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Thursday, August 13, 2026, 9:36 pm

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प्राइवेट अस्पतालों में इलाज की कीमत पर संसदीय समिति की पहल का स्वागत, पर अब ‘आम आदमी इमरजेंसी फंड’ की जरूरत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से घोषणा करे…

राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित का सुझाव—प्राइवेट अस्पतालों की आय का 5%, केंद्र-राज्य का 10-10% सहयोग और यहां के डॉक्टरों और प्रशासनिक अधिकारियों की आय का 2% योगदान बने गरीब मरीजों का जीवनरक्षक सहारा। देश के उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों, जिनकी शुद्ध आय सालाना कम से 100 करोड़ है- वे भी सालाना 1 करोड़ रुपए तक इमरजेंसी फंड में जमा करवा सकते हैं। इसी तरह केंद्र और राज्य सरकारों के कर्मचारी और अधिकारी 1 रुपए से लेकर 5 रुपए मासिक तक इमरजेंसी फंड में सहयोग करें और आम आदमी का देश के किसी भी भाग में बड़े से बड़े प्राइवेट अस्पताल में समस्त इलाज और संपूर्ण खर्च ये प्राइवेट अस्पताल वहन करें और इसके लिए अलग से काउंटर गठित हो जो इस तरह के मामले देखे। आम आदमी जिनकी वार्षिक आय 2 लाख रुपए तक हो उन परिवारों के गंभीर रोगियों का इन प्राइवेट अस्पतालों में पूरा और परफेक्ट इलाज हो। ऐसा करके ही हम आगामी 15 अगस्त पर देश में नई स्वास्थ्य क्रांति ला सकते हैं और शहीदों के नाम सच्ची श्रद्धांजलि होगी…। 

दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली

9783414079 diliprakhai@gmail.com

भारत में स्वास्थ्य सेवा को लेकर सबसे बड़ी विडंबना यह है कि देश ने चिकित्सा विज्ञान, तकनीक, सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों और अत्याधुनिक उपकरणों के क्षेत्र में दुनिया के सामने अपनी क्षमता साबित की है, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति आज भी गंभीर बीमारी सामने आने पर सबसे पहले इलाज नहीं, बल्कि पैसे का इंतजाम सोचता है। बीमारी अचानक आती है, लेकिन उसका खर्च परिवार को वर्षों तक कर्ज में डुबो सकता है। कई बार अस्पताल तक पहुंचने के बाद भी मरीज के परिजन यह सोचकर परेशान होते हैं कि इलाज शुरू करवाएं तो बिल कहां से आएगा।

इसी बेहद गंभीर और मानवीय सवाल के बीच संसद की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति की हालिया पहल उम्मीद की एक महत्वपूर्ण किरण के रूप में सामने आई है। समिति ने सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की सुलभता और वहनीयता के मुद्दे की विस्तृत समीक्षा करते हुए निजी अस्पतालों में इलाज के बढ़ते खर्च, शुल्क में पारदर्शिता और गरीब मरीजों तक बेहतर चिकित्सा पहुंचाने जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। समिति इस विषय पर लंबे समय से विचार-विमर्श कर रही है और जुलाई 2026 तक भी संबंधित अधिकारियों और स्वास्थ्य क्षेत्र के नियामकों से इस विषय पर विचार ले चुकी है।

राइजिंग भास्कर इस पहल का स्वागत करता है। विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्वास्थ्य सुविधाओं को अधिक व्यापक, तकनीक-सक्षम और गरीबों तक पहुंचाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के लिए आभार व्यक्त करना जरूरी है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने करोड़ों लोगों को अस्पतालों तक पहुंचने का रास्ता दिया है। फरवरी 2026 तक आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में 36,229 अस्पताल सूचीबद्ध थे और योजना के अंतर्गत अधिकृत 11.69 करोड़ अस्पताल दाखिलों में 6.74 करोड़ दाखिले निजी अस्पतालों में हुए थे। लेकिन अब समय एक कदम और आगे बढ़ने का है।

राइजिंग भास्कर का स्पष्ट सुझाव है कि देश के प्रत्येक बड़े निजी अस्पताल में ‘आम आदमी इमरजेंसी फंड’ बनाया जाए।

यह कोई दान आधारित व्यवस्था भर नहीं होगी, बल्कि निजी स्वास्थ्य क्षेत्र, केंद्र सरकार, राज्य सरकार, डॉक्टरों और सरकारी कर्मचारियों की सहभागिता से तैयार होने वाला एक संस्थागत सामाजिक स्वास्थ्य सुरक्षा मॉडल हो सकता है। जिसमें उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों का भी सहयोग लिया जा सकता है।

संसदीय समिति ने उठाया वह सवाल जिसे देश लंबे समय से महसूस कर रहा है

संसदीय समिति की मौजूदा पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि निजी स्वास्थ्य क्षेत्र अब भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। सरकारी अस्पतालों की अपनी सीमाएं हैं। दूसरी ओर गंभीर हृदय रोग, कैंसर, न्यूरोसर्जरी, ट्रांसप्लांट, गंभीर दुर्घटना, ऑर्गन फेल्योर और अन्य जटिल रोगों के इलाज के लिए बड़ी संख्या में मरीज निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं।

लेकिन निर्भरता और सामर्थ्य के बीच बड़ा अंतर है। संसदीय समिति के समक्ष उपलब्ध आंकड़ों और चर्चाओं से यह तस्वीर सामने आती है कि निजी अस्पतालों में अस्पताल में भर्ती होने की औसत लागत सरकारी अस्पतालों की तुलना में कई गुना अधिक है। स्वास्थ्य संबंधी संसदीय विश्लेषण में निजी अस्पतालों में औसत अस्पताल खर्च सरकारी अस्पतालों की तुलना में लगभग सात गुना अधिक बताया गया है। साथ ही देश में अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र में इलाज करवाता है। यही वह जगह है जहां समस्या केवल अस्पतालों की फीस की नहीं रह जाती। समस्या यह है कि गरीब और निम्न आय वर्ग का मरीज निजी चिकित्सा व्यवस्था का लाभ कैसे उठाए?

संसदीय समिति ने निजी अस्पतालों के कमरों के शुल्क को लेकर भी एक महत्वपूर्ण विचार सामने रखा है। महानगरों में निजी अस्पतालों के बेसिक कमरे का शुल्क आसपास के तीन सितारा होटलों के औसत शुल्क से जोड़ने की सिफारिश चर्चा में है। इसका उद्देश्य इलाज के खर्च में पारदर्शिता और वहनीयता बढ़ाना है। समिति की सोच का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि बड़े निजी अस्पतालों में उच्च आय वाले मरीजों और मेडिकल टूरिज्म से होने वाले राजस्व का एक हिस्सा गरीब मरीजों के इलाज के लिए इस्तेमाल करने की दिशा में क्रॉस-सब्सिडी मॉडल अपनाया जा सकता है। यानी संदेश स्पष्ट है—स्वास्थ्य सेवा केवल व्यापार नहीं, सामाजिक दायित्व भी है। राइजिंग भास्कर इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए एक व्यवस्थित फंड की स्थापना का प्रस्ताव रखता है।

राइजिंग भास्कर का प्रस्ताव : हर निजी अस्पताल में बने ‘आम आदमी इमरजेंसी फंड’

कल्पना कीजिए कि देश के प्रत्येक बड़े निजी अस्पताल के पास ऐसा एक समर्पित फंड हो, जिसमें नियमित रूप से धन जमा होता रहे और उसी अस्पताल में पहुंचने वाला आर्थिक रूप से कमजोर गंभीर मरीज केवल इसलिए इलाज से वंचित न हो कि उसके पास तत्काल पैसा नहीं है।

यह व्यवस्था इस प्रकार बनाई जा सकती है—

1. अस्पताल की वार्षिक आय का 5 प्रतिशत

प्रत्येक पात्र निजी अस्पताल अपनी वार्षिक चिकित्सा आय का 5 प्रतिशत ‘आम आदमी इमरजेंसी फंड’ में जमा करे। यह राशि अस्पताल की सामान्य आय से अलग होगी और केवल पात्र आर्थिक रूप से कमजोर गंभीर मरीजों के उपचार के लिए इस्तेमाल की जाएगी। इस राशि का हिसाब ऑडिट योग्य हो। अस्पताल की बैलेंस शीट में इसे अलग मद में दर्शाया जाए और डिजिटल पोर्टल पर इसकी जानकारी उपलब्ध हो।

2. केंद्र सरकार का 10 प्रतिशत सहयोग

अस्पताल द्वारा जमा की गई राशि के अनुपात में केंद्र सरकार भी इस फंड में 10 प्रतिशत तक सहयोग दे सकती है। इसका उद्देश्य निजी अस्पतालों पर पूरा वित्तीय भार डालना नहीं, बल्कि सरकार और निजी क्षेत्र को साझेदार बनाना होगा।

3. राज्य सरकार भी दे 10 प्रतिशत सहयोग

इसी प्रकार संबंधित राज्य सरकार भी अस्पताल के ‘आम आदमी इमरजेंसी फंड’ में 10 प्रतिशत सहयोग करे।

इससे एक ऐसा त्रिस्तरीय वित्तीय मॉडल बनेगा—

निजी अस्पताल + केंद्र सरकार + राज्य सरकार

और इन तीनों के साथ समाज के अन्य वर्गों की भागीदारी इसे और मजबूत बनाएगी।

सरकारी कर्मचारियों से सिर्फ 1 से 5 रुपए मासिक—छोटी राशि, बड़ा उद्देश्य

राइजिंग भास्कर का एक और सुझाव है कि केंद्र और राज्य सरकारों के कर्मचारियों तथा अधिकारियों की इच्छा और निर्धारित नियमों के तहत उनके वेतन से कम से कम 1 रुपए से लेकर 5 रुपए प्रतिमाह की छोटी राशि इस फंड में योगदान के रूप में ली जा सकती है। यह राशि इतनी छोटी होगी कि अधिकांश कर्मचारियों पर इसका कोई महत्वपूर्ण आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा, लेकिन करोड़ों कर्मचारियों की सामूहिक भागीदारी से यह राशि विशाल सामाजिक पूंजी में बदल सकती है। यहां मूल भावना महत्वपूर्ण है। एक कर्मचारी का 1 रुपया शायद किसी एक परिवार को दिखाई न दे, लेकिन करोड़ों हाथों से निकलने वाला 1 रुपया किसी मरीज के लिए जीवन का सहारा बन सकता है। इस योगदान को अनिवार्य करने के बजाय प्रारंभिक चरण में स्वैच्छिक रखा जा सकता है। बाद में व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता और कानूनी समीक्षा के आधार पर मॉडल विकसित किया जा सकता है।

डॉक्टर भी बनें इस चिकित्सा क्रांति के सहभागी

राइजिंग भास्कर का प्रस्ताव केवल अस्पताल मालिकों या सरकार तक सीमित नहीं है। निजी अस्पतालों में काम करने वाले उच्च आय वाले डॉक्टर भी इस अभियान का हिस्सा बन सकते हैं। ऐसे डॉक्टर जिनकी मासिक आय एक निर्धारित सीमा से अधिक है, वे अपनी मासिक आय का 2 प्रतिशत इस फंड में स्वैच्छिक अथवा निर्धारित सामाजिक योगदान के रूप में दे सकते हैं। साथ ही इन प्राइवेट अस्पतालों के प्रशासनिक अफसर भी सहयोग कर सकते हैं। यह योगदान किसी डॉक्टर की योग्यता, फीस या पेशेवर स्वतंत्रता पर सवाल नहीं होगा। बल्कि यह डॉक्टर समुदाय की सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रतीक बनेगा। भारत में डॉक्टर को समाज में अत्यंत सम्मान प्राप्त है। जब कोई डॉक्टर अपनी आय का एक छोटा हिस्सा किसी गरीब मरीज के इलाज के लिए देता है तो वह केवल पैसा नहीं देता—वह समाज को यह संदेश देता है कि चिकित्सा पेशा मानव सेवा की मूल भावना से जुड़ा है।

ऐसे उद्योगपति और व्यापारिक घराने जिनकी शुद्ध सालाना आय 100 करोड़ हो वो भी सालाना 1 करोड़ का सहयोग कर सकते सकते हैं

राइजिंग भास्कर का सुझाव है कि ऐसे उद्योगपति और व्यापारिक घराने जिनकी शुद्ध सालाना आय 100 करोड़ रुपए वार्षिक है वे भी 1 करोड़ रुपए सालाना सहयोग कर सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल—इस फंड का लाभ किसे मिलेगा?

यहां स्पष्ट और पारदर्शी नियम बनाना आवश्यक होगा। राइजिंग भास्कर का सुझाव है कि इस योजना के प्रथम चरण में ऐसे गंभीर मरीजों को पात्र बनाया जाए जिनके परिवार की वार्षिक आय 2 लाख रुपए तक हो। लेकिन केवल आय प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं होगा। एक राष्ट्रीय मानक तैयार किया जा सकता है जिसमें निम्न आधार शामिल हों—

  • परिवार की वार्षिक आय।
  • परिवार की संपत्ति और आर्थिक स्थिति।
  • मरीज की बीमारी की गंभीरता।
  • इलाज की अनुमानित लागत।
  • परिवार के पास उपलब्ध स्वास्थ्य बीमा।
  • आयुष्मान भारत या अन्य सरकारी योजना से मिलने वाली सहायता।
  • बीमारी के कारण परिवार की आय पर पड़ा प्रभाव।
  • मरीज की सामाजिक एवं पारिवारिक स्थिति।

इससे फंड का पैसा वास्तव में जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंच सकेगा।

अस्पताल में बने अलग ‘आम आदमी इमरजेंसी काउंटर’

इस योजना की सबसे बड़ी जरूरत होगी—त्वरित निर्णय। गंभीर मरीज अस्पताल में पहुंचा और उसके परिजन कागजी कार्रवाई में कई घंटे लगा दें, तो फंड का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए प्रत्येक पात्र निजी अस्पताल में ‘आम आदमी इमरजेंसी काउंटर’ बनाया जाना चाहिए। यह काउंटर 24 घंटे उपलब्ध हो सकता है। यदि कोई गंभीर मरीज आर्थिक रूप से कमजोर है और तत्काल उपचार की आवश्यकता है तो काउंटर का प्रशिक्षित अधिकारी—

  1. मरीज की पहचान करेगा।
  2. आर्थिक स्थिति की प्रारंभिक जांच करेगा।
  3. बीमारी की गंभीरता का चिकित्सकीय प्रमाण लेगा।
  4. उपलब्ध सरकारी बीमा/योजना की जांच करेगा।
  5. आवश्यकता के अनुसार आम आदमी इमरजेंसी फंड से सहायता मंजूर करेगा।
  6. उपचार शुरू करवाने की प्रक्रिया में देरी नहीं होने देगा।
गंभीर मरीज के लिए पहले जीवन, बाद में कागज।

यही इस व्यवस्था का मूल सिद्धांत होना चाहिए।

इलाज का अर्थ केवल ऑपरेशन नहीं—पूरा इलाज होना चाहिए

राइजिंग भास्कर के प्रस्ताव में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि गरीब मरीज को केवल सर्जरी के लिए पैसा देकर छोड़ दिया जाए, यह पर्याप्त नहीं होगा। यदि मरीज के पास ऑपरेशन के पैसे हैं लेकिन जांच के पैसे नहीं हैं तो समस्या समाप्त नहीं होगी। इसलिए फंड से सहायता का दायरा व्यापक होना चाहिए।

इसमें आवश्यकता के अनुसार—

  • डॉक्टर की फीस,
  • विशेषज्ञ चिकित्सक की फीस,
  • पैथोलॉजी जांच,
  • रेडियोलॉजी जांच,
  • सीटी स्कैन,
  • एमआरआई,
  • ऑपरेशन,
  • ICU,
  • दवाएं,
  • आवश्यक चिकित्सा उपकरण,
  • सर्जिकल सामग्री,
  • रक्त और रक्त संबंधी आवश्यकताएं,
  • अस्पताल का कमरा,
  • नर्सिंग,
  • पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल,
  • अस्पताल आने-जाने की आवश्यक परिवहन सहायता,
  • मरीज के साथ रहने वाले एक जरूरतमंद परिजन के सीमित भोजन/ठहरने का खर्च,

जैसी वास्तविक जरूरतों को नियमों के तहत शामिल किया जा सकता है। इससे मरीज के परिवार को एक हाथ से सहायता देकर दूसरे हाथ से नया खर्च उठाने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।

संसदीय समिति की प्रमुख सोच

संसदीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण समिति की मौजूदा पहल में स्वास्थ्य को अधिक वहनीय और पारदर्शी बनाने पर जोर दिखाई देता है।

  • निजी स्वास्थ्य सुविधाओं की affordability और accessibility की समीक्षा।
  • निजी अस्पतालों में शुल्क की पारदर्शिता की जरूरत।
  • महानगरों में बेसिक कमरे के शुल्क को आसपास के तीन सितारा होटल के औसत टैरिफ से जोड़ने का सुझाव।
  • जटिल उपचार के लिए पहले से व्यापक लागत अनुमान देने की दिशा।
  • निजी अस्पतालों में संपन्न मरीजों/मेडिकल टूरिज्म से होने वाले राजस्व से गरीब मरीजों को क्रॉस-सब्सिडी देने का विचार।
  • बीमा क्षेत्र में उपचार दरों और बिलिंग को अधिक पारदर्शी बनाने की जरूरत पर जोर।

ये सुझाव अभी नीति निर्माण की दिशा में विचार/सिफारिशों का हिस्सा हैं; इन्हें स्वतः लागू कानून नहीं माना जाना चाहिए।

‘आम आदमी इमरजेंसी फंड’ कैसे पारदर्शी रहेगा?

यह प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है। यदि हजारों करोड़ रुपए का कोई फंड बनाया गया और उसका इस्तेमाल पारदर्शी नहीं हुआ तो पूरी योजना की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। इसलिए राइजिंग भास्कर सुझाव देता है कि इसके लिए डिजिटल व्यवस्था बनाई जाए। हर अस्पताल को हर वर्ष बताना चाहिए—

कुल आय — 5% योगदान — केंद्र का सहयोग — राज्य का सहयोग — अन्य योगदान — कुल फंड — लाभार्थी मरीज — इलाज की लागत — बची राशि।

इसका स्वतंत्र ऑडिट हो। एक राष्ट्रीय डिजिटल डैशबोर्ड बनाया जा सकता है, जहां अस्पतालवार जानकारी उपलब्ध हो। मरीज की व्यक्तिगत और चिकित्सकीय गोपनीयता सुरक्षित रखते हुए केवल आवश्यक आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।

फंड का पैसा अस्पताल की कमाई नहीं, मरीज का अधिकार हो

यह स्पष्ट नियम होना चाहिए कि आम आदमी इमरजेंसी फंड की राशि अस्पताल की सामान्य आय का हिस्सा नहीं होगी। इसका उपयोग केवल निर्धारित पात्र मरीजों के इलाज में किया जाए। यदि किसी वर्ष फंड में राशि बच जाती है तो वह अगले वर्ष के लिए आगे बढ़े। अस्पताल बदलने की स्थिति में भी पात्र मरीज की सहायता प्रभावित न हो। इसके लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था बनाई जा सकती है।

आयुष्मान भारत के साथ जोड़ा जा सकता है यह मॉडल

यह प्रस्ताव आयुष्मान भारत के समानांतर कोई अलग और विरोधी व्यवस्था बनाने के बजाय उससे जुड़ सकता है। यदि कोई मरीज आयुष्मान भारत के लिए पात्र है तो पहले उस योजना का लाभ मिले। जहां उपचार की वास्तविक लागत और उपलब्ध पैकेज के बीच अंतर हो, या जहां कोई गंभीर उपचार निर्धारित दायरे में नहीं आता, वहां नियमों के तहत आम आदमी इमरजेंसी फंड से सहायता दी जा सकती है। संसदीय समिति पहले भी उच्च लागत वाली सर्जरी के लिए अलग फंड और दवाओं, विशेषकर कैंसर उपचार जैसी जरूरतों को अधिक प्रभावी ढंग से कवर करने की आवश्यकता पर विचार कर चुकी है। यानी राइजिंग भास्कर का प्रस्ताव मौजूदा स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर करने के बजाय उसे एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच दे सकता है।

निजी अस्पतालों पर ‘लगाम’ से आगे बढ़कर ‘भागीदारी’ का रास्ता

स्वास्थ्य क्षेत्र में केवल सख्त कानून बनाना हमेशा पर्याप्त समाधान नहीं होता। निजी अस्पतालों की अपनी लागत होती है। डॉक्टर, नर्स, तकनीशियन, मशीनें, बिजली, भवन, दवाएं, उपकरण, रखरखाव और आपातकालीन सुविधाएं—इन सब पर भारी खर्च होता है। इसलिए ऐसा मॉडल ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है जिसमें सरकार निजी अस्पतालों को केवल नियंत्रित करने के बजाय उन्हें सामाजिक स्वास्थ्य व्यवस्था का साझेदार बनाए।संसदीय समिति की सोच भी इसी दिशा में एक बड़ा विमर्श खोलती है—निजी क्षेत्र की क्षमता को गरीबों के हित में कैसे इस्तेमाल किया जाए। राइजिंग भास्कर का ‘आम आदमी इमरजेंसी फंड’ इसी विचार को संस्थागत रूप दे सकता है।

अगर डॉक्टर और अस्पताल साथ आ जाएं तो तस्वीर बदल सकती है

देश में हजारों निजी अस्पताल हैं। कल्पना कीजिए, यदि प्रत्येक अस्पताल में हर साल एक समर्पित फंड बने और उसमें अस्पताल की आय का निर्धारित हिस्सा जाए। इसके साथ केंद्र और राज्य सरकार का सहयोग जुड़े।डॉक्टर अपना सामाजिक योगदान दें। सरकारी कर्मचारी 1 से 5 रुपए मासिक दें। सामाजिक संस्थाएं, उद्योगपति, कॉरपोरेट और आम नागरिक भी स्वैच्छिक योगदान कर सकें। तो यह केवल अस्पताल का फंड नहीं रहेगा। यह राष्ट्रीय जनभागीदारी आधारित स्वास्थ्य सुरक्षा तंत्र बन सकता है। यही वह मॉडल है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ की भावना को स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में एक नई सामाजिक शक्ति दी जा सकती है।

प्रस्तावित फंड का मॉडल

मान लीजिए किसी बड़े निजी अस्पताल की पात्र वार्षिक आय 100 करोड़ रुपए है।

  • अस्पताल का 5% योगदान = 5 करोड़ रुपए
  • केंद्र सरकार का सहयोग = 50 लाख रुपए तक
  • राज्य सरकार का सहयोग = 50 लाख रुपए तक
  • डॉक्टर/कर्मचारियों का सामाजिक योगदान = अलग
  • सरकारी कर्मचारियों का सूक्ष्म योगदान = अलग
  • CSR/जनभागीदारी = अलग

तो प्रारंभिक स्तर पर ही फंड में करोड़ों रुपए की राशि उपलब्ध हो सकती है।

नोट : यह केवल समझाने के लिए उदाहरण है। वास्तविक योगदान की गणना और सरकारी हिस्सेदारी के नियम सरकार द्वारा तय किए जाने होंगे।

फंड के लिए राष्ट्रीय मानक जरूरी

इस योजना को सफल बनाने के लिए एक समान राष्ट्रीय गाइडलाइन बनाई जानी चाहिए। केंद्र सरकार स्वास्थ्य मंत्रालय के माध्यम से एक मॉडल नियम तैयार करे। राज्यों को इसमें आवश्यक स्थानीय संशोधन की अनुमति दी जाए।

इसमें यह स्पष्ट हो—

कौन पात्र है?

किस बीमारी को गंभीर माना जाएगा?

अधिकतम कितनी राशि मिलेगी?

कौन मंजूरी देगा?

कितने समय में मंजूरी देनी होगी?

कौन ऑडिट करेगा?

गलत दावा करने पर क्या कार्रवाई होगी?

अस्पताल द्वारा फंड के दुरुपयोग पर क्या दंड होगा?

मरीज की शिकायत कहां होगी?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर पहले से तय होने चाहिए।

आपातकाल में ‘पहले इलाज, बाद में सत्यापन’

राइजिंग भास्कर का सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि जीवन बचाने वाली चिकित्सा में आर्थिक सत्यापन के कारण देरी नहीं होनी चाहिए। हृदयाघात, गंभीर दुर्घटना, ब्रेन स्ट्रोक, भारी रक्तस्राव, सेप्सिस या अन्य जानलेवा स्थितियों में अस्पताल का डॉक्टर पहले चिकित्सा की दृष्टि से मरीज को स्थिर करे। इसके बाद फंड काउंटर आर्थिक पात्रता की प्रक्रिया शुरू करे। जरूरत पड़ने पर प्रारंभिक राशि तुरंत स्वीकृत की जाए और विस्तृत सत्यापन बाद में पूरा हो। क्योंकि मृत्यु के बाद मंजूर हुआ फंड किसी काम का नहीं।

निजी अस्पतालों की जवाबदेही भी तय हो

फंड बनाना पर्याप्त नहीं है। यदि कोई अस्पताल फंड में योगदान करता है लेकिन गरीब मरीज को लाभ नहीं देता तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसी तरह फर्जी मरीज बनाकर फंड का पैसा निकालना, गलत बिल बनाना, अनावश्यक जांच करवाना या फंड से सामान्य मरीज का बिल चुकाना गंभीर अपराध माना जाना चाहिए। इसलिए अस्पताल की आंतरिक व्यवस्था के साथ स्वतंत्र ऑडिट और बाहरी निगरानी जरूरी होगी।

राइजिंग भास्कर की अपील : प्रधानमंत्री इस विचार पर भी करें विचार

राइजिंग भास्कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विशेष आभार इसलिए व्यक्त करता है क्योंकि पिछले वर्षों में केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य को केवल सरकारी अस्पतालों तक सीमित विषय न मानकर बीमा, डिजिटल हेल्थ, निजी अस्पतालों की भागीदारी और व्यापक स्वास्थ्य सुरक्षा से जोड़ने का प्रयास किया है। आयुष्मान भारत के तहत निजी अस्पतालों की बड़ी भूमिका इसका प्रमाण है। फरवरी 2026 तक योजना के अधिकृत अस्पताल दाखिलों में 6.74 करोड़ निजी अस्पतालों में हुए थे। अब उसी अनुभव से आगे बढ़कर एक नई पहल की जा सकती है।‘आम आदमी इमरजेंसी फंड’ को राष्ट्रीय मॉडल के रूप में आजमाया जा सकता है। पहले 100 या 500 बड़े निजी अस्पतालों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो। एक वर्ष तक परिणामों का अध्ययन हो। कितने मरीजों को सहायता मिली? कितनी राशि जमा हुई? कितने परिवार कर्ज में जाने से बचे? कितने मरीजों की जान बची? कहां भ्रष्टाचार या दुरुपयोग की संभावना बनी? इन सबका अध्ययन किया जाए। यदि मॉडल सफल होता है तो इसे देशभर में लागू किया जा सकता है।

यह केवल स्वास्थ्य योजना नहीं, सामाजिक संवेदना का आंदोलन होगा

भारत ने बड़े-बड़े आर्थिक मॉडल बनाए हैं। हमने डिजिटल भुगतान को गांव तक पहुंचाया। हमने जनभागीदारी से स्वच्छता अभियान चलाया। हमने करोड़ों लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा। हमने गरीब परिवारों तक स्वास्थ्य बीमा पहुंचाने का प्रयास किया। अब एक ऐसा मॉडल क्यों नहीं बनाया जा सकता जिसमें हर बड़ा निजी अस्पताल गरीब मरीज के लिए एक सुरक्षा दीवार बने? आज किसी परिवार का कमाने वाला व्यक्ति कैंसर से पीड़ित हो जाता है तो बीमारी से ज्यादा चिंता इलाज के खर्च की होती है। किसी परिवार के युवा को सड़क दुर्घटना में गंभीर चोट लगती है तो अस्पताल पहुंचते ही परिजन पैसे की चिंता में टूट जाते हैं। किसी किसान को हृदय की गंभीर बीमारी होती है तो उसके सामने खेत बेचने या कर्ज लेने की मजबूरी आ सकती है। किसी मजदूर के बच्चे को जटिल बीमारी हो जाए तो परिवार की वर्षों की बचत कुछ दिनों में समाप्त हो सकती है। ऐसे में यदि उसी अस्पताल के पास एक ऐसा फंड हो जो कहे—‘पहले इलाज होगा, पैसा बाद में।’ तो इससे बड़ी मानवीय पहल क्या हो सकती है?

राइजिंग भास्कर के 11 सुझाव

  1.  प्रत्येक बड़े निजी अस्पताल में ‘आम आदमी इमरजेंसी फंड’ बने।
  2.  अस्पताल अपनी निर्धारित वार्षिक आय का 5% इसमें दे।
  3.  केंद्र सरकार 10% और राज्य सरकार 10% तक सहयोग दें।
  4.  सरकारी कर्मचारी 1 से 5 रुपए मासिक स्वैच्छिक योगदान कर सकें।
  5.  निर्धारित आय सीमा से ऊपर के डॉक्टर 2% मासिक आय का सामाजिक योगदान करें।
  6.  उद्योगपति और बिजनैस घराने जिनकी सालाना शुद्ध आय 100 करोड़ हो वे सालाना 1 करोड़ सहयोग करे।
  7.  प्रारंभिक पात्रता वार्षिक पारिवारिक आय 2 लाख रुपए तक रखने पर विचार हो।
  8.  प्रत्येक अस्पताल में 24×7 ‘आम आदमी इमरजेंसी काउंटर’ बने।
  9.  गंभीर मरीज के इलाज में आर्थिक सत्यापन के कारण देरी न हो।
  10.  जांच, डॉक्टर फीस, सर्जरी, दवा, ICU और आवश्यक ठहरने-भोजन सहित समग्र उपचार सहायता मिले।
  11.  फंड का स्वतंत्र ऑडिट, डिजिटल निगरानी और सार्वजनिक पारदर्शिता सुनिश्चित हो।

प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हो सकती है चिकित्सा क्षेत्र की नई शुरुआत

