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Sunday, August 23, 2026, 1:48 pm

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हिन्दी के विकास में प्रादेशिक भाषाओं का योगदान रहा है : रंगा

राखी पुरोहित. बीकानेर

प्रज्ञालय संस्थान एवं राजस्थानी युवा लेखक संघ द्वारा  नत्थूसर गेट बाहर स्थित लक्ष्मीनारायण रंगा सृजन सदन में एक वैचारिक परिसंवाद ‘हिन्दी के विकास में प्रादेशिक भाषाओं का योगदान’ विषय पर रखा गया।
परिसंवाद की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार कमल रंगा ने कहा कि हिन्दी को समृद्ध बनाने में प्रादेशिक भाषाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिसमें प्रमुख रूप से हिन्दी की आधार भूमि बनाने में राजस्थानी के रासौ साहित्य का योगदान विशेष रहा है। जिसमें भी विशेष रूप से पृथ्वीराज रासौ एवं बीरमदेव रासौ आदि प्रमुख हैं।

इसी तरह राजस्थानी का भक्ति काल भी हिन्दी के विकास में और उसकी समृद्धि में अपना महत्व रखता है। जिसमें खासतौर से मीरां के साहित्य का उल्लेख कर सकते हैं। रंगा ने आगे कहा कि वैसे भी यह भाषा वैज्ञानिक सत्य है कि हर भाषा की समृद्धि प्रादेशिक भाषाओं के सहयोग से ही होती रही है। परिसंवाद में वरिष्ठ शायर जाकिर अदीब ने कहा कि जो भाषा अन्य भाषा के शब्दों को रचा-बसा लेती है, वही समृद्ध होती है। हिन्दी ने भी भारतीय भाषाओं के प्रति यह भाव रखा तभी समृद्ध हुई। इसी क्रम में अपने विचार रखते हुए वरिष्ठ शिक्षाविद संजय सांखला ने कहा कि हिन्दी को समृद्ध करने के लिए राजस्थानी के अलावा मैथिली, ब्रज, अवधि आदि भाषाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कवि गिरिराज पारीक ने कहा कि हिन्दी की चमक में राजस्थानी का महत्वपूर्ण योगदान को नहीं नकारा जा सकता।

शिक्षाविद राजेश रंगा ने कहा कि हिन्दी को समृद्ध करने में विद्यापति, सूरदास, तुलसीदास एवं मीरां आदि के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। तभी तो हम कह सकते हैं कि हिन्दी के विकास में प्रादेशिक भाषाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। परिसंवाद में भवानी सिंह राठौड़, हरिनारायण आचार्य, हेमलता व्यास, सुनील व्यास, श्रीमति इला सहित अनेक गणमान्यों ने अपने विचार रखे। परिसंवाद का संचालन आशीष रंगा ने किया एवं आभार शिक्षाविद महावीर स्वामी ने ज्ञापित किया।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor