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भारत भूमि तपो भूमि है । यहां देवता भी जन्म लेने को सदैव लालायित रहते हैं, क्योंकि यहां के मनुष्यों ने अपने त्याग में एवं तपोमय जीवन के द्वारा जो ज्ञाननिधि अर्जित की, वह ज्ञाननिधि आज हमारे लिए एक महान विरासत है। वह ज्ञान संस्कृत के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ। वेद, वेदांग उपवेद, उपनिषद् ,साहित्य निरंतर मनुर्भव इस उक्ति को क्रियान्वित करने में तत्पर हैं और इसी क्रियान्विति ने इस भारत भूमि से निरंतर दिव्य व्यक्तित्व शेष विश्व को प्रदान किये और भारत ने इन्हीं दिव्य मनुष्यों के द्वारा विश्व गुरुत्व की पदवी को प्राप्त किया। यह उन आचरणों का प्रभाव है कि इतने कठिन समय के आने के बावजूद भी भारतीयता कभी हमसे कभी दूर नहीं हुई ।ज्ञान के प्रति हमारी साधना निरंतर चलती आ रही है और यह साधना संस्कृत रूपी श्रेष्ठ माध्यम से अभिव्यक्त हुई । संस्कृत के अध्ययन की अपनी प्रणाली है। संस्कृत भाषा अपने आप में अनेक विशेषताओं को समेटे हुए हैं क्योंकि यहां पर एक शब्द के अनेक पर्यायवाची है। यह भाषा उच्चारण के प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक नियमों का अनुपालन करती है। यह भाषा हमको श्रेष्ठ विचार प्रदान करती है, इसलिए हमें अपने व्यस्ततम जीवन में से कुछ समय निकाल करके नियमित रूप से संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए तभी हम अपनी भारतीयता को अक्षुण्ण रख पाएंगे । यह वक्तव्य डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय में आयोजित संस्कृत दिवस समारोह के उपलक्ष में संस्कृत विभाग ,जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर सत्य प्रकाश दुबे ने अपने उद्बोधन में दिया। डॉo सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय में संस्कृत दिवस के उपलक्ष में साप्ताहिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत आज प्रथम कार्यक्रम संस्कृत भाषा के महत्त्व पर एक व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विद्यार्थियों को उद्बोधन देते हुए प्राचार्य प्रोo महेंद्र शर्मा ने कहा कि संस्कृत ही वह माध्यम है जिसके द्वारा आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में निहित ज्ञान पर नवीन शोध किए जा सकते हैं तथा हमारे ऋषि मुनियों ने जो रहस्य प्रतिपादित किये, उनका वास्तविक ज्ञान हो सकता है ।कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए विश्वविद्यालय के शोध अधिष्ठाता प्रोo प्रेम प्रकाश व्यास ने बताया कि संस्कृत का अध्ययन उनके आयुर्वेद के क्षेत्र में शोध करने हेतु सदैव उपयोगी रहा है ।आयुर्वेद में शोध की अपार संभावनाएं हैं परंतु उसके लिए संस्कृत का ज्ञान अपेक्षित है ।कार्यक्रम के प्रारंभ में सहायक आचार्य डॉo निकिता पवार ने धनवंतरि वंदना प्रस्तुत की। कार्यक्रम संयोजिका एसोसिएट प्रोफेसर डॉo मोनिका वर्मा द्वारा स्वागत भाषण दिया गया। कार्यक्रम का संचालन सहायक प्रोफेसर डॉo संकल्प शर्मा ने किया। इस अवसर पर डॉo हरीश सिंहल, डॉo चंद्रभान शर्मा ,डाo हेमन्त राजपुरोहित, सतीश ठाकुर, डॉo प्रेम कुमावत, डॉo राजीव सोनी सहित अनेक संकाय सदस्य तथा छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।




