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Thursday, July 9, 2026, 12:46 pm

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Lifestyle

एडवोकेट एनडी निंबावत की काव्य रचनाएं

मन मैला…

मन मैला व साबुन से नहाने लगे हैं
तन को आज इत्र से महकाने लगे हैं

दिखावे में कोई किसी से कम नहीं
देखो क्या है और क्या बताने लगे हैं

सादगी का यहाँ नहीं कोई मुकाबला
अब तो नासमझी पर मुस्कुराने लगे हैं

गमी क्या हुई आज किसी के परिवार में
लोग मगरमच्छी आँसू बहाने लगे हैं

खुद का बोझ खुद को ही उठाना होगा
पांवों पर खड़े होने में जमाने लगे हैं

पता है एक दिन सब छोड़ जाना होगा
फिर भी लोग अपार धन जुटाने लगे हैं

कुछ भी करलो यहाँ लोग समझेंगे नहीं
अपने मन को “सागर” समझाने लगे हैं

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बदलती फितरत…

ये आदमी की बदलती फ़ितरतों का दौर है
मुहब्बत हो रही घायल, नफरतों का दौर है

ईमानदारी न जाने कहाँ गुम हो गई है
नीचे से ऊपर तक अब, रिश्वतों का दौर है

नित नए कानून पर पालना कहाँ होती है
सुसभ्य आदमी के लिए, दिक्कतों का दौर है

कानून तो बेचारा अंधा है शुरू से ही
अब बहरा भी हो गया है, मुसीबतों का दौर है

संसद बन गई अखाड़ा, होते हैं घमासान
नेताओं के लिए तो अब, कसरतों का दौर है

करीब न आएं, हाथ न मिलाएं, मास्क लगाएं
सभी लोग यही कहते, नसीहतों का दौर हैं

घर के बाहर जरा संभल के निकलिये “सागर”
शहर में हो रही मौतें, तुरबतों का दौर है

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मासूम खताएं…

बड़ी मासूम खताएं है मेरे दोस्त की
क्या खूबसूरत अदाएं है मेरे दोस्त की

झुका के ऐसे गर्दन, उठाती है पलकें
कैसी क़ातिल निगाहें है मेरे दोस्त की

ये काले बादल की तरह बिखरती जुल्फें
लुभाती मुस्कुराहटें है मेरे दोस्त की

वादा करके भूल जाने की नादानियाँ
किसी के लिए सजाएं हैं मेरे दोस्त की

इश्क मुहब्बत में दिवाने आशिक के लिए
जाने क्या क्या दुआएं है मेरे दोस्त की

जीने के लिए एक और वजह है “सागर”
ये तड़फाती वफ़ाएं है मेरे दोस्त की
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तरकश में जो तीर है

तेरी आँखों की तरकश में जो तीर है
वो करते हर किसी पर चोट गंभीर है

जिसे भी लगा आँखों की तरकश का तीर
तड़फता, मिलने को हो जाता अधीर है

जब बिखराती हो कभी ये जुल्फ़े अपनी
सँवर जाती इन बादलों की तकदीर है

मुस्कुराकर लूट लेती हो तुम सभी को
चाहे वो गरीब है या बड़ा अमीर है

संगेमरमरी गोरा तन ताजमहल सा
मुहब्बत की एक खूबसूरत तस्वीर है

कैसे न होगा दीवाना तेरा “सागर”
यहाँ तू सभी के ख्वाबों की ताबीर है

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अधूरी सी लगती…

अधूरी सी लगती है ये जिंदगी, कभी कभी
कर जाती है बेवफ़ाई ये खुशी, कभी कभी

यूँ तो मुस्कुराने की बनी वजह कई बार
मगर बेवजह रूठती ये हंसी, कभी कभी

तमन्नाओं का बोझ क्यों रखते हो हर वक्त
मुश्किल से होती सभी ये पूरी, कभी कभी

चाँद तो देता है शीतल चांदनी सभी को
मगर आग लगा देती ये चांदनी, कभी कभी

भागदौड़ की जिंदगी में क्या पाया हमने
महसूस करें फुर्सत की ये कमी, कभी कभी

आँखों मे भी छुपा है एक बहुत बड़ा बाँध
बहती जहाँ आँसुओं की ये नदी, कभी कभी

बड़े चालाक होते हैं खुदगर्ज लोग यहाँ
भारी पड़ती “सागर” ये सादगी, कभी कभी

एडवोकेट एनडी निम्बावत “सागर”
जोधपुर (राज.)

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor