( पूर्व जस्टिस गोपालकृष्ण व्यास जोधपुर ही नहीं देश की जानी मानी हस्ती है। आप राज्य मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष हैं और इन दिनों साहित्य सृजन और सामाजिक सेवा में रत हैं। आपकी कविताओं में मानव प्रेम, करुणा, देशभक्ति, पर्यावरण प्रेम, प्रकृति प्रेम और सम सामयिक विषयों का समावेश रहता है। यहां पर व्यासजी की कुछ कविताएं पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं। आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी। -संपादक)
व्यथा और वफ़ा
जीवन के इस दिसंबर में
कुछ बात बताना चाहूँगा,
मेरे जीवन की तासीर से
तारूफ़ करवाना चाहूँगा।
जननी ही हम बच्चों का
सच्चा साथ निभाती है,
पिता का अनुशासन हमें
जीने की राह दिखाता है।
न डरा कभी न झुका कभी
राहों पर चलता ही गया,
मेहनत से सबकुछ मिलता है
ये सच समझ मे आ गया।
सफल हुआ तब अपनों ने
मुझको अपना दिखा दिया,
जब मैं काम न उनके आया
मुझ को घमण्डी दिखा दिया।
रिश्ते नातों का वजूद भी
काँच का शीशा होता है,
खरोंच थोड़ी लग जाने पर
चेहरा भी धुंधला दिखता है।
माता पिता के बाद गुरुजी
शिक्षा से जीवन को गढ़ते है,
गुरुजन से शिक्षा पाकर हम
अपना किरदार निभाते हैं।
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भोर की भोलावण
आवाज सुरीली मोर की
जब कानों में पड़ती है,
सच कहता हूँ सुबह सुबह
अमृत वाणी सी लगती है।
पूर्व दिशा में छाई लालिमा
संदेश ये सबको देती है,
भोर भई जागो सब प्राणी
आव्हान सबसे करती है।
श्री विष्णु की पवित्र धरा पर
जब सूर्य किरणें घिरती है,
इंसान की ख़ुशहाली के लिए
पुरुषार्थ की शक्ति देती है।
उषाकाल में लालिमा सबको
संदेश हमको यह देती है,
यह जीवन तुम्हारा अनमोल है
हमको समझाती रहती है।
भोर में जल्दी उठने वाले ही
जीवन सफल हो जाते हैं,
बड़ों का सम्मान करने वाले
जीवन में सब कुछ पाते हैं।
माता पिता की कृपा से उनका
सम्मान समाज करता है,
इस प्राचीन परम्परा को जिसने
घर मे कायम कर रखा है।
इसी लिए आने वाली पीढ़ी भी
सेवा उनकी दिल से करती है,
परम्पराओं का पालन करने का
चरित्र का निर्माण करती है।
हर सेवा करने वाले मानव की
इच्छाएं सब पूरी होती है।
अपनत्व
प्रेम एक एहसास है
मानव जीवन में खास है,
रखो सँभाल के जीवन भर
जब तक मन मे विश्वास है।
नजदीक बैठें अपनों की
कमियां ज्यादा दिखती है,
आने वाले अजनबियों की
सूरत चमकती दिखती है।
अपनी कमियां छिपाकर
अपनों को कोसते रहते हैं,
ऐसे इंसान इस दुनिया में
जीवन में सुख नहीं पाते हैं।
बाहर से आने वाले को
अधिक विद्वान समझते हैं,
उपेक्षित उनसे हो जाने पर
क्यूं अपने फिर याद आते हैं।
अमूल्य है इंसान का जीवन
ये सत्य सबको बतलाना है,
आने वाली पीढ़ी को हमें
इसका मतलब समझाना है।
आँधी तूफान और भूकंप तो
धरती पर आते और जाते हैं,
सूर्य चंद्रमा झिलिमिल तारे
सब साथ निभाकर चलते हैं।
पेड़ की शाखाएँ झूमकर
सब दूर दूर लहराती हैं
तूफान आँधी आ जाने पर
आकर गले मिल जाती हैं।
उनसे सीख लेकर हम
जीवन का हर सुख पाएँगे
परिवार की मर्यादाओं की
हम फिर से अलख जगाएँगे।
जीवन है पतंग
पतंग का आनंद है
ना करती कोई शोर,
प्रेम से बोलो वो काटा
टूट जाती धागे की डोर।
रँगों को लेकर उड़ जाती
बादल की ओट छुप जाती,
जब तक थामे रखती डोर
कहने में रहती पतंग डोर।
जीवन भी एक पतंग है
साँसों की डोर से चलता है
जिस दिशा जाना चाहो
उस ओर घूमती रहती डोर।
जब लड़ती है पतंग पेच
धागे को काटने लगती है
मांजे की धार तेज रखकर
आवारा बनकर उड़ जाती है।
जीवन भी एक पतंग है
साँसों की डोर से चलता है,
श्रीराम जब तक थामे रखते
हर प्राणी का जीवन चलता है।
गाँधी वापस आ जाओ
कोई कहता ताक़तवर हूँ
कोई कहता विद्धवान हूँ,
इंसानों की इस बस्ती में
मानवता ढूंढता फिरता हूँ।
कोई कहता धनवान हूँ
कोई कहता भगवान हूँ,
अभिमान भरे विचारों में
में गाँधी ढूंढता फिरता हूँ।
कोई कहता में निराला हूँ
कोई कहता में सुरीला हूँ,
आरोह अवरोह के बीच मैं
गाँधी को ढूंढता फिरता हूँ।
कोई कहता जमीदार हूँ
कोई कहता में नेता हूँ,
गरीबों की झोंपड़ियों मैं
गांधी को ढूँढता रहता हूँ।
विश्वास है कभी ना कभी
प्रेम जरूर दिख जाएगा
रिश्तों से भरी दुनिया में
अपना कोई मिल आएगा।
हर जीव के जीने का वक्त
इस दुनिया मे निर्धारित है,
फ़िर भी ताकत दिखाने को
हर सख्श यहाँ लालायित है।
चलो उठो हम सब मिलकर
इंसानियत ढूंढ़ने चलते हैं,
अहिंसा के प्रणेता गाँधी को
हम धरती पर वापस लाते हैं।
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