शिव वर्मा. जोधपुर
चिंतन कीजिए, चिंता नहीं। चिंता करेंगे तो भटक जाएँगे, चिंतन करेंगे तो भटके हुओं को रास्ता दिखाएँगे।
30 जुलाई। राष्ट्र-संत श्री ललित प्रभ ने कहा कि हमें तनाव और चिंता के मकडज़ाल में उलझने की बजाय अपने दिमाग का उपयोग चिंतन के लिए करना चाहिए। चिंता से मन की शांति खत्म होती है, आँखें कमजोर होती है, स्मरण शक्ति प्रभावित होती है, पाचन शक्ति कमजोरी होती है और रक्तचाप, शुगर और हार्ट अटैक जैसी बीमारियाँ हो जाती हैं। चिंताग्रस्त व्यक्ति हँसी और खुशी को खत्म कर देता है। जैसे घुन गेहूँ को भीतर ही भीतर खाकर खत्म कर देती है ऐसे ही चिंता और तनाव हमारे मन की शांति और प्रसन्नता को खत्म कर देते हैं। दुनिया में हजार बीमारियाँ एक तरफ और तनाव-चिंता की बीमारी एक तरफ तब भी इसका पलड़ा भारी रहेगा। सच्चाई तो यह है कि सौ बीमारियों का जनक होता है हमारा तनाव।
संतप्रवर यहाँ गाँधी मैदान में आयोजित 57 दिवसीय प्रवचन माला में टेंशन मिटाने के आसान तरीके’ विषय पर प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा कि तनाव अस्थाई है जो कि थोड़ी देर के लिए हमारे भीतर पनपता है वहीं चिंता लम्बे समय तक हमारे भीतर हावी हो जाती है। तनाव बाहर के निमित्तों से आता है और चिंता भीतर के निमित्तों से। हमें प्रभु की व्यवस्थाओं में विश्वास रखना चाहिए। वह सबको भूखा उठाता है पर किसी को भूखा सुलाता नहीं है। माँ के पेट से बच्चा बाद में बाहर आता है उसके लिए दूध की व्यवस्था पहले हो जाती है। खेती इंसान करता है पर उसके लिए धान बाद में आता है, जानवरों के लिए घास पहले आती है। जीवन में निन्यानवें द्वार बंद हो जाएँ तब भी मन से हताश न हों क्योंकि प्रकृति और परमात्मा की ओर से सौवाँ द्वार जरूर खुला रहता है। जो बंद द्वारों को देखेगा वह तनाव और चिंता में घिर जाएगा और जो खुले द्वार की तलाश करेगा वह समाधान का रस्ता पा लेगा। दुनिया में ऐसा कोई इंसान नहीं जिसकी कोई समस्या न हो और ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान न हो।
संतप्रवर ने कहा कि तनाव-मुक्त जीवन जीने के लिए जब ज्यादा तनाव में हों तो गहरी लम्बी साँस लें, उल्टी गिनती गिनना शुरू करें, वर्तमान पर अपना ध्यान केन्द्रित करें और खुद की अथवा दूसरों की कमियों को देखने की बजाय खूबियों को सराहें। उन्होंने कहा कि जीवन में ऋतुओं की तरह भाग्य बदलता है इसलिए उठा-पटक किसी के जीवन में संभव है। जीवन में बंद द्वारों को भूलें और खुले द्वार की तलाश करें। जो चोंच देता है वह चुग्गा भी देता है, जो जीवन देता है वो जीवन जीने की व्यवस्था भी देता है। जिंदगी में भय का भूत भगाएँ क्योंकि भयभीत व्यक्ति हमेशा तनाव और चिंता में रहता है। दुनिया में कोई दो बार नहीं मरता और मौत से पहले कोई नहीं मरता।
उन्होंने कहा कि हमें छोटी-छोटी बातों का बड़ा सिर दर्द नहीं बनाना चाहिए। रात गई और बात गई। अगर हम समय रहते एक दूजे की बात को समझकर समाधान का रास्ता निकाल देते हैं तो दोनों तरफ से चिंता से बच सकते हैं। हमें अपनी इच्छाओं को भी सीमित करना चाहिए क्योंकि इच्छाएँ कभी पूरी नहीं होती और इच्छा-शक्ति कभी अधूरी नहीं रहती। चाह गई, चिंता गई, मनवा बेपरवाह। जिनको कछु न चाहिए, वो साहन का शाह। मनुष्य की बेलगाम इच्छाएँ चिंता और तनाव का मुख्य कारण बनती हैं। विश्वास रखें, ऊपर वाला हमारी हर व्यवस्था का ध्यान रखता है। वह हमें वह नहीं दे सकता जो हम पसंद करते हैं इसलिए हम दुखी हैं। सुख का मार्ग यही है जो उसने दिया है उसको पंसद कीजिए, आप सदा सुखी रहेंगे।
संतप्रवर ने कहा कि चिंतामुक्त जीवन जीने के लिए हमें वर्तमान में जीने की आदत डालनी चाहिए। अतीत सपना है, भविष्य कल्पना है, सिर्फ वर्तमान ही अपना है। इसलिए आज का आनंद लीजिए, कल की चिंता से बाहर निकल जाइए। दुनिया में सबके वक्त बदलते हैं, घबराइए मत चुनौती का सामना कीजिए, अगर कभी पाँव में पहनने के लिए जूते भी न हों तब भी प्रभु से शिकायत मत कीजिए, शुक्राना अदा कीजिए कि पाँव में पहनने के लिए जूते नहीं हैं पर कम-से-कम पाँव तो हैं। दुनिया में लाखों लोग ऐसे हैं जिनके पाँव भी नहीं हैं। फूलों में काँटे देखना बंद कीजिए इससे आप दुखी हो जाएँगे। मन को सकारात्मक बनाइए और काँटों में भी फूलों को देखने की आदत डालिए इससे आप तनाव और चिंता-मुक्त जी सकेंगे।
समारोह का शुभारम्भ चातुर्मास के लाभार्थी सुरेश, दिनेश साबू, समाज सेवी उम्मेदमल गाँधी, रवि भंडारी, कैलाश राठी, चन्द्रा महेता, एवं भाजपा ग्रामीण मंत्री रमेश विश्नोई ने दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया।




