पोषण सप्ताह के बहाने सामने आई तस्वीर; बच्चों के लिए लंबाई और वजन के नए मानकों पर जोर, संतुलित थाली में दाल, हरी सब्जी, बाजरा, छाछ और तेल को जरूरी बताया गया
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
भारत को अन्नपूर्णा और कृषि प्रधान देश कहा जाता है, लेकिन देश में बच्चों के पोषण की स्थिति अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। पोषण सप्ताह के अवसर पर सामने आई एक रिपोर्ट में बच्चों के कम वजन और महिलाओं में एनीमिया जैसी समस्याओं को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों के पोषण का आकलन केवल उम्र के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी लंबाई और वजन के अनुपात को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। सरकार का पोषण अभियान भी बच्चों में बौनापन, कम वजन, एनीमिया और जन्म के समय कम वजन जैसी समस्याओं को कम करने पर केंद्रित है।
उम्र के साथ लंबाई-वजन भी जरूरी
बच्चे का विकास सामान्य है या नहीं, यह पता लगाने के लिए उसकी उम्र के साथ लंबाई और वजन की नियमित निगरानी महत्वपूर्ण मानी जाती है। पोषण संबंधी मूल्यांकन में लंबाई के अनुसार वजन जैसे मानकों का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे कम वजन अथवा गंभीर कुपोषण की पहचान समय रहते की जा सके।
इसी दिशा में रिपोर्ट में 2 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए नए पोषण मानकों का उल्लेख किया गया है। इसका उद्देश्य बच्चों के शारीरिक विकास की बेहतर निगरानी और पोषण संबंधी समस्या की शुरुआती पहचान करना है।
₹50 में तैयार हो सकती है संतुलित पोषण थाली
रिपोर्ट में एक ऐसी पोषण थाली का उदाहरण भी दिया गया है, जिसकी अनुमानित लागत करीब 50 रुपये बताई गई है। इसमें अलग-अलग खाद्य पदार्थों को शामिल कर संतुलित भोजन तैयार करने पर जोर दिया गया है।
इस थाली में प्रमुख रूप से—
मसूर/चना – 50 ग्राम
गुड़ और नींबू
नमक-मसाला
बाजरे की दो छोटी रोटियां – करीब 100 ग्राम
मौसमी हरी सब्जी – 200 ग्राम
आलू-टमाटर-प्याज की सब्जी – 100 ग्राम
छाछ – 100 ग्राम
सरसों/सोया तेल – 10 मिलीलीटर
जैसे खाद्य पदार्थ शामिल किए गए हैं। इसका उद्देश्य यह संदेश देना है कि पोषणयुक्त भोजन के लिए महंगे खाद्य पदार्थ ही जरूरी नहीं, बल्कि स्थानीय और आसानी से उपलब्ध अनाज, दाल, सब्जियां और दुग्ध उत्पादों से भी संतुलित थाली तैयार की जा सकती है।
राजस्थान समेत तीन राज्यों की तस्वीर चिंताजनक
गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान के आंकड़ों की तुलना की गई है। इसमें बच्चों के पोषण, महिलाओं एवं किशोरियों में एनीमिया और आंगनवाड़ी केंद्रों से जुड़े आंकड़े दिए गए हैं। प्रकाशित आंकड़ों में राजस्थान में बच्चों के कम वजन से जुड़ी स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक दिखाई गई है। रिपोर्ट में राजस्थान के लिए करीब 44.3 प्रतिशत, मध्य प्रदेश के लिए 33 प्रतिशत और गुजरात के लिए 13.51 प्रतिशत का आंकड़ा दर्शाया गया है। महिलाओं और किशोरियों में एनीमिया के आंकड़े भी पोषण की समस्या को केवल बच्चों तक सीमित नहीं रखते। इसका सीधा संबंध परिवार और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य से भी है।
पहले 1,000 दिन सबसे महत्वपूर्ण
भारत सरकार के पोषण अभियान में गर्भधारण से लेकर बच्चे के दो वर्ष की उम्र तक के पहले 1,000 दिनों को विशेष महत्व दिया गया है। इस अवधि में उचित पोषण और स्वास्थ्य देखभाल बच्चे के आगे के विकास की नींव तैयार करती है। इसीलिए गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और छोटे बच्चों के पोषण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। आंगनवाड़ी केंद्र इस निगरानी और पोषण सेवाओं की पहुंच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सिर्फ भोजन नहीं, जागरूकता भी जरूरी
कुपोषण से निपटने के लिए केवल भोजन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। परिवारों को यह जानकारी भी होना जरूरी है कि बच्चे की उम्र के अनुसार उसका वजन और लंबाई कैसी होनी चाहिए, कब चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए और भोजन में किन स्थानीय खाद्य पदार्थों को शामिल किया जा सकता है। सरकार का मिशन सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के पोषण तथा स्वास्थ्य को बेहतर बनाने पर केंद्रित है। पोषण ट्रैकर जैसे डिजिटल माध्यमों से बच्चों के विकास और सेवाओं की निगरानी भी की जा रही है। पोषण सप्ताह केवल जागरूकता का अवसर नहीं, बल्कि यह सोचने का समय भी है कि देश में उपलब्ध खाद्यान्न और संसाधनों का लाभ हर बच्चे तक किस तरह पहुंचे। संतुलित भोजन, नियमित स्वास्थ्य जांच, लंबाई-वजन की निगरानी और परिवारों में पोषण संबंधी जागरूकता—इन चारों पर एक साथ काम करके ही कुपोषण की चुनौती को कम किया जा सकता है।

