राइजिंग भास्कर डॉट कॉम. जैसलमेर
जैसलमेर की पत्रकारिता अधोगति की ओर जा रही है। यहां के पत्रकार पुलिस अधिकारियों, कलेक्टर और भ्रष्ट राजनेताओं के तलवे चाटते हैं। फर्जी एक्रिडिएशन करवाकर प्लाट हथियाना ही उनका एकमात्र लक्ष्य रह गया है। ब्लैकमेलिंग और आपराधिक किस्म के लोग पत्रकारिता में घुस आए हैं। कई पत्रकारों का रिकॉर्ड ही आपराधिक रहा है। एक तरफ यहां के पत्रकार अपनी दुकानदारियां चलाते हैं और दूसरी ओर से थोक के भाव चैनल और अखबार चला रहे हैं। घटिया तेल, साबुन बेचते हैं और पत्रकारिता के दुकान के माध्यम से बीएसएफ और सेना में सामान के सप्लायर के सौदागर बन गए हैं। जिन्हें पत्रकारिता के क ख ग से मतलब नहीं है, वे पत्रकार बन गए हैं ताकि उनका डंडा प्रशासन को आंख दिखाता रहे।
जैसलमेर में समस्याओं का अंत नहीं है। राजनीतिक शून्यता से ग्रस्त जैसलमेर में आजादी के बाद से ही विकास ने कदम पूरी तरह नहीं बढ़ाए। एक ही राजनीतिक दल की चाटुकारिता करने वाले पत्रकारों को जैसलमेर के हितों से कोई लेना देना नहीं है। कोई कोल्ड ड्रिंक्स की एजेंसी चला रहा है, तो कोई किराणा की एजेंसी। दुकानदारी की आड में पत्रकारिता की दुकानदारियां भी चल रही है। जो वर्षों से पत्रकारिता कर रहे हैं उनके एक्रिडिएशन हो नहीं रहे हैं और कल के कुकुरमुत्ते की तरह उगे पत्रकार अपना एक्रिडिशन करवा रहे हैं। यह जैसलमेर का दुर्भाग्य है कि यहां पर प्रशासन की जै जैवंती गाने वाले पत्रकार ज्यादा है। आपराधिक तत्वों का बखान करने वाले पत्रकार अपने कर्तव्यों से भटक गए हैं। पत्रकारों ने पत्रकारिता की आड में आलीशान बिल्डिंगे बना दी है और दुकानों का विस्तार कर दिया है, मगर आयकर विभाग भी इन पत्रकारों पर हाथ डालने से डरता है। क्योंकि आयकर विभाग खुद ही भ्रष्ट है।
जैसलमेर में गली-गली में पत्रकार बन गए हैं। अधकचरे पत्रकार जिनको लिखना ही नहीं आता और वे भी अपनी पत्रकारिता की जाजम जमा रहे हैं। आए दिन सोशल मीडिया पर प्रशासन और राजनेताओं के जयकारे लगाने वाले पत्रकारों का एक मात्र लक्ष्य पैसे कमाना रह गया है। कई लोगों के तो अखबारों का ही पता नहीं है। कई पत्रकार दैनिक अखबार चलाते हैं मगर फर्जी तरीके से कब दैनिक करवा लिए पता ही नहीं। कभी अखबारों के अंक रैगुलर निकलने ही नहीं और अखबार दैनिक करवा लिए। इसका एक मात्र उद्देश्य विज्ञापन कमाना और पूंजी बढ़ाना रह गया है। अखबारों का जहां से रजिस्ट्रेशन होता है वहां भी भ्रष्ट लोग बैठे हैं जो बिना जांच पड़ताल किए दैनिक अखबारों का रजिस्ट्रेशन कर देते हैं। जो जैन्यून कैस होते हैं उनका टाइटिल तक नहीं आता। जैसलमेर में आठवीं दसवीं पास लोग साप्ताहिक अखबारों का न केवल टाइटिल लेकर आ गए हैं, वरन धड़ल्ले से चला भी रहे हैं, जबकि जोधपुर जैसे शहर में एक अखबार के टाइटिल के लिए पुलिस वैरिफिकेशन, सीआईडी वैरिफिकेशन और कमिश्नरेट से फाइल जाती है। जोधपुर में एक अखबार के टाइटिल के लिए ग्रेजुएशन की डिग्री आवश्यक मांगी जाती है, जबकि जैसलमेर में कई लोग ऐसे हैं जिनके पास स्नातक की डिग्री ही नहीं है, लेकिन अखबार का टाइटिल स्वीकृत करवा लिया और अखबार निकल भी रहे हैं। अखबारों के टाइटिल के लिए यह अलग-अलग मापदंड न केवल सरकार की निर्लजता वरना प्रशासनिक अधिकारियों की मनमर्जी भी दर्शाती है।
जैसलमेर में एक पत्रकार तो ऐसा है जिसने कुछ साल पहले पाक्षिक अखबार निकाला। कुछ अंक निकाले फिर बंद कर दिया। बाद में नए सिरे से कुछ अंक निकाले। फिर कई वर्षों तक अखबार नहीं निकला। अब वह दैनिक अखबार चला रहा है। रैगुलर अंक निकलते ही नहीं है। त्योहारों और अवसरों पर विज्ञापन कबाड़ने के लिए अखबार छपता है और फिर शांति धर कर पत्रकार बैठ जाता है। जोधपुर में भी ऐसे कई पत्रकार हैं जिनके अखबारों का पता नहीं है और पत्रकारिता की दुकानदारी चल रही है।


