बचपन में मां का साया उठा, मौसी ने मां बनकर संभाला; आज बेटे-बेटी सेवा कार्यों से चांद देवी की स्मृति को कर रहे हैं जीवंत
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
मां की ममता का कोई विकल्प नहीं होता, लेकिन कभी-कभी जीवन ऐसी परिस्थितियां सामने रख देता है, जहां रिश्तों की परिभाषा खून के रिश्ते से आगे बढ़कर ममता, त्याग और समर्पण में बदल जाती है। स्वर्गीय चांद देवी की पांचवीं पुण्यतिथि पर उनके परिवार ने उनकी स्मृति में जिस तरह सेवा और दान-पुण्य का कार्य किया, वह केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि मां के संस्कारों और परिवार के भावनात्मक रिश्तों को समाजसेवा से जोड़ने वाली प्रेरक मिसाल बन गया।
चांद देवी का असमय निधन ब्रेन हेमरेज के कारण हो गया था। उस समय उनके बच्चे छोटे थे। मां का साया अचानक उठ जाने से परिवार के सामने भावनात्मक और पारिवारिक चुनौती का कठिन दौर आया। ऐसे समय में उनकी बहन तनुजा तंवर बच्चों के लिए केवल मौसी बनकर नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने मां जैसी ममता, स्नेह और अपनापन देकर बच्चों को संभाला। आज वही बच्चे बड़े होकर सेवा और दान-पुण्य के कार्यों में आगे बढ़ रहे हैं और अपनी मां की स्मृति को समाजसेवा के माध्यम से जीवित रख रहे हैं।
मां की कमी को मौसी ने ममता से भरा
मां का चले जाना बच्चों के जीवन में ऐसी रिक्तता पैदा करता है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। खासकर तब, जब बच्चे छोटे हों और उन्हें मां की सबसे अधिक जरूरत हो। चांद देवी के बच्चों के जीवन में भी ऐसा ही दौर आया। लेकिन परिवार ने उन्हें अकेला नहीं छोड़ा।
मौसी तनुजा तंवर ने बच्चों को मां जैसा प्यार और संरक्षण दिया। उन्होंने उनके जीवन में मां की कमी को पूरी तरह तो नहीं, लेकिन अपने स्नेह, सहयोग और आत्मीयता से उस खालीपन को कम करने का प्रयास किया। मौसी और भांजे-भांजी का यह रिश्ता समय के साथ और मजबूत होता गया।
यह रिश्ता इस बात की सुंदर मिसाल है कि परिवार केवल रिश्तों के नाम से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े होने की भावना से बनता है। तनुजा ने जिस आत्मीयता से बच्चों को संभाला, उसी स्नेह और संस्कार की छाप आज उनके जीवन में दिखाई देती है।
मां की पुण्यतिथि को बनाया सेवा का अवसर
स्वर्गीय चांद देवी की पांचवीं पुण्यतिथि पर परिवार ने परंपरागत श्रद्धांजलि कार्यक्रम के साथ-साथ सेवा कार्यों को प्राथमिकता दी। परिवार का मानना रहा कि किसी प्रियजन की स्मृति को जीवित रखने का सबसे सुंदर तरीका जरूरतमंदों की मदद करना और जीव-जंतुओं की सेवा करना है।
इसी भावना के साथ परिवार की ओर से श्री राधारानी गोशाला में गोमाता की सेवा की गई। गोशाला में गोमाता के लिए पीने के पानी का टैंकर, हरी घास और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध करवाई गई। गर्मी और बदलते मौसम में गोवंश के लिए पानी और चारे की व्यवस्था करना सेवा का महत्वपूर्ण कार्य है।
परिवारजनों ने गोमाता को सामग्री उपलब्ध करवाते हुए स्वर्गीय चांद देवी की स्मृति को नमन किया और उनके नाम से सेवा कार्य करने को अपने लिए सौभाग्य माना।
बाल आश्रम में बच्चों के साथ बिताया समय
परिवार ने सेवा का दायरा केवल गोसेवा तक सीमित नहीं रखा। वात्सल्यपुरम बाल आश्रम में पहुंचकर बच्चों को अल्पाहार करवाया गया और उनके साथ समय बिताया गया।
बच्चों के साथ कुछ समय बिताना, उनसे बातचीत करना और उन्हें अपनापन महसूस करवाना अपने आप में एक भावनात्मक सेवा है। आश्रम के बच्चों के बीच परिवार की मौजूदगी ने पुण्यतिथि को संवेदना और आत्मीयता से भर दिया।
परिवार का कहना था कि सेवा का अर्थ केवल वस्तुएं या धन देना नहीं है। किसी जरूरतमंद के साथ कुछ समय बिताना, उसके चेहरे पर मुस्कान लाना और उसे अपनेपन का एहसास करवाना भी सेवा का ही एक रूप है।
बेटे-बेटी ने मां की स्मृति को बनाया समाजसेवा का माध्यम
स्वर्गीय चांद देवी के पुत्र समाजसेवी मनीष सोलंकी, सुमित सोलंकी एवं उनकी छोटी बहन तनुजा तंवर ने सेवा कार्यों में सहभागिता निभाई। तीनों ने मिलकर पुण्यतिथि के अवसर पर गोसेवा और बाल सेवा का कार्य किया।
मनीष और सुमित के लिए यह दिन भावनाओं से जुड़ा था। मां की याद हमेशा उनके जीवन का हिस्सा रही है, लेकिन उनकी पुण्यतिथि को सेवा दिवस के रूप में मनाने से उस स्मृति को एक सकारात्मक दिशा मिली। बहन तनुजा का साथ इस अवसर को और अधिक भावनात्मक बना गया, क्योंकि उन्होंने बचपन में मां के जाने के बाद बच्चों के जीवन में ममता और स्नेह का सहारा दिया था।
आज जब परिवार सेवा कार्यों में आगे बढ़ रहा है तो यह केवल व्यक्तिगत श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उन संस्कारों का विस्तार है, जो परिवार को एक-दूसरे से जोड़े रखते हैं।
मां का स्नेह और मौसी का समर्पण बना जीवन की ताकत
चांद देवी अपने बच्चों के बचपन में ही दुनिया से विदा हो गईं। मां की ममता का प्रत्यक्ष साथ भले ही उन्हें कम समय मिला, लेकिन परिवार ने उस ममता की कमी को महसूस होने नहीं दिया। तनुजा तंवर ने मौसी के रिश्ते को मां के स्नेह में बदल दिया।
उन्होंने बच्चों को भावनात्मक सहारा दिया, उनका साथ निभाया और परिवार के कठिन समय में उनके लिए मजबूत आधार बनीं। यही कारण है कि आज बच्चे भी मौसी के प्रति मां जैसा ही सम्मान और स्नेह रखते हैं।
यह रिश्ता समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश देता है कि परिवार में एक-दूसरे का सहयोग केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रेम और संवेदना का विस्तार है। जब कोई रिश्ता निस्वार्थ भाव से निभाया जाता है तो वह आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी प्रभावित करता है।
श्रद्धांजलि ऐसी, जो किसी के जीवन में मुस्कान लाए
आज अक्सर पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि के आयोजन औपचारिकता तक सीमित रह जाते हैं। लेकिन चांद देवी के परिवार ने उनकी पांचवीं पुण्यतिथि को सेवा से जोड़कर यह संदेश दिया कि किसी दिवंगत आत्मा को सच्ची श्रद्धांजलि उसके नाम पर किए गए सकारात्मक कार्यों से दी जा सकती है।
गोशाला में पानी और चारा उपलब्ध करवाकर जहां बेजुबान गोवंश की जरूरत पूरी की गई, वहीं बाल आश्रम में बच्चों को अल्पाहार करवाकर उनके साथ समय बिताया गया। इन दोनों सेवाओं का स्वरूप अलग था, लेकिन भावना एक ही थी—किसी के जीवन में राहत और खुशी पहुंचाना।
यही भावना पुण्यतिथि को स्मरण के साथ-साथ कर्म का दिन बना देती है।
‘सेवा करते रहेंगे, यही मां के लिए सच्ची श्रद्धांजलि’
परिवारजनों ने स्वर्गीय चांद देवी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी स्मृति में सेवा कार्यों को आगे भी जारी रखने का संकल्प लिया। उनका मानना है कि मां की स्मृति केवल तस्वीरों और यादों में नहीं, बल्कि उन कार्यों में भी जीवित रहनी चाहिए, जिनसे किसी जरूरतमंद को लाभ मिले।
परिवार ने कहा कि पुण्यतिथि पर जरूरतमंदों और गोमाता की सेवा करने का सौभाग्य मिला। भविष्य में भी इसी प्रकार सेवा और दान-पुण्य के कार्यों को जारी रखने का प्रयास रहेगा।
एक परिवार, दो पीढ़ियां और सेवा की एक ही भावना
चांद देवी की पुण्यतिथि पर किया गया सेवा कार्य केवल एक परिवार की श्रद्धांजलि नहीं है। यह उस पारिवारिक संस्कार की कहानी है, जिसमें एक मां की स्मृति, एक मौसी का ममत्व और बच्चों का सेवा भाव एक साथ दिखाई देता है।
एक ओर मां चांद देवी की स्मृतियां हैं, दूसरी ओर मौसी तनुजा का त्याग और सहयोग है, और आज उसी परिवार की अगली पीढ़ी समाजसेवा को अपनी जिम्मेदारी मानकर आगे बढ़ रही है। यह भावनात्मक यात्रा बताती है कि अच्छे रिश्तों और संस्कारों की विरासत समय के साथ आगे बढ़ती है।
मां आज भौतिक रूप से साथ नहीं हैं, लेकिन उनके बच्चों की सेवा भावना में उनकी स्मृति जीवित है। मौसी ने जिस ममता से बच्चों को संभाला, उसका सकारात्मक प्रभाव आज उनके कार्यों में नजर आ रहा है।
स्वर्गीय चांद देवी की पांचवीं पुण्यतिथि पर गोमाता को पानी और हरी घास, बाल आश्रम के बच्चों को अल्पाहार और अपनापन देना एक ऐसी श्रद्धांजलि बन गया, जिसमें आंसुओं के बजाय सेवा की मुस्कान है। मां की स्मृति को कर्म से जीवित रखने और मौसी के ममत्व को सम्मान देने वाली यह कहानी बताती है कि सच्चे रिश्ते समय के साथ खत्म नहीं होते—वे सेवा, संस्कार और संवेदना के रूप में अगली पीढ़ी में जीवित रहते हैं।
