(पूर्व जस्टिस गोपालकृष्ण व्यास प्रकृति और मौसम को अपनी कविताओं में बखूबी रेखांकित करते हैं। यहां प्रस्तुत है सावन महीने पर आधारित उनकी कविता।-संपादक)
सावण सुं आस
बायर चाले सावण में
झिरमिर बरसे मेह,
हरक जगावै हिवड़े में
भीजी सगळी देह।
बाँगा में हिंडा बाँधया
नाचै दादुर मोर
बादलिया गर्जण लागा
बंधी प्रेम री डोर।
काळा काळा बादलिया
बीजलियां चमकावै,
बाट जोवती गोरडी रै
हिवड़े आस जगावै।
पाणी बरसतो देख देख
ढोले री ओल्यू आवै,
आँसू ढलकता नैणा राँ
हिवड़े में पीड जगावै।
किलकारियां बैरी कोयल री
सावण में घणी तड़फावै,
हरी हरी दरखत री डालियां
जीवण री आस जगावै।
करतां करतां उडीक थांरी
नैणा रो पाणी सूखे
रिमझिम देख सावण री
हिवड़े आस जगावै।
हाथ जोड़ अरदास करूँ
सुण शंकर म्हारी बात,
रिमझिम बरसाओ बादलिया
ओ सावण बीतो जाय।
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