जोधपुर की समाजसेवी विदुषी ने शिक्षा, संस्कार और अणुव्रत आंदोलन के माध्यम से नैतिक मूल्यों को दिया नया आयाम
अणुव्रत आंदोलन की प्रेरक व्यक्तित्व डॉ. सुधा भंसाली
दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर
अणुव्रत आंदोलन और जैन संस्कारों के प्रसार-प्रचार में उल्लेखनीय योगदान देने वाली जोधपुर की प्रख्यात समाजसेवी एवं शिक्षाविद् डॉ. सुधा भंसाली को वर्ष 2026 के लिए राइजिंग भास्कर का ब्रांड एंबेसडर घोषित किया गया है। अणुव्रत आंदोलन के सिद्धांतों को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने, नैतिक मूल्यों के विकास और जीवन में संयम, सादगी तथा अनुशासन की स्थापना के लिए उनके लंबे समय से किए जा रहे कार्यों को देखते हुए यह सम्मान प्रदान किया गया है।
डॉ. सुधा भंसाली का व्यक्तित्व शिक्षा, संस्कार, सेवा और सामाजिक नेतृत्व का सुंदर समन्वय है। उन्होंने न केवल अपने जीवन में अणुव्रत के सिद्धांतों को अपनाया, बल्कि समाज को भी इसके माध्यम से नैतिकता और सदाचार का मार्ग दिखाने का सतत प्रयास किया है।
जोधपुर में जन्म, शिक्षा में उत्कृष्टता
डॉ. सुधा भंसाली का जन्म 26 दिसंबर 1956 को जोधपुर में हुआ। प्रारंभ से ही अध्ययन और संस्कारों के प्रति उनकी गहरी रुचि रही। उन्होंने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए साइंस ऑफ लिविंग और समाजशास्त्र (Sociology) में डबल एमए की डिग्री प्राप्त की। इसके साथ ही उन्होंने योग विषय में पीएचडी कर अपने अध्ययन को और व्यापक बनाया।
उनकी शिक्षा केवल डिग्रियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने ज्ञान को समाज के लिए उपयोगी बनाने का कार्य भी किया। योग, जीवन-मूल्यों और आत्मानुशासन के क्षेत्र में उनका अध्ययन और अनुभव आज भी लोगों को प्रेरित करता है।
पारिवारिक जीवन
डॉ. सुधा भंसाली का विवाह 21 अप्रैल 1977 को श्री अशोक भंसाली के साथ हुआ। परिवार और समाज के बीच संतुलन बनाकर उन्होंने अपने जीवन को आदर्श रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी बेटी ऋतु पटवा गृहिणी हैं, जबकि दामाद गौरव पटवा हीरा (डायमंड) व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। परिवार में उनकी दो दोहितियां हैं।
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कशिश कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही हैं।
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खुशी मुंबई में वेल्थ मैनेजमेंट के क्षेत्र में प्रथम वर्ष की छात्रा हैं।
डॉ. सुधा भंसाली का मानना है कि परिवार ही संस्कारों की पहली पाठशाला होता है और यदि परिवार में नैतिक मूल्यों का वातावरण हो तो समाज स्वतः ही सशक्त बन जाता है।
तेरापंथ महिला मंडल में सक्रिय भूमिका
डॉ. सुधा भंसाली ने जैन समाज की प्रमुख संस्था तेरापंथ महिला मंडल में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। वे इस संगठन में पूर्व मंत्री रह चुकी हैं। उनके कार्यकाल में महिलाओं के नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक उत्थान के लिए अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए। उन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भरता, संस्कार और समाजसेवा से जोड़ने का कार्य किया। उनके नेतृत्व में महिला मंडल ने धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों को नई ऊर्जा दी।
अणुव्रत समिति जोधपुर में नेतृत्व
अणुव्रत आंदोलन के प्रचार-प्रसार में डॉ. सुधा भंसाली की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने अणुव्रत समिति जोधपुर में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।
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2005 से 2012 तक – मंत्री
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2012 से 2017 तक – उपाध्यक्ष
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2017 से 2021 तक – अध्यक्ष
इन वर्षों में उन्होंने अणुव्रत आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए अनेक कार्यक्रम, संगोष्ठियां, प्रतियोगिताएं और जागरूकता अभियान चलाए। उनके नेतृत्व में अणुव्रत समिति ने युवाओं, विद्यार्थियों और समाज के विभिन्न वर्गों को नैतिक जीवन की प्रेरणा दी।
राज्य स्तर पर भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
वर्ष 2021 में उन्हें अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी के निर्देशन में सह राज्य प्रभारी घोषित किया गया। इसके बाद वे लगातार तीन वर्षों से राज्य स्तर पर सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। वर्तमान में वे राज्य प्रभारी के साथ-साथ जोधपुर संभाग की प्रभारी भी हैं। उनके मार्गदर्शन में अणुव्रत आंदोलन को राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में मजबूती मिली है।
राष्ट्रीय स्तर पर मिली उपलब्धियां
डॉ. सुधा भंसाली ने अणुव्रत आंदोलन के साहित्यिक और वैचारिक पक्ष में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी लेखनी और विचारों को राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है। 2016 में आयोजित अणुव्रत आलेख प्रतियोगिता में उनका लेख “अणुव्रत – कल, आज और कल” पूरे भारत में प्रथम स्थान पर रहा। इसके लिए उन्हें गुवाहाटी (असम) में सम्मानित किया गया। इसी वर्ष आयोजित अणुव्रत स्लोगन प्रतियोगिता में भी उन्हें प्रोत्साहन पुरस्कार मिला। इसके अलावा 2013 में उन्हें अणुव्रत आंदोलन श्रेष्ठ कार्यकर्ता सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें लाडनूं में आयोजित समारोह में प्रदान किया गया। यह सम्मान उन्हें नैतिक मूल्यों के विकास और संवर्धन में समर्पित कार्यकर्ता के रूप में दिया गया था।
अणुव्रत का अर्थ और महत्व
डॉ. सुधा भंसाली बताती हैं कि अणुव्रत दो शब्दों से मिलकर बना है—अणु और व्रत।
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अणु का अर्थ है – सूक्ष्म या छोटा
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व्रत का अर्थ है – संकल्प
इस प्रकार अणुव्रत का अर्थ है छोटे-छोटे संकल्पों के माध्यम से जीवन में बड़े परिवर्तन लाना। उनका कहना है कि संकल्प कितना भी छोटा क्यों न हो, उसकी शक्ति असीम होती है।
अणुव्रत आंदोलन की स्थापना
अणुव्रत आंदोलन की स्थापना 1 मार्च 1949 को सरदारशहर में आचार्य तुलसी ने की थी। उस समय विश्व में युद्ध और हिंसा का माहौल था और मानवता नैतिक संकट से गुजर रही थी। ऐसे समय में आचार्य तुलसी ने अणुव्रत आंदोलन की शुरुआत की, जिनका उद्देश्य था—मानव समाज को नैतिक मूल्यों और आत्मसंयम के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना।
आधुनिक युग में अणुव्रत की आवश्यकता
डॉ. सुधा भंसाली का कहना है कि आज का युग परमाणु बम और अत्याधुनिक हथियारों का युग है। ऐसे समय में अणुव्रत जैसे नैतिक आंदोलन की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ जाती है। उनके अनुसार अणुव्रत केवल धार्मिक आंदोलन नहीं है, बल्कि यह एक मानवीय और नैतिक आंदोलन है, जो व्यक्ति के चरित्र निर्माण पर जोर देता है।
चरित्र की प्रधानता
अणुव्रत आंदोलन में उपासना तत्व गौण और चरित्र की प्रधानता को महत्व दिया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को नैतिक और अनुशासित जीवन जीने के लिए प्रेरित करना है। अणुव्रत व्यक्ति को यह सिखाता है कि जीवन में सादगी, संयम, सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को अपनाकर ही सच्चा सुख प्राप्त किया जा सकता है।
