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Thursday, July 9, 2026, 10:25 pm

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Lifestyle

कविता : कोरा कागज

कवि: एन डी निम्बावत सागर

कोरा कागज़

कोरा कागज़ सा होता है
बचपन हमारा मगर
उकेर देते है उस पर
कभी हम खुद तो
कभी दूसरे आड़ी टेडी रेखाएं ।

नहीं होता उस समय
मालूम हमें
इसके दूरगामी परिणाम
और
भटक जाते हम दिशाएं ।

फिर चाहे करलें
कितने भी यत्न-प्रयत्न
मगर
कभी टलेगी नहीं
जीवन में आने वाली बलाएं ।

जवानी के इस तूफ़ान में
चरम पर पहुंची मदहोशियां
उड़ा कर ले जाती है
बचपन के कोरे कागज़ को
ज़माने की बिगड़ी हवाएं ।

एड एन डी निम्बावत “सागर”
जोधपुर (राज.)

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor