डॉ. मदन मोदी जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस में बतौर जर्नलिस्ट लंबे समय तक जुड़े रहे हैं। फ्री लांस पत्रकारिता भी की। वे साउथ एशिया के सबसे बड़े सेंटर से ग्रेजुएट हैं। मनोविज्ञान उनका विषय रहा। उन्हें नैचुरोपैथी और किचन किंग माना जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा और किचन थैरेपी पर उनके यू-टयूब चैनल खूब पसंद किए गए हैं। इन दिनों डॉ. मदन मोदी स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर रहे है, मगर जीवन के झंझावतों से हारे नहीं हैं, उम्र के इस पड़ाव के बावजूद वे बड़े ख्वाब के लिए अपने को तैयार कर रहे हैं। उनमें गजब की ऊर्जा है। उनसे लिए साक्षात्कार के संपादित अंश यहां प्रस्तुत हैं-
दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. उदयपुर
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उम्र का तकाजा उनके चेहरे पर साफ झलकता है, मगर अनुभव के तकाजे के आगे उम्र का तकाजा मायने नहीं रखता। पिछले दिनों वे बेड से दो बार गिर पड़े और कंधे और कूल्हों में फ्रैक्चर हो गया। प्लेट और स्क्रू लगे और डॉक्टर्स ने कंपलीट रेस्ट करने को कहा, मगर डॉ. मदन मोदी जुनून के पक्के हैं और धुन के धनी। आराम करना तो जैसे उनके शब्दकोष में ही नहीं हैं। जीवन के हर पल को मानव सेवा और प्रकृति के संस्कारों में जीने वाले डॉ. मोदी ने ठान लिया है कि वे फिर से खड़े होंगे। उन्हें पूरा विश्वास है कि वे अपने सपनों का वो सेंटर बनाएंगे, जहां विभिन्न रोगों का नैचुरोपैथी से इलाज हो सकेगा। उनका ख्वाब बड़ा है और उद्देश्य उससे भी बड़ा। जब आदमी अच्छे विचारों और शुद्ध भावों को लेकर कोई लक्ष्य रखता है तो प्रकृति भी उसका साथ देती है। और फिर डॉ. मदन मोदी ने तो प्रकृति से इलाज करने की मंशा से प्रकृति को प्रमोट करने का ख्वाब देखा है। डॉ. मदन मोदी जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस में बतौर जर्नलिस्ट लंबे समय जुड़े रहे हैं। फ्री लांस पत्रकारिता भी की। वे साउथ एशिया के सबसे बड़े सेंटर से ग्रेजुएट हैं। मनोविज्ञान उनका विषय रहा। उन्हें नैचुरोपैथी और किचन किंग माना जाता है। उनसे लिए साक्षात्कार के संपादित अंश यहां प्रस्तुत हैं-
राइजिंग भास्कर : नैचुराेपैथी की तरफ झुकाव कैसे हुआ?
डॉ. मदन मोदी : जब मैंने देखा कि एलोपैथी में लूट मची है। हर आदमी ठगा जा रहा है। एक तरफ बीमारी से उनका मनोबल टूट रहा है, दूसरी तरफ पैसों से टूट रहा है। साथ ही साथ एक बीमारी का इलाज करवाने जाता है और एलोपैथी दवाओं के इस्तेमाल से जो साइड इफैक्ट हो रहे हैं, उससे दूसरी बीमारियां घर कर जाती हैं। ऐसे में मैंने रिसर्च की। नैचुरोपैथी को करीब से जाना और तय किया कि प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति से लोगों को ठीक करूंगा। मैंने वही किया और धीरे-धीरे यू-टयूब चैनल पर अपने वीडियो डालने लगा। लोग मुझे सुनने लगे। मुझसे प्रभावित होने लगे। मैंने देखा कि कैंसर के ऐसे मरीज जो लास्ट स्टेज पर थे और डॉक्टर्स ने कह दिया कि घर ले जाओ और अब बस सेवा लिखी है और 15-20 दिन या दो-चार महीने के मेहमान हैं। मैंने देखा कि प्रकृति पद्धत औषधियों से उनका उपचार करने पर वे चार-पांच साल से आसानी से जी रहे हैं। परिवार के साथ हंसी-खुशी जीवन यापन कर रहे हैं। वाकई प्रकृति के अनुरूप जीवन जीकर हम कैंसर को भी मात दे सकते हैं।
राइजिंग भास्कर : आपने कहा कि प्रकृति के आधार पर जीवन जीकर… कैंसर को मात दे सकते हैं, कैसे?
डॉ. मदन मोदी : आईआईटी मद्रास में कैंसर पर रिसर्च चल रहा है। आईआईटी मद्रास में गर्म मसालों पर शोध चल रहा है। मैंने भी कई बार कहा है कि गर्म मसालों से कैंसर का इलाज किया जा सकता है। कई मरीज ठीक हुए भी हैं। तो मैं यह कहना चाहूंगा कि आईआईटी मद्रास में गर्म मसालों से कैंसर के इलाज पर रिसर्च चल रही है। वाकई हमारे किचन में गर्म मसाले जरूर होने चाहिए। हमारे किचन में गर्म मसाले, काली मिर्च, सोंठ, दालचीनी, इलायची और कच्ची घाणी का सरसों का तेल भी होना चाहिए। साथ ही हमारे किचन में सफेद नमक, शक्कर, रिफाइंड तेल और मेदा तो किसी भी सूरत में नहीं होना चाहिए। अगर हम ऐसा कर लें तो कई रोगों का स्वत: इलाज हो जाएगा। कैंसर, डायबिटीज और बीपी के लिए प्राकृतिक इलाज जरूर अपनाने चाहिए।
राइजिंग भास्कर : तो क्या आप एलोपैथी के विरोधी हैं?
डॉ. मदन मोदी : मैंने ऐसा नहीं कहा। मगर मैं यह कहना चाहूंगा कि 500 साल और 1000 साल पहले कब एलोपैथी था। राम-रावण युद्ध और महाभारत के समय कहां एलोपैथी था। उस समय भी दिन भर युद्ध होता और रात को इलाज कर सुबह फिर योद्धा युद्ध के लिए खड़े हो जाते थे। हमारा प्राकृतिक और आयुर्वेद साइंस इतना सुदूढ़ और एडवांस था कि उस समय के उदाहरण हमारे सामने हैं। हमारे ग्रंथों में सब रोगों का इलाज है। आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति अपनाकर हम रोगों पर काबू पा सकते हैं। लेकिन मैं यह भी कहूंगा कि मैं पूरी तरह से एलोपैथी का विरोधी नहीं हूं। एलोपैथी की सुविधाओं का हमें लाभ उठाना ही चाहिए।
राइजिंग भास्कर : कई रोगों में सर्जरी जरूरी हो जाती है? क्या फिर भी आप कहेंगे कि प्राकृतिक चिकित्सा से इलाज करवाओ?
डॉ. मदन मोदी : देखिए अगर हम अपना आहार सही कर लें और प्रकृति प्रदत्त जीवन जीयें तो हम बीमार ही नहीं पड़ेंगे। जब बीमार ही नहीं पड़ेंगे तो सर्जरी की जरूरत ही कहां पड़ेगी। हमारे ग्रंथों में भी कहा गया है कि हमारा आहार ही हमारी औषधि है और हमारी औषधि ही हमारा आहार है। यानी हम अपने आहार और दिनचर्या को संयमित करके न केवल निरोगी रह सकते हैं वरन कई बीमारियां तो पास ही नहीं आएंगी। जैसे नीम को गांव का दवाखाना कहते हैं। नीम से सैकड़ों बीमारियों का इलाज हो सकता है। हल्दी से भी सैकड़ों बीमारियों का इलाज हो सकता है। अगर व्यक्ति एक आवलां रोज खाए तो निरोगी रह सकता है।
राइजिंग भास्कर : आपका सपना है कि ऐसा लार्ज स्कैल पर सेंटर हों जहां हर बीमारी का नैचुरोपैथी से इलाज हो, इसके लिए क्या कर रहे हैं?
डॉ. मदन मोदी : देखिए पिछले दिनों मैं बेड से दो बार गिर गया था। जिससे मेरे कंधे और कूल्हों में फ्रैक्चर हो गया। मेरे प्लेटें और स्क्रू लगे। डॉक्टर्स ने मुझे कंपलीट रेस्ट करने को कहा है। मगर मैं रोज मरीजों को देख रहा हूं। मरीज ठीक भी हो रहे हैं। मुझे पूरा भरोसा है कि मैं फिर से खड़ा हो जाऊंगा। फिर से लडूंगा और मेरा सपना है कि ऐसा लार्ज स्कैल पर सेंटर बनाया जाए, जहां हर रोगों का प्राकृतिक पद्धति से इलाज हो। मेरे सपने के लिए मैं प्रयासरत हूं।
राइजिंग भास्कर : कुछ अपने संघर्षों और व्यक्तिगत अनुभव के बारे में बताएं?
डॉ. मदन मोदी : नैचुराेपैथी की धुन सवार हुई तो मन में विचार आया कि क्यों न लार्ज स्केल पर ऐसी संस्था बनाऊं, जहां लोगों का इलाज हो। जहां लोग हंसी खुशी ठीक हों। प्रकृति के करीब रहें और प्रकृति के अनुरूप उनका इलाज हो। देश में खुशनुमा वातावरण बने। यह मेरा ड्रिम है। ड्रिम पूरा करने की चिंता में मुझे बीपी रहने लगा। हाईपर टेंशन की वजह से मुझे पेरेलाइस हो गया, जिसे मैंने 90 प्रतिशत कवर कर लिया। दो बार बेड से गिरा, उसके बारे में तो बता हूं चुका हूं। एक बात और बताना चाहूंगा कि कोविड से पहले सात राज्यों में मेरे 100 से ज्यादा सेमिनार हुए। लोग कहते कि आप बहुत अच्छा बता रहे हैं मगर आपके बाद हमें कौन बताएगा? क्यों न अपने अनुभवों के आधार पर किताबें लिखो। कोविड के दौरान मुझे मौका मिला। लॉकडाउन में किताबें लिखने का जुनून सवार हो गया। हुआ यह कि रात-दिन किताबें लिखने और आराम नहीं कर पाने के कारण हिमाेग्लोबिन 4.5 हो गया और प्लेटलेट्स 42 हजार से नीचे पहुंच गई और बी-12 भी 50 से नीचे चला गया। मैं बाथरूम में चक्कर खाकर गिर पड़ा ओर रीढ की हड्डी में मल्टीपल फ्रैक्चर हो गया। मगर मैंने बाहर का इलाज नहीं किया। खुद ने ही ट्रीट किया। पपीते के पत्तों का रस पीकर, कीवी, ज्वार के आटे की राबड़ी, खजूर, गुड़, मुनका का सेवन कर मैंने अपना हिमोग्लोबिन 15 दिन में 8.2 और प्लेटलेट्स साढ़े चार लाख किया। एनिमिया और डेंगू में उपरोक्त इलाज रामबाण है।
राइजिंग भास्कर : कुछ और काम की बातें आप पाठकों को बताना चाहेंगे?
डॉ. मदन मोदी : व्यक्ति को पानी अधिक पीना चाहिए। खिलाड़ी, शारीरिक काम अधिक करने वाले और अलग-अलग लोगों के लिए यह मात्रा अलग अलग हो सकती है। यदि किसी का वजन 70 किलो है तो उसे प्रतिदिन 24 घंटे में 5 लीटर पानी पीना चाहिए। पानी का मतलब केवल पानी ही नहीं है, उसमें जूस आदि लिक्विड भी आ जाते हैं। लेकिन कोल्ड ड्रिंक्स आदि नहीं पिएं। 24 घंटे में आधा घंटा मेडिटेशन करना चाहिए। आजकल मेडिटेशन कम और कसरत अधिक हो रही है। मैं यह कहना चाहूंगा कि हमें योग के आठ वेदों को पढ़ना और समझना होगा। अगर योग पूरी तरह नहीं कर पाएं तो कसरत और वॉक करनी ही चाहिए। मेडिटेशन करें तो शब्द का मोन उच्चारण कर या बोल कर भी कर सकते हैं। लंबी सांस लेकर छोड़कर भी मेडिटेशन कर सकते हैं। दिन में 100 बार अनुलोम विलोम करना ही चाहिए। योग का हमारे जीवन में बड़ा महत्व है। ऋषि-मुनि भी योग करते थे। गर्भावस्था और रुग्णावस्था में योग को संभलकर करना चाहिए और कुछ योग वर्जित माने गए हैं। एलोविरा और तुलसी भी शरीर के लिए फायदेमंद है। तुलसी का अर्क बड़ा फायदेमंद है। पुदीना और हरा धनिया भी प्राकृतिक औषधि है। अनार, पपीता, केला, अमरूद, सेव, आंवला जरूर सेवन करें। पेट साफ रहे। कब्ज ना रहे। हमारे यहां 80 से 90 प्रतिशत लोगों को कब्ज रहती है। कब्ज सभी बीमारियों की जड़ है। आयुर्वेद में भी वैद्य पेट साफ रखने पर जोर देते हैं और एलोपैथी में भी एनिमा लगाकर ऑपरेशन से पहले पेट साफ करते हैँ। यह मेंडेटरी कंडिशन है। बाहर का खान पान छोड़े । घर का खाना खाएं और बाहर का जंक फूड और फास्ट फूड बिलकुल बंद कर देना चाहिए।
राइजिंग भास्कर : 50 की उम्र के बाद आदमी को क्या सावधानी रखनी चाहिए?
डॉ. मदन मोदी : देखिए 50 की उम्र के बाद जीवन शैली पर विशेष ध्यान देना चाहिए। खासकर खान पान का संयम रखना चाहिए। सीजनल फल खाने चाहिए। यही नहीं मौसम के अनुरूप आहार लेना चाहिए। सर्दी में गुड और खजूर खानी चाहिए। हल्दी पर और आंवलों पर जोर देना चाहिए। एनर्जी फूड लेना चाहिए। ऐसे ही कई प्रकार के तरीके अपनाकर हम अपने को निरोगी रख सकते हैं।
राइजिंग भास्कर : हमारी प्राकृतिक और आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का हृास कैसे हुआ?
डॉ. मदन मोदी : देखिए अंग्रेजों का शासन आया तो उन्होंने हमारी गुरुकुल पद्धति पर हमला बोला। अंग्रेजी शिक्षा हावी होती गई और एलोपैथी का बोलबोला बढ़ा। ऐसे में हमारे ग्रंथों और संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा पर हमला हुआ। हमारी आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा की अनदेखी की गई। आजाद भारत में सरकारों ने भी आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा को बढ़ाने का प्रयास नहीं किया। एलोपैथी के लिए करोड़ों का बजट दिया जाता है, मगर आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के लिए सरकारें बजट नहीं देती। ऐसे में आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का विकास नहीं हो पाता। जरूरत है कि सरकारें आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने के लिए प्रयास करें।
राइजिंग भास्कर अपील :
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