(आदमी जीवन भर भागदौड़ करता है। कुछ आदमी जीवन में बुलंदियां छू लेते हैं। पर मन के कोने में हर आदमी की इच्छा रहती है कि वह अमर हो जाए। उसे दुनिया याद करे। जीवन क्षणभंगुर है। पल-पल नष्ट हो रहा है। हम हर दिन मौत के करीब जा रहे हैं। जाने कब सांसों पर विराम लग जाए। एक कवि मन भी सोचता है काश उसे भी लोग याद रखे। ऐसे ही विचारों और जीवन की हकीकत को पूर्व जस्टिस गोपालकृष्ण व्यास ने बहुत ही सरल और सादगी के साथ प्रस्तुत किया है। इस कविता को हमने पूर्व में कई बार पढ़ा है, लेकिन हर बार इसमें हमें गंभीर भाव नजर आते हैं। देश-विदेश के राइजिंग भास्कर के पाठकों के लिए यह कविता पेश है। आप अपनी प्रतिक्रियाएं हमें भेज सकते हैं।-संपादक)
जीवन का सच
आज हूं पर कल ना रहूंगा
एक दिन मैं इतिहास बनूंगा।
लेखक की किसी कहानी में
कोई छोटा सा किरदार बनूंगा।
लिखते समय किरदार मेरा
लेखक मुझ पर कृपा करना।
नफरत करने वाले लोगों का
कोई अच्छा सा नाम लिखना।
मुझे दुनिया में लोगों ने
हृदय से पूरा प्यार दिया।
छोटी बड़ी सब कमियों को
दिल से नजर अंदाज किया।
धरती पर ऋतुओं को मैने
सपनों में संजोकर जीया है।
बचपन में मां की गोदी में
ममता का आनंद लिया है।
जो कुछ पाया अच्छा पाया
मुझको उसका गिला नही।
नफरत करने वालों से मुझे
मन मे कोई शिकवा भी नहीं।
दुनिया के सब साथियों से
में विनती करके कहता हूं।
रिश्तों को रखो संभालकर
ये समय कभी रुकता नहीं।
दुनिया रूपी इस रंगमंच पर
नियमित नाटक खेले जायेंगे।
सूरज चंद्रमा भी बिना रुके
दिन औऱ रात बनाते जाएंगे।
द्वेष प्रेम की राहें अलग हैं
ना साथ कभी चल पाती है।
संयम रखने वाले लोगों को
जीवन में खुशियां मिलती है।
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