कवि: एन डी निम्बावत सागर
कोरा कागज़
कोरा कागज़ सा होता है
बचपन हमारा मगर
उकेर देते है उस पर
कभी हम खुद तो
कभी दूसरे आड़ी टेडी रेखाएं ।
नहीं होता उस समय
मालूम हमें
इसके दूरगामी परिणाम
और
भटक जाते हम दिशाएं ।
फिर चाहे करलें
कितने भी यत्न-प्रयत्न
मगर
कभी टलेगी नहीं
जीवन में आने वाली बलाएं ।
जवानी के इस तूफ़ान में
चरम पर पहुंची मदहोशियां
उड़ा कर ले जाती है
बचपन के कोरे कागज़ को
ज़माने की बिगड़ी हवाएं ।
एड एन डी निम्बावत “सागर”
जोधपुर (राज.)




