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Thursday, July 9, 2026, 8:24 pm

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इस बार समीकरण कांग्रेस के पक्ष में, ऐनवक्त पर भाजपा क्या गुल खिलाएगी कह नहीं सकते

 

राजस्थान जंग : 2023

-राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 इस बार रोचक होंगे। मामला करीबी होगा। निर्णायक जंग में कांग्रेस की वैतरणी पार लग सकती है। इसका एक मात्र कारण अशोक गहलोत की कल्याणकारी योजनाएं और नीतियां हैं। हालांकि राहुल गांधी कहते रहे हैं कि मिलजुलकर चुनाव लड़ेंगे और पहले कोई चेहरा घोषित नहीं करेंगे। लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस वापसी करेगी तो अशोक गहलोत की नीतियों की वजह से। जो कार्य गहलोत ने इन साढ़े चार सालों में किए हैं वे बेमिसाल है। उधर भाजपा को इस जंग में पसीने आ सकते हैं, क्योंकि पार्टी में हर कोई सीएम पद का मुंह धोकर बैठा है। आम आदमी पार्टी का राजस्थान में वजूद नजर नहीं आ रहा। आरएलपी और अन्य पार्टियां कोई चमत्कार दिखाएगी, ऐसा धरातल पर नजर नहीं आ रहा।

राखी पुरोहित. जोधपुर

राजस्थान में विधानसभा जंग 2023 का बिगुल बजने ही वाला है। सभी पार्टियां रण में कूद चुकी है। मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा में ही देखने को मिलेगा। दोनों ही पार्टियों ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं। लेकिन इतना तय है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्य जनता के सामने हैं। इस बार उन्होंने कमाल के दांव खेले हैं। जिसने जो मांगा वो दिया। उनका कहना था कि आप मांगते थम जाओगे और मैं देते नहीं थकूंगा। वही हुआ भी। ऐसे में राजस्थान की जनता के बीच अशोक गहलोत अधिकारपूर्वक आएंगे। उन्होंने राजस्थान की जनता को निराश भी नहीं किया। उधर भाजपा में अंतर्कलह चौड़े नजर आ रही है। हालांकि अंतर्कलह कांग्रेस में भी है, मगर जादूगर अशोक गहलोत उनसे निपट चुके हैं। ऐसे में केवल और केवल गहलोत ही कांग्रेस के सर्वमान्य नेता माने जा सकते हैं। सचिन पायलट के लिए पार्टी कोई दूसरा रास्ता निकाल सकती है।

राजस्थान में बसपा, आरएलपी, कम्युनिस्ट पार्टी, आम आदमी पार्टी कोई खास चमत्कार नहीं कर पाएंगी। अन्य पार्टियां भी अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है। ऐसे में इन पार्टियों के पास एक ही रास्ता बचा है कि कांग्रेस के आस-पास ही रहे। हालांकि आरएलपी के सुप्रीमाे हनुमान बेनीवाल पूरा जोर लगा रहे हैं, मगर ऐनवक्त पर वे कुछ सीटें ही प्रभावित कर पाएंगे, ऐसा माना जा सकता है। मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होगा।

गहलोत की जादूगरी कायम

कुछ भी हो अशोक गहलोत की जादूगरी कायम है। उन्हें राजस्थान में हराना आसान नहीं है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी ओर से पूरा जोर लगा रहे हैं। भाजपा की मुश्किल यह है कि उसमें कार्यकर्ता कम मुख्यमंत्री के उम्मीदवार ज्यादा है जो सभी एक-दूसरे को भीतर ही भीतर पसंद नहीं करते। ऐसे में गहलोत को चुनौती देना अासान नहीं नजर आ रही। गहलोत के सामने समय-समय पर कई संकट आए, मगर हर बार उन्होंने धैर्य, संयम और राजनीतिक चतुराई से अपने को साफ बचा लिया। इसके पीछे उनकी 50 साल की तपस्या भी है। वे पार्टी के पुरौधा है। वे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनियां गांधी तक के खास रहे हैं। हालांकि राहुल गांधी सचिन को पसंद करते हैं, मगर पिछले दिनों का घटनाक्रम सबके सामने हैं जब करीब 90 विधायकों ने गहलोत के पक्ष में इस्तीफे दे दिए थे। इसलिए माना जा सकता है कि गहलोत को अपने पार्टी के भीतर खतरा कम है।

लाल फाइल भी खास असर नहीं डालेगी  

राजेंद्रसिंह गुढ़ा की लाल डायरी भी कोई खास असर नहीं डालेगी। क्योंकि इसके पीछे जनता गुढ़ा के स्वार्थ को भी जानती है। ऐसे मौका परस्त लोगों को जनता भी पसंद नहीं करती और यह स्टंटबाजी और नौटंकी के अलावा कुछ नहीं है। लाल डायरी के राज भलेही कुछ समय तक मीडिया में चर्चा में रहे, लेकिन राजनीति के पंडितों का आकलन माने तो इससे अशोक गहलोत की सेहत पर असर पड़ने वाला नहीं है। खुद गुढ़ा का रोना सुन सुनकर जनता बोर हो चुकी है। वे बोलते ही रोते हुए हैं और अब तक रोना ही रोते आए हैं। उनके नाटकों का जनता जानती है। ऐसे में गहलोत को फिलहाल कोई खतरा नहीं है।

हनुमान बेनीवाल भी सक्रिय, मगर चमत्कार नहीं कर पाएंगे

आरएलपी सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल इन दिनों ज्यादा सक्रिय हैं। वे सरकार को बराबर घेर रहे हैं और साथ ही साथ अपनी मौजूदा सीटों को बचाने के साथ-साथ कुछ और सीटें निकालने का जुगाड़ कर रहे हैं। मगर इस बार उनकी राह आसान नहीं है। वे गरजते ज्यादा है और काम कम करते हैं। उनकी तेजतरार राजनीति ही उनकी पहचान है। बाकी धरातल पर उनका कोई खास वजूद नहीं है।

आम आदमी पार्टी निर्णय नहीं ले पा रही

राजस्थान को लेकर आम आदमी पार्टी निर्णय नहीं ले पा रही है। केजरीवाल खुद अपनी सरकार बचाने में लगे हुए हैं। उनकी अपनी सरकार पर संकट कम नहीं है। ऐसे में राजस्थान में उनके पैर जमते नजर नहीं आ रहे। अभी तक पार्टी की हलचल भी राजस्थान में कम है। अगर आम आदमी पार्टी को राजस्थान में वजूद बनाना था तो साल दो साल पहले से ही राजस्थान में कैंपेन चलाना था, मगर पार्टी अपनी अंतर्कलह से जूझ रही है। पार्टी के नेता जेलों के चक्कर काट रहे हैं तो राजस्थान की नब्ज भी केजरीवाल अभी तक टटोल नहीं पाए हैं। ऐसे में माना जा सकता है कि आम आदमी पार्टी राजस्थान में दो-चार सीट निकाल ले तो भी काफी है। यह भी मुश्किल ही नजर आ रही है।

बसपा-कम्युनिस्ट और अन्य पार्टियां हवाई सपने पाले हुए हैं

इधर राजस्थान में बसपा-कम्युनिस्ट और अन्य पार्टियां हवाई सपने पाले हुए हैं। वे कोई खास प्रभाव छोड़ती नजर नहीं आ रही। राजस्थान की राजनीति अलग हटकर है। यहां इन पार्टियों के लिए खास स्थान नहीं है। फिर भी 5-10 सीटों पर इन पार्टियों को लाभ मिल सकता है। लेकिन ऐसा इस बार होता मुश्किल नजर आ रहा है।

मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा में ही

इस बार मुख्य मुकाबला राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होगा। इसमें भी कांग्रेस का पलड़ा भारी नजर आ रहा है। अगर कांग्रेस में हाथ ने परचम लहराया तो इसकी जीत का सेहरा अशोक गहलोत के सिर ही बंधेगा और फिर से उनकी चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की राह आसान हो जाएगी। उन्हें फिलहाल राजस्थान में कोई खतरा नहीं है। जबकि भाजपा अभी भी अपनी ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा तय नहीं कर पाई है। उनकी नाव तो नरेंद्र मोदी के भरोसे ही है। भाजपा में गजेंद्रसिंह शेखावत, वसुंधरा राजे, ओम जोशी, राजेंद्र राठौड़, सतीश पूनिया, बालक जोगीनाथ, अर्जुनराम मेघवाल और अश्विनी वैष्णव सरीखे नेता मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार है। ऐसे में ये सब आपस में एक-दूसरे को हराने में ही ज्यादा जोर लगाएंगे। ज्यादा दाई जापा बिगाड़ देती है। वही हाल भाजपा का है। उनके पास कार्यकर्ताओं से ज्यादा मुख्यमंत्री के दावेदार नेता है। सभी अपनी ओर से राजस्थान फतेह करने और अपने सिर मुख्यमंत्री का ताज पहनने का सपने पाले हुए हैं। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस स्थिति को अच्छी तरह जानते हैं और यही कारण है कि उनके लिए किसी एक के भरोसे राजस्थान का चुनाव लड़ना मुश्किल नजर आ रहा है। ऐसे में कहा तो यही जा रहा है कि मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा। अगर भाजपा को बहुमत मिलता है तो सर्वमान्य नेता का संकट हो सकता है। अगर कुछ लोगों ने बगावत कर दी तो फिर सरकार कांग्रेस कम सीटें आने के बावजूद बना सकती है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor