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Thursday, July 9, 2026, 5:23 am

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क्या जैन ऋषि के श्राप से हुआ था पृथ्वी का जन्म?

रहस्मयी संत परम पूज्य पंकजप्रभु ने राइजिंग भास्कर के पाठकों के लिए दिए अपने प्रवचन में किया नया खुलासा

डी.के. पुरोहित. जोधपुर

इस पृथ्वी के बारे में रहस्मयी संत परमपूज्य पंकजप्रभु ने नया खुलासा किया है। राइजिंग भास्कर के पाठकों के लिए दिए अपने प्रवचन में पंकजप्रभु ने कहा कि पृथ्वी जिसे अचला कहते हैँ जैन ऋषि चलानंद प्रभु की पत्नी है।

उन्होंने शुक्रवार को मानसिक तरंगों के जरिए दिए प्रवचन में कहा कि साइंस कहता है कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। मगर पृथ्वी के लिए हमारे शास्त्रों ने अचला यानी जो चलायमान नहीं है, शब्द इस्तेमाल किया है। अचला यानी पृथ्वी चलायमान नहीं है। फिर वैज्ञानिक किस आधार पर कहते हैं कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। साइंस अपनी जगह सही है और हमारे शास्त्र अपनी जगह। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर अपने अक्ष पर घूमती है, यही कारण है कि हमें इसका अहसास नहीं होता और नजर नहीं आती। इस तरह पृथ्वी अचला है और गतिशील भी। पृथ्वी अचला जरूर है मगर गति उसका स्वभाव है। पृथ्वी हमारी मां है इसलिए अचला नहीं हो सकती। क्योंकि मां अचला कैसे हो सकती है?

अब सवाल है कि अचला नाम पृथ्वी का कैसे पड़ा? आदि काल में एक ऋषि थे- चलानंद प्रभु…वे दुनिया के पहले जैन ऋषि थे। वे समुद्र पर चला करते थे। जब समुद्र की लहरों ने चलानंद प्रभु की साधना भंग की तो उन्होंने श्राप दे दिया कि आज से तुम अचला हो जाओ (यानी चलना बंद हो जाओ) तब समुद्र ने ऋषि के सामने दया की भीख मांगी और कहा कि ऐसा श्राप ना दें क्योंकि यह समुद्र की नैसर्गिक हत्या हो जाएगी। लहरें समुद्र का प्राण है और अगर लहरें ही अचला हो जाएगी तो समुद्र कहां जाएगा? आखिर ऋषि को दया आ जाती है और वह कहते हैं कि मैं अचला से विवाह करूंगा और उन्हें अपना साधना स्थली बनाऊंगा। कहते हैं उस दिन समुद्र से पृथ्वी बाहर आई और उसका दूसरा जन्म हुआ और तब से इस पृथ्वी को अचला कहा जाता है। दुनिया के किसी भी शास्त्र या ग्रंथ में हे मानव तुम्हें यह कहानी नहीं मिलेगी, क्योंकि यह कहानी सिर्फ और सिर्फ मुझे पता है। इस कहानी को मैंने अपने साधना चक्षुओं से देखा है। तब चलानंद प्रभु और अचला ने मिलकर अपना परिवार बढ़ाया और तब से धरती पर ऋषि की संतान पली-बढ़ी और आज जैन धर्म का वट वृक्ष इतना समृद्ध हो सका। जैन धर्म की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी यह धरती यानी अचला पुरानी है। धरती के जन्म से पहले भी जैन ऋषि का अस्तित्व विद्यमान था।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor