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Sunday, August 23, 2026, 5:02 pm

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श्राद्धपक्ष में पितरों के कल्याणार्थ आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का पूर्णारती के साथ हुआ विराम

श्रीमद्भागवत कथा श्रवण से होता है जीव का उद्धार : महंत श्रीधरगिरी महाराज

पंकज जांगिड़. जोधपुर

आसोज बदी श्राद्ध पक्ष के चलते पितरों के कल्याणार्थ रातानाडा ओल्ड कैंपस के सामने स्थित पीपलेश्वर महादेव मंदिर में मंदिर के महंत श्रीधरगिरी महाराज के सानिध्य में मंदिर समिति सदस्यों, क्षेत्रवासियों और भक्तों की ओर से आयोजित कथा का पूर्णारती के साथ विराम हुआ।

मंदिर के महंत श्रीधरगिरी महाराज ने माता-पिता-गुरुदेव, गौमाता, दीन-दुखियों की सेवा और जीव दया को महान बताते हुए बताया कि कथावाचक सुनिल महाराज ने सात दिवसीय भागवत कथा के अंतिम दिन विभिन्न प्रसंगों के दौरान श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह, ऊषा चरित्र, नृग चरित्र, वासुदेव नारद संवाद, सुदामा चरित्र प्रसंग, परीक्षित मोक्ष की कथा का बड़े ही रोचक अंदाज में वर्णन किया।

सुदामा चरित्र को विस्तार से सुनाते हुए श्रीकृष्ण सुदामा की निश्छल मित्रता का वर्णन करते हुए बताया कि कैसे बिना याचना के कृष्ण ने गरीब सुदामा की स्थिति को सुधारा। सुदामा चरित्र के माध्यम से श्रोताओं को श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की मिसाल पेश की और समाज को समानता का संदेश दिया। प्रसंग से ओतप्रोत भजनों और भगवान श्री कृष्ण की झांकी बनी प्रियंका, राधा बनी पिंकी और सुदामा बने सवाई राम चौधरी की मनमोहक झांकियों ने सभी का मन मोह लिया, जिसे देखकर हर कोई भाव विभोर हो उठा। श्रीकृष्ण-रुक्मणी के प्रसंग में बताया कि जो भक्त प्रेमी कृष्ण-रुक्मणी के विवाह उत्सव में शामिल होते हैं उनकी वैवाहिक समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। महाराज ने कहा कि जीव परमात्मा का अंश है। इसलिए जीव के अंदर अपार शक्ति रहती है। यदि कोई कमी रहती है, तो वह मात्र संकल्प की होती है।

महाराज ने भागवत को अपने जीवन में उतारने की सभी भक्तों से अपील की। महाराज ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का सात दिनों तक श्रवण करने से जीव का उद्धार हो जाता है, वहीं इस कथा को कराने वाले भी पुण्य के भागी होते हैं। कथा का सारांश बताते हुए कहा कि जीवन कई योनियों के बाद मिलता है और इसे कैसे जीना चाहिए, इसके बारे में भक्तों को समझाया। पूर्णारती और प्रसादी के साथ कथा का विराम हुआ।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor