्था पूरे देश में लागू की जाए और इसके साथ बच्चों, अभिभावकों तथा स्कूलों को जागरूक किया जाए, तो आने वाली पीढ़ी को कई गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकता है।
क्यों उठानी पड़ी यह पहल?
आज अधिकांश बच्चे स्कूल के बाहर या कैंटीन से चिप्स, बर्गर, पिज्जा, कोल्ड ड्रिंक, फ्रेंच फ्राइज, चॉकलेट और अन्य पैकेज्ड खाद्य पदार्थ खरीदते हैं। ये खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट जरूर लगते हैं, लेकिन इनमें पोषण बेहद कम और चीनी, नमक तथा अस्वस्थ वसा की मात्रा अधिक होती है। लगातार इनके सेवन से बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है।
कर्नाटक सरकार ने इसी समस्या को देखते हुए स्कूलों के आसपास जंक फूड की बिक्री सीमित करने की योजना बनाई है। साथ ही खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और फूड टेस्टिंग लैब को बेहतर बनाने की दिशा में भी कदम उठाने की बात कही गई है।
क्या होता है जंक फूड?
विशेषज्ञों के अनुसार हर बर्गर या पिज्जा जंक फूड नहीं होता। समस्या उन खाद्य पदार्थों से है जो अत्यधिक प्रोसेस्ड होते हैं और जिनमें रिफाइंड मैदा, अधिक चीनी, ट्रांस फैट, रिफाइंड तेल, कृत्रिम रंग, फ्लेवर, प्रिजर्वेटिव और अत्यधिक नमक मौजूद होता है।
ऐसे खाद्य पदार्थ शरीर को कैलोरी तो देते हैं, लेकिन प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, फाइबर और आवश्यक विटामिन नहीं दे पाते। इन्हें अक्सर “एम्प्टी कैलोरी” वाला भोजन कहा जाता है।
बच्चों की सेहत पर पड़ते हैं गंभीर प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित रूप से जंक फूड खाने वाले बच्चों में मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ सकती है। यही मोटापा आगे चलकर टाइप-2 मधुमेह, उच्च रक्तचाप, फैटी लिवर, हृदय रोग और जोड़ों की समस्याओं का कारण बन सकता है।
अत्यधिक मीठे और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ बच्चों की एकाग्रता, याददाश्त और सीखने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकते हैं। ऊर्जा का स्तर अचानक बढ़ने और फिर तेजी से गिरने के कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन, थकान और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई जैसी समस्याएं देखी जा सकती हैं।
इसके अलावा कोल्ड ड्रिंक, कैंडी, चॉकलेट और मीठे स्नैक्स दांतों में कीड़े लगने और कैविटी का बड़ा कारण बनते हैं। जंक फूड अधिक खाने से बच्चे फल, सब्जियां और पौष्टिक भोजन कम खाते हैं, जिससे शरीर में आवश्यक विटामिन और खनिजों की कमी होने लगती है।
क्या केवल प्रतिबंध ही समाधान है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल स्कूलों के बाहर जंक फूड पर प्रतिबंध लगाने से पूरी समस्या समाप्त नहीं होगी। यदि घर में रोजाना कोल्ड ड्रिंक, इंस्टेंट नूडल्स, पैकेज्ड स्नैक्स और मीठे खाद्य पदार्थ उपलब्ध रहेंगे, तो बच्चे उनका सेवन करते रहेंगे।
इसलिए आवश्यक है कि परिवार, स्कूल और समाज मिलकर बच्चों में स्वस्थ खानपान की आदत विकसित करें। बच्चे वही सीखते हैं जो अपने माता-पिता और आसपास के लोगों को करते हुए देखते हैं।
देशभर में लागू हो ऐसी व्यवस्था
विशेषज्ञों का सुझाव है कि बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए पूरे देश में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने चाहिए—
- स्कूलों और उनके आसपास जंक फूड की बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण।
- स्कूल कैंटीन में केवल पौष्टिक और संतुलित भोजन उपलब्ध कराया जाए।
- सभी विद्यालयों में पोषण शिक्षा को नियमित गतिविधि बनाया जाए।
- खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा समय-समय पर निरीक्षण और गुणवत्ता जांच की जाए।
- बच्चों और अभिभावकों के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
- टीवी, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों को लक्षित भ्रामक खाद्य विज्ञापनों पर सख्त निगरानी रखी जाए।
स्वस्थ विकल्प अपनाना जरूरी
विशेषज्ञ बच्चों के लिए कई स्वस्थ विकल्प भी सुझाते हैं। जैसे—
- कोल्ड ड्रिंक की जगह नारियल पानी, छाछ या नींबू पानी।
- पैकेट चिप्स की जगह भुना मखाना या भुना चना।
- फ्रेंच फ्राइज की जगह शकरकंद।
- चॉकलेट की जगह मौसमी फल।
- बिस्कुट की जगह मूंगफली या सूखे मेवे।
- नाश्ते में अंडा, दही, पनीर, अंकुरित अनाज, पोहा, उपमा या बेसन/मूंग का चीला।
संतुलित और प्रोटीन युक्त नाश्ता बच्चों को पूरे दिन ऊर्जा प्रदान करता है तथा उनकी पढ़ाई और शारीरिक गतिविधियों में भी मदद करता है।
जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ भारत का सपना तभी साकार होगा जब बचपन से ही सही खानपान की आदत डाली जाए। स्कूल, परिवार, शिक्षक, डॉक्टर और समाज सभी की जिम्मेदारी है कि बच्चों को स्वाद के साथ-साथ पोषण का महत्व भी समझाया जाए।
यदि समय रहते जंक फूड की बढ़ती आदत पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में बच्चों में मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग जैसी जीवनशैली संबंधी बीमारियों का खतरा और बढ़ सकता है।
कर्नाटक सरकार की प्रस्तावित पहल देश के लिए एक सकारात्मक संदेश है। यदि केंद्र और सभी राज्य सरकारें मिलकर स्कूलों के आसपास जंक फूड की बिक्री नियंत्रित करें, खाद्य सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करें और बड़े स्तर पर पोषण जागरूकता अभियान चलाएं, तो बच्चों के स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है।
याद रखें, स्वस्थ भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं बल्कि स्वस्थ शरीर, तेज दिमाग, मजबूत प्रतिरक्षा और उज्ज्वल भविष्य की नींव है। आज बच्चों की थाली में पौष्टिक भोजन होगा, तभी कल देश को स्वस्थ, सक्षम और ऊर्जावान नागरिक मिलेंगे।