संसदीय समिति ने निजी अस्पतालों की महंगी चिकित्सा व्यवस्था पर जिस गंभीरता से सवाल उठाए हैं, वह स्वागत योग्य है। कमरे के किराए से लेकर उपचार की कीमत, बिलिंग की पारदर्शिता और गरीब मरीजों के लिए क्रॉस-सब्सिडी जैसे मुद्दों पर संसद के स्तर पर विमर्श होना इस बात का संकेत है कि देश अब स्वास्थ्य सेवा की अगली चुनौती की ओर देख रहा है। राइजिंग भास्कर इस विमर्श को केवल आलोचना तक सीमित नहीं रखना चाहता। हम समाधान का प्रस्ताव रखना चाहते हैं। प्राइवेट अस्पतालों को दुश्मन मानकर नहीं, गरीब के उपचार का साझेदार बनाकर आगे बढ़ने का समय है। सरकार को निजी अस्पतालों की जवाबदेही तय करनी चाहिए, लेकिन साथ ही उन्हें सामाजिक स्वास्थ्य सुरक्षा के निर्माण में सहभागी बनाने के रास्ते भी खोलने चाहिए। यदि अस्पताल की कमाई का एक हिस्सा गरीब मरीज के इलाज में जाता है, डॉक्टर अपनी आय का एक छोटा हिस्सा समाज को लौटाते हैं, सरकारी कर्मचारी 1-5 रुपए का योगदान करते हैं और केंद्र व राज्य सरकारें भी अपनी हिस्सेदारी जोड़ती हैं, तो यह फंड धीरे-धीरे इतना मजबूत हो सकता है कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे लाखों परिवारों को नया भरोसा मिल सके। यह प्रस्ताव किसी एक व्यक्ति, अस्पताल या सरकार के खिलाफ नहीं है। यह मरीज के पक्ष में है। यह उस गरीब पिता के पक्ष में है जो अपने बच्चे को बचाने के लिए घर बेचने को मजबूर न हो। यह उस मां के पक्ष में है जिसे पति के इलाज के लिए गहने गिरवी न रखने पड़ें। यह उस मजदूर के पक्ष में है जिसे ऑपरेशन के लिए साहूकार से कर्ज न लेना पड़े। यह उस किसान के पक्ष में है जिसे बीमारी के कारण अपनी जमीन न बेचनी पड़े। और सबसे बढ़कर यह उस भारत के पक्ष में है जो आर्थिक प्रगति के साथ मानवीय संवेदना को भी आगे ले जाना चाहता है।

बीमारी अमीर-गरीब नहीं देखती, इलाज भी नहीं देखना चाहिए

  1. बीमारी किसी की जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा या बैंक बैलेंस देखकर नहीं आती।
  2. दिल का दौरा करोड़पति और मजदूर दोनों को पड़ सकता है।
  3. कैंसर अमीर और गरीब दोनों को हो सकता है।
  4. सड़क दुर्घटना किसी भी परिवार को तबाह कर सकती है।
  5. फिर इलाज की उपलब्धता इतनी अलग क्यों हो?
  6. यह अंतर पूरी तरह खत्म करना शायद आसान न हो, लेकिन उसे कम करना निश्चित रूप से संभव है।

संसदीय समिति ने निजी स्वास्थ्य क्षेत्र की लागत और पहुंच को लेकर जो बहस शुरू की है, उसे अब व्यापक जनभागीदारी से आगे ले जाने की जरूरत है। राइजिंग भास्कर इस पहल का स्वागत करता है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह करता है कि देश में निजी स्वास्थ्य क्षेत्र की सामाजिक भागीदारी के लिए ‘आम आदमी इमरजेंसी फंड’ जैसे अभिनव मॉडल पर भी विचार किया जाए। हो सकता है शुरुआत एक छोटे पायलट से हो।हो सकता है नियमों में बदलाव करना पड़े। हो सकता है अस्पतालों, डॉक्टरों और सरकार के बीच विस्तृत बातचीत करनी पड़े। लेकिन यदि इस प्रयोग से एक भी गरीब परिवार कर्ज में डूबने से बचता है और एक भी गंभीर मरीज समय पर इलाज पाकर जीवन वापस प्राप्त करता है, तो यह पहल सार्थक होगी।

राइजिंग भास्कर की ओर से यही प्रस्ताव है—निजी अस्पतालों की ताकत, सरकार की संवेदनशीलता और समाज की छोटी-छोटी भागीदारी को जोड़कर भारत में ऐसी चिकित्सा सुरक्षा व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें आर्थिक कमजोरी किसी गंभीर मरीज की मौत का कारण न बने।

यह समय केवल चिकित्सा सुविधाएं बढ़ाने का नहीं, चिकित्सा न्याय सुनिश्चित करने का है।

और ‘आम आदमी इमरजेंसी फंड’ उस दिशा में भारत की एक नई चिकित्सा क्रांति की शुरुआत बन सकता है। और इसकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 15 अगस्त को लाल किले से करनी चाहिए। 
Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor