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Friday, July 10, 2026, 6:09 pm

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Lifestyle

अशफाक अहमद फौजदार की गजल एवं नज्म

(अशफाक अहमद फौजदार उर्दू के बेहतरीन शाइर, गजलकार है। आप देश के चोटी के रचनाकारों में शुमार है। आपकी रचनाओं में जीवन की हकीकत बयां होती है। आप जहां अपने अनुभवों को भावों के साथ इस कदर प्रस्तुत करते हैं कि पढ़ने वाले शब्दों की  गहराई से रूबरू होते हैं। आपने प्रेम पर कई गजलें लिखीं हैं। जिंदगी-मौत, धूप-छांव, खुशी-गम, दुनियादारी ऐसे कई विषय हैं जिन पर आपने अधिकारपूर्वक लिखा है। यहां आपकी कुछ गजलें और नज्म प्रस्तुत हैं। आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।-संपादक।)

ग़ज़ल

अपने दर…

हम लौटे खुद अपने दर।
है ये कितना अच्छा घर।।

हम को इश्क तो होना था।
अब हम को किस बात का डर।।

किस्मत वाला पायेगा।
चाहे जितनी कोशिश कर।।

छाया के संग धूप मिली।
सब की जीस्त में है चर भर।।

यारों पंछी चहकेगा।
उसको चाहे क़ैद में कर।।

पंछी परवाज़ करेगा ।
चाहे उसको ज़ख्मी कर।।

देवदास कहेंगे तुझको ।
तूं बस पारो के दर मर।।

नज़्म का उन्वान “तुम्हें क्या मालूम”

कल मेरी भी तो शब कैसे गुजरी तुम्हे क्या मालूम।
हर पल याद की बिजली चमकी तुम्हे क्या
मालूम।

शिद्दत की गर्मी में ठण्डी बयार चली तुम्हें क्या मालूम।
मेरे दिलबर की छत पे जुल्फें बिखरी तुम्हें क्या मालूम।

परदेस गये मेहबूब का आने का पैगाम मिला उनको।
वे भी आईने के रुबरु सजी सँवरी तुम्हें क्या मालूम।

कहने को तो आदम और हव्वा से खताएँ हुई पर।
बदले में इक दिलकश कायनात मिली तुम्हें क्या मालूम।

यारों है कहकशां चुप तारे भी है चुप मैं बातें करु किससे।
हर शैय को मनाने में जिन्दगी कटी तुम्हें क्या मालूम।

हम को रब के होने का पता चल ही जाता इक लम्हे मेँ।
यारों धरती बस थोड़ी सी हिली तुम्हें क्या मालूम।

लोगों देखो सहरा में रहते रहते दिवाना कैसे मर गया ।
आखिर को विराने पर क्या गुजरी तुम्हें क्या मालूम।

कुछ तो सबब होगा शब को कमर सितारों के चमकने का।
मुफलिस के दर मुफ्त रोशनी मिली तुम्हे क्या मालूम।

कोठों महलों से उतरी गजलें और मर्तबा हासिल किया।
वो भी आहों को बयां कर निखरी तुम्हें क्या मालूम।

ग़ज़ल

मौत की नींद…

मौत की नींद मत सुला बाबा।
लोगों को उस से बचा बाबा।।

ज़िन्दगी तो मौत से बेहतर है।
मौत से मत हाथ मिला बाबा।

जो करले यम से भी मुकाबला।
सावित्री को फिर से बुला बाबा।।

अच्छी लगती है वक्त पे कुछ शय।
तूं तो दिन में मत तारे दिखा बाबा।।

दोष गिनाना आसान है अशफाक।
खुद को भी आईना दिखा बाबा।।

ग़ज़ल

आईने सा…

आईने सा है तर्ज़ ए बयां मेरा।
दुनियां चाहे देखे अक्श अपना।।

जो दिल हारा वो जीता सब कुछ।
तूं तो दुनियां वालों को ये बता।।

सब का हक यकसां पेड़ पे तो।
पंछी यार नहीं कहते तेरा मेरा।।

तुम जो भी दोगे वो तो पाओगे।
अच्छा है ग़म नहीं खुशी देना।।

बन जाओगे जन्नत के हकदार।
तुम तो मां-बाप की दुआ लेना।।

जाना ही होगा जनता के रुबरु।
रहबर बै सिर पैर की मत उड़ा।।

देख वो तो तुझ में है अशफाक।
दुनियां में उसको बेकार ही ढूंढ़ा।।

ग़ज़ल

सपने देखा करता हूं…

सपने देखा करता हूं।
गोया आशिक जैसा हूं।।

जान हमारी यार ग़ज़ल।
उस से उल्फत करता हूं।।

ग़म की आग में जलकर ही।
कुन्दन बन कर निकला हूं।।

रोशन हो जाये दुनिया।
यार दिये सा जलता हूं।।

कोई ठोकर ना खाए।
दीपक रोशन करता हूं।।

बच्चे आराम से गुजरेंगे।
राह के कंकड़ चुनता हूं।।

लोग सभी खुश हो जाये।
मैं अच्छी बातें करता हूं।।

मैं भी कह दूं अच्छा शायद।
मीर ओ ग़ालिब को पढ़ता हूं।।

खुद खुश रहता अशफाक।
औरौ को खुश रखता हूं।।

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अशफाक अहमद फौजदार
जोधपुर राजस्थान

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor