दिलीप कुमार पुरोहित. इंदौर/दुबई
शिक्षक दिवस के अवसर पर शुभ संकल्प समूह, इंदौर (मध्य प्रदेश) (एकलव्य समूह) के तत्वावधान में एक विशेष अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन किया जा रहा है। परिचर्चा का विषय है— “डिजिटल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में गुरु-शिष्य संबंध : चुनौतियाँ, संभावनाएँ और भविष्य”।
यह परिचर्चा 6 सितंबर 2026, रविवार को UAE समयानुसार प्रातः 9:30 से 10:30 बजे तथा भारतीय समयानुसार प्रातः 11:00 से दोपहर 12:00 बजे आयोजित होगी। परिचर्चा में भारत एवं विदेशों से जुड़े प्रख्यात शिक्षाविद्, प्रोफेसर, साहित्यकार और चिंतक सहभागी बनकर शिक्षा के बदलते परिदृश्य तथा गुरु-शिष्य संबंधों के विभिन्न आयामों पर अपने विचार साझा करेंगे।
परिचर्चा के पैनल में डॉ. सुनीता श्रीवास्तव, संस्थापक; डॉ. नितिन उपाध्ये, प्राध्यापक, दुबई एवं संचालक; शारजाह से जुड़े साहित्यकार श्री जय कृष्ण मिश्रा एवं श्री कुल भूषण व्यास, भारत से डॉ. बृजेश पारे, प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, रसायन शास्त्र विभाग, माधव विज्ञान महाविद्यालय, उज्जैन; डॉ. आँचल मिश्रा, प्राध्यापक-कम्युनिकेशन स्किल्स, आईएमएस-गाजियाबाद शामिल हैं।
आज के समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट, डिजिटल कक्षाओं और ऑनलाइन शिक्षण ने ज्ञान प्राप्त करने के साधनों को अभूतपूर्व रूप से बदल दिया है। विद्यार्थी अब कुछ ही क्षणों में दुनिया भर की सूचनाओं और शैक्षणिक सामग्री तक पहुँच सकते हैं। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब सूचना और ज्ञान की उपलब्धता इतनी सहज हो गई है, तब गुरु की भूमिका क्या होगी और गुरु-शिष्य संबंध किस स्वरूप में विकसित होगा?
परिचर्चा में इसी महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार-विमर्श किया जाएगा। वक्ता इस बात पर चर्चा करेंगे कि AI शिक्षक का विकल्प बनने के बजाय शिक्षक के सहयोगी और प्रभावी शैक्षिक उपकरण के रूप में किस प्रकार उपयोगी हो सकता है। साथ ही, तकनीकी दक्षता के साथ मानवीय संवेदना, नैतिक मूल्यों, संस्कार, रचनात्मकता, विवेक और व्यक्तिगत मार्गदर्शन की आवश्यकता पर भी विमर्श होगा।
भारतीय परंपरा में गुरु को केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक और व्यक्तित्व-निर्माता माना गया है। डिजिटल युग में इस परंपरा को आधुनिक तकनीक के साथ किस प्रकार जोड़ा जाए, यह परिचर्चा का एक प्रमुख केंद्र होगा।
आयोजकों का मानना है कि यह अंतरराष्ट्रीय परिचर्चा शिक्षा, तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने तथा भविष्य के गुरु-शिष्य संबंध की नई संभावनाओं को समझने की दिशा में एक सार्थक पहल सिद्ध होगी।