संकीर्णताओं से परे
डॉ. सुधा भंसाली का कहना है कि अणुव्रत किसी भी प्रकार की जाति, लिंग, भाषा या प्रांत की संकीर्णताओं से बंधा हुआ नहीं है।अणुव्रत का द्वार समस्त मानव समाज के लिए खुला है। यह आंदोलन किसी विशेष समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवता के कल्याण के लिए कार्य करता है।
व्यावहारिक जीवन का मार्ग
अणुव्रत केवल सैद्धांतिक विचार नहीं है, बल्कि यह जीवन में अपनाने योग्य व्यावहारिक प्रयोग है। यह व्यक्ति को अपने व्यवहार में सुधार करने और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की प्रेरणा देता है। अणुव्रत का मूल संदेश है—हिंसा को कम करना और मानवता को मजबूत बनाना।
संयम, सादगी और भाईचारा
अणुव्रत आंदोलन के अनुसार जीवन में विकास की मूल नीति है—
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संयम
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सादगी
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भाईचारा
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अनुशासन
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जीवन-मूल्य
इन सिद्धांतों को अपनाकर व्यक्ति न केवल अपना जीवन बेहतर बना सकता है, बल्कि समाज में भी शांति और सद्भाव स्थापित कर सकता है।
समन्वय अणुव्रत का आदर्श
डॉ. सुधा भंसाली का कहना है कि समन्वय अणुव्रत का सबसे बड़ा आदर्श है। समन्वय ही इसका लक्ष्य, मार्ग और फल है। इसका अर्थ है कि विभिन्न विचारों, संस्कृतियों और समुदायों के बीच संतुलन और सहयोग की भावना विकसित करना।
अणुव्रत बंधन नहीं, दर्पण है
डॉ. सुधा भंसाली के अनुसार अणुव्रत कोई बंधन नहीं है। यह व्यक्ति के जीवन का दर्पण है, जो उसे अपने आचरण को देखने और सुधारने की प्रेरणा देता है। अणुव्रत आत्मालोचन की प्रक्रिया को मजबूत बनाता है और व्यक्ति को अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित करता है।
जीवन की पवित्रता और चेतना जागरण
अणुव्रत का संबंध जीवन की पवित्रता और चेतना के जागरण से है। यह व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और आत्मिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाता है। जो व्यक्ति अणुव्रत के सिद्धांतों का निष्ठापूर्वक पालन करता है, वह जीवन में सच्ची शांति और आनंद का अनुभव करता है।
समाज के लिए प्रेरणा
डॉ. सुधा भंसाली का मानना है कि जब तक मानव समाज में दुर्बलताएं, स्वार्थ और नैतिक पतन रहेगा, तब तक अणुव्रत आंदोलन की उपयोगिता बनी रहेगी। अणुव्रत केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है, जो व्यक्ति को बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है।
ब्रांड एंबेसडर के रूप में नई जिम्मेदारी
राइजिंग भास्कर द्वारा वर्ष 2026 के लिए ब्रांड एंबेसडर बनाए जाने के बाद डॉ. सुधा भंसाली की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। अब वे अणुव्रत आंदोलन और जैन संस्कारों के संदेश को और व्यापक स्तर पर पहुंचाने के लिए कार्य करेंगी। उनका उद्देश्य है कि समाज में नैतिक मूल्यों, संयम और सदाचार की भावना मजबूत हो तथा नई पीढ़ी अणुव्रत के सिद्धांतों को अपनाकर एक बेहतर समाज का निर्माण करे। डॉ.. सुधा भंसाली का जीवन शिक्षा, सेवा और संस्कार का प्रेरक उदाहरण है। अणुव्रत आंदोलन के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण ने उन्हें समाज में एक विशिष्ट पहचान दिलाई है। आज जब दुनिया नैतिक चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे समय में डॉ. सुधा भंसाली जैसे व्यक्तित्व समाज को सही दिशा देने का कार्य कर रहे हैं। उनका विश्वास है कि छोटे-छोटे संकल्पों से ही बड़े परिवर्तन संभव हैं और यही अणुव्रत आंदोलन का मूल संदेश भी है।








