(मां के साथ ऐसा न्याय एक न्यायाधीश ही कर सकता है। पूर्व जस्टिस गोपालकृष्ण व्यास ऐसे कवि है जो तमाम ऊंचाइयां छूने के बावजूद मां की अनदेखी नहीं करते। उनका मानना है कि आप जगत के शहंशाह बन जाओ पर मां को दुखी कर दिया तो आपकी बादशाहत बेकार है। उनके मन के भावों ने कविता का जो रूप धरा है उसे हूबहू पाठकों के लिए पेश किया जा रहा है। आप अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजें हम उसे भी प्रकाशित करेंगे-संपादक)
प्रथम गुरु मां का वंदन
शहंशाह बनने की जिद में
बड़े बंगलों में रहता हूँ,
माँ के क्वार्टर के आईने में
मैं अक्स देखने जाता हूँ,
कभी-कभी चेहरा उसका
जेहन में मेरे आ जाता है
सेकती थी माँ जहाँ रोटियां
वो चूल्हा दिख जाता है,
उस चूल्हे में तपती आग से
हाथ भी जल जाता था,
परवाह उसकी किये बिना
रोटी बनाती रहती थी
रोटी बनाकर हम बच्चों को
हाथों से हमें खिलाती थी
अब सब कुछ हमारे पास है,
पर माँ के हाथ नहीं दिखते
तय है,एक दिन मुझको वापस,
इस दुनिया से जाना है
परमपिता के पावन चरणों में
मुझको शीश झुकाना है,
है परम पिता मेरी अर्ज सुनो
फिर माँ का आँचल देना,
जिसकी छाँव में सोने का मुझे
पावन अवसर वापस देना
सुन जीजी मुझे भूख लगी है,
एक रोटी मुझे बनाकर दो,
पिलाओ मुझे उस घड़े का पानी
जो आप सींचकर लाती थी।
उस निर्मल पानी को पीकर मेरी
प्यास तुरन्त बुझ जाती थी
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर
चरणों में शीश झुकाता हूँ
आपकी शिक्षा पाकर में अपना
जीवन आनंद से जीता हूँ।
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