Explore

Search

Sunday, August 2, 2026, 1:56 am

Sunday, August 2, 2026, 1:56 am

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

सुधियों की निधि : दीपा खेतावत ‘दीप’ ने बचपन से लेकर आज तक के जीवन की यादों को सुंदर शब्दों में किया अभिव्यक्त

पुस्तक नाम -सुधियों की निधि
कवयित्री -दीपा खेतावत ‘दीप’
समीक्षक -नीलम व्यास स्वयंसिद्धा, जोधपुर

हमारे भारतीय साहित्य समाज में काव्य की अनेक विधाएँ प्रचलित हैं। इन दिनों मुक्त छंद की बहार छाई हुई है, जो हृदय के गहन अनुभूत भावों को बड़ी सुंदरता से प्रकट कर देते हैं। हाल ही में दीपा खेतावत जी ‘दीप’ की काव्य संग्रह की पुस्तक ‘सुधियों की निधि’ पढ़ने को मिली जो उनकी मानस गंगा के गहन भावों के मोतियों को शब्दों की लड़ियों में पिरोकर लिखी गई है।

कवयित्री ने बचपन से लेकर आज तक के जीवन की यादों को सुंदर शब्दों में अभिव्यक्त किया है। जैसे-जैसे जीवन बीतता जाता है। वैसे-वैसे बीते जीवन की सुधियाँ हमारे अंत में निधि की तरह संचित होती जाती है जो फिर भावनाओं का सहारा लेकर कवयित्री के अंतस से प्रेरणा पाकर एक सुंदर काव्य संग्रह का  रूप ले लेती है, हर मनुष्य के हृदय में बीते जमाने की कहानियां, बीते वक्त की यादें संचित रहती हैं जो कभी तो दीपशिखा बन अंतर को आलोकित करती है और तमस का नाश करती है और कभी निधि बनकर लहरों के बीच मझधार में अठखेली करती परिलक्षित होती है। यह काव्य संग्रह एक तरफ तो मंगलाचरण के रूप में भक्ति भावना को समाहित किए हैं, वहीं दूसरी तरह अपने आराध्य श्री कृष्णा के प्रति गहरी प्रेम और भक्ति भाव को समेटे हुए हैं।तीसरे खंड में स्त्री और जीवन संबंधी कविताएं हैं जो स्त्री जीवन और उसकी त्रासदी को संघर्षों को मन में बसे गहरे प्रेम भाव को और रिश्तों के जाल को प्रकट करती है। इस काव्य संग्रह के चौथे खंड में प्रकृति समाज और जीवन की विभिन्न छवियों को दर्शाने वाली कविताएं मिलती है जो मनोविज्ञान को समेटे हुए बीते वक्त की यादों सी संचित रहती है।

तीसरे खंड में स्त्री और जीवन संबंधी कविताएं हैं जो स्त्री जीवन और उसकी त्रासदी को संघर्षों को मन में बसे गहरे प्रेम भाव को और रिश्तों के जाल को प्रकट करती है। इस काव्य संग्रह के चौथे खंड में प्रकृति समाज और जीवन की विभिन्न छवियों को दर्शाने वाली कविताएं मिलती है जो मनोविज्ञान और गहन जीवन दर्शन के साथ-साथ स्त्री मन की कोमलता को,ईष्ट के प्रति प्रबल प्रेमभाव को प्रकट करके स्त्रियों के सुंदर संसार की सतरंगी छवि को उजागर करती है।

सुधियों की निधि ऐसी काव्य श्रृंखला है जो अंतस के सोए प्रेम को जगाने तथा बीती यादों को संजोने का प्रयास करती है। यही अनमोल सुधियां ऐसे खजाने की तरह मन के धरातल में छुपी हुई है जो प्रेरणा पाकर शब्द बीज से कविता वृक्ष के रूप में पल्लवित और पोषित होती रही है। कवयित्री का उपनाम ‘दीप’ है जो उनके हृदय में जलने वाली ज्ञान की जगमग ज्योत का प्रतीक है और उससे प्रकाशित अंतर मन और जीवन को रोशन करती है।

कवयित्री ने मंगलाचरण में मां शारदे का ध्यान करते हुए निवेदन किया है की हे मां शारदे! आप प्रखर ज्ञान देने वाली बुद्धि दायिनी हो इसलिए मनसा वाचा और कर्मणा आपको प्रणाम है।अगली कविता में अपने आराध्य को संबोधित करते हुए कहा है कि कान्हा तुम ही आ जाना चाहे साधु बनकर घर की देहरी तक या चाहे भिक्षुक बनकर कहना कि कन्यादान करो अथवा चाहे तुम वर बनकर डोली बारात संग लिए आना। मुझ में राधा सा प्रेम नहीं और मीरां सी भक्ति नहीं और रुक्मणी सी मैं सुंदरी नहीं, परंतु मुझ में बसे विश्वास को तुम पूर्ण करने को ‘कान्हा’ आ जाना- इस कविता में हृदय की श्रद्धा और गहन भक्ति भावना को पिरोकर शब्दों की सुंदर फुलवारी सजाई गई है, इसी प्रकार गोद भराई नामक कविता में कवयित्री स्वीकार करती है कि मेरी कविता तुम्हारे कवि मन की ब्याहता हुई है। व्याकरण का भाव सौंदर्य,उच्चारण के मंत्र बने और शब्द शैली की लग्न वेदी का गठबंधन हुआ है। इस कविता में अनूठे शब्द शिल्प व भाव की कारीगरी चित्र शैली में प्रकट हुई है जो अपने आप में अनूठी है। अपने मन के गहरी प्रेम भाव को प्रदर्शित करते हुए कवयित्री कहती है कि जीवन में मुझे तुम्हारा पश्चिम होना है, यही कविता का शीर्षक भी है। इस कविता में प्रीतम के गोधूलि के समय पर पहुंचने पर पश्चिम दिशा बनकर अपने भीतर समेटने को सुखद मानने का भाव प्रकट हुआ है जो सच्चे व पावन प्रेम की दिव्यता का भाव प्रकट करती है।

कवयित्री ने एक दिन को कई भागों में बाँट कर सुबह वाली, दोपहर वाली, शाम वाली और रात वाली कविताएं नामक शीर्षक दिए हैं जिसमें प्रिय के प्रति सात्विक प्रेम को भिन्न-भिन्न उपमानों में प्रकट किया है। सुबह वाली कविताएं द्रवित हृदय से निकली अरदास के बोल है तो दोपहर वाली कविताएं धूप में रखी आराम कुर्सी का बिछौना है, शाम वाली कविताएं अस्त सूरज की उतरती रश्मियों की तरह होती है तो रात वाली कविताएं चांदनी में खिली तारों की बारात है जो भौतिक सुखों को भुलाती मीरां की पदावली है।

इस प्रकार कवयित्री ने अपने जीवन में प्रेम को- प्रकृति के दिन,दोपहर और रात से जोड़कर दिव्या अनूठापन प्रदान किया है। इस काव्य संग्रह का मूल भाव भक्ति प्रेम और प्रेम में सहयोग और वियोग का सूक्ष्म चित्रण करना रहा है जिसमें विरह पक्ष अधिक मुखर हुआ है कवयित्री प्रिय को संबोधित करते हुए कहती है कि तुम्हारा ना होना मन मुंडेर को सूना कर जाता है। मैं उगते सूरज को कुछ पल मुट्ठी में भींच लेती हूं कि इस बार आओ जो तुम तो तुम्हारे सीने पर सर रखकर महसूस कर सकूँ, तुम्हारे बिना ये सारे मौसम और मिलन के सारे पंछी,( स्मृतियों का नर्म उजाला )।

ऐसे ही तृतीय खंड में कविताओं को अनपढ़ बताया है जो अपने टूटे-मुड़े अक्षरों के साथ अधूरी है परंतु प्रिय के प्रेम की बची हुई संवेदनाओं के कारण भाव आधे से पूरे हो जाते हैं और प्रिया की यादों की थाती बनकर यह कविता रह जाती है( कविताएं – पुरखिन है बड़ेरिन है ) कवयित्री ने नारी के भावुक मन की पीड़ा को विधवा की तपस्या नामक कविता में प्रदर्शित करते हुए कहा है कि क्या दो मीठे बोल बोलकर विधवा के चेहरे पर तुम लालिमा सजा पाओगे? बहुत की चाह पहले भी न थी क्या अपनेपन का थोड़ा हक दे पाओगे? क्या रिवाज के इस पिंजर से विधवा को स्वच्छंद कर पाओगे? यह प्रश्न समाज के, धर्म के ठेकेदारों से कवयित्री करती है और स्त्री जीवन की विधवा पन की त्रासदी को अपना स्वर देती है जो कि आज के युग का कटु यथार्थ है। इस घोर यातना की आग में जलती हुई विधवा पूरा जीवन गुजार देती है। समाज की रूढ़िवादी परंपराओं के गीत गाती हुई स्त्रियां यदि चुप हो जाए तो?,और सारे ढकोसले तोड़ दे तो?, देश काल में परिवार के फर्ज निभाती स्त्रियां फर्ज से मुकर जाए तो क्या जीवन संवर पाएगा? तुम पहले उनके लहूँ का आचमन कर लेना और और अंत में कि तुम पाओगे स्त्रियां सदियों से पोषती रही है -प्रकृति और संस्कृति को, क्या तुम इनका मोल चुका पाओगे?, यह कविता सही मायनों में स्त्री विमर्श की सुंदर कविता है, जिसमें परंपरा के गीत गाती हुई स्त्रियों की महानता और कर्मशीलता का, सहन शक्ति का भाव प्रकट हुआ है।

चतुर्थ खंड है- जीवन जिसमें दीपा जी ने अपनी कविताओं को नमक की तरह बताया है जो किसी के इंतजार के अतिरेकमें आंख के पानी में घुल जाती है यह कविताएं समर्पण भाव प्रकट करती हुई परम पुरुषोत्तम की शरणागत है। कवयित्री घोषणा करती है कि मेरी कविताएं सृष्टि की सायुज्य निधि है। कवयित्री का मन हर दिन मेले में भी अकेला रहा है कभी यह फिरकी जैसा डोला कभी रमता जोगी बना क्योंकि जीवन तो अपना है बैरागी, कठिन वक्त का लम्हा -लम्हा अंधियारे में चला /जाता सहमा सहमा। ( हर दिन मेला, रहा अकेला)।
जीवन और अनुभव को कविता के रूप में पिरोकर धूप छाँव रंगों के फूलों की ऐसी माला के रूप में शब्दों का आकार दिया है कि कभी वृद्ध आश्रम में रहने वालों के अकेलेपन का दुख प्रकट हुआ है तो कहीं स्त्री मन का रहस्य सुलझाने की कोशिश में ख्याल ही उलझ जाते हैं।कवयित्री स्वीकार करती है कि सच कहूँ तो उलझे से सवाल मन में ज्यादा बवाल करते हैं इसलिए जो रहस्य मन के तहखानों दबे हैं, उनको कभी मत
सुलझाना। ( मन की गुत्थियां )।

यह मनोविज्ञान का कटु सत्य है कि आज तक ईश्वर से लेकर ऋषि मुनि और साधारण मनुष्य भी स्त्री मन के गहन भावों कोसही तरीके से जान नहीं पाया है। जीवन में सदा आशावादी भावों को स्थान देना चाहिए ताकि दर्द से आगे बिखराव की टूटन को समाप्त कर अनसुनी आवाज को नया स्वर प्रदान किया जा सके। इस काव्य संग्रह में दा र्शनिकता के तत्व भी देखने को मिलते हैं जहां हम भटकते हुए जीवन के आखिरी सफर में पहुंच जाते हैं और चिरंजीव से दिवंगत कहने लगते हैं ( जीवन का अंतिम सत्य)।

कवयित्री अपने आराध्य को संबोधित करते हुए कहते हैं कि मेरी कविताओं में हमेशा ही तुम्हारा किरदार जीवंत रहेगा और इस प्रकार मेरी कविताएं भी मेरे बाद जिंदा रहेगी, मिलने बिछड़ने की तमाम कोशिश से परे होकर तुमको ही जी रही है युगों -युगों से मेरी कविताएं,( मेरे बाद भी मेरी कविताएं)। यह इस काव्य संग्रह की अंतिम कविता है। संपूर्ण काव्य संग्रह को पढ़ने के बाद जीवन का अंतिम सत्य यही स्पष्ट होता है कि आगत और विगत से परे रहकर हमको यूं ही आगे बढ़ते रहना है, युगांत तक जहाँ फिर कभी बिखराव नहीं होगा।

यह काव्य संग्रह हमें स्त्री मन के अंदर छुपे हुए पावन प्रेम भावों को दिखाते हुए अपने आराध्य कृष्ण को पुकारती हुई स्त्री के भक्ति भाव से परिचित कराता है। यह सृष्टि प्रेम से बनी है, प्रेम में पलती है, प्रेम को ही बुनती है, प्रेम को ही जीती है, इस सृष्टि को स्त्री जैसा बताया है जो सृष्टि को जन्म देती है और संतति को पालती पोषती है,अपने रक्त और मांस से, हृदय के सच्चे प्रेम भाव से, ममता और वात्सल्य से नवजीवन का पल्लवन करती है और सही मायने में जीवन और प्रकृति के साथ स्त्री और प्रेम को अभिनव रूप प्रदान करती है।

यह कविताएं मुक्त छंद में है इसमें कवयित्री ने अपने मन के आंगन की उर्वरता को प्रकट करते हुए भावों का ऐसा बगीचा लहूँ से सींचा है कि जैसे-जैसे हम कविताएं पढ़ने जाते हैं वैसे-वैसे प्रेम और विरह की तरंगिनी में डूबकर सात्विक भावों से आल्हादित हो उठते हैं। शिल्प की दृष्टि से प्रतीकों और बिंबो का सुंदर प्रयोग हुआ है जो भाषा और कथ्य को सशक्त बनाता है।इन कविताओं में लय और गेयता की कमी महसूस होती है, आशा है अगले काव्य संग्रह में यह कमी भी दूर हो जाएगी। सुंदर उपमानों और दृश्य बिंबों से कविताओं की मूल अन्तर्वस्तु साकार रुप लिए’ दीप’सी जगमग होती दिखाई देती है।

श्रेष्ठ काव्य में समाज के सभी वर्गों की पीड़ाओं को स्वर प्रदान किया जाता है, यहाँ स्त्री वर्ग की पीड़ा ही प्रकट हुई परन्तु दीन हीन वर्ग की, असहाय वर्ग की पीर का भाव कम ही प्रकट हुआ है, युगीन यथार्थ का बोध भी काव्य में प्रकट होना आवश्यक है, आशा है अगले काव्य संग्रह में लोक हित के सभी पक्ष उभर कर आ पाएंगे। कुल मिलाकर यह संग्रह पठनीय है और प्रेम व विरह के अनूठे व अनुपम भावों को समाहित किए होने से श्रेष्ठ बन पड़ा है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor