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Thursday, July 9, 2026, 11:09 pm

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महिला स्वास्थ्य के प्रति कितनी सचेत हैं आप?

किशोर अवस्था में बदलाव से लेकर गर्भवती महिलाओं और बच्चा होने के बाद और बुजुर्ग… नारी अपने स्वास्थ्य को लेकर कितनी सजग है… प्रस्तुत है विवेचन

राखी पुरोहित. जोधपुर

स्वास्थ्य न केवल रोगों की अनुपस्थिति है, बल्कि यह एक ऐसा समग्र अनुभव है जिसमें शारीरिक, मानसिक, और सामाजिक कल्याण शामिल होता है। जब बात महिलाओं के स्वास्थ्य की होती है, तो यह विषय और भी व्यापक और जटिल हो जाता है क्योंकि इसमें मासिक धर्म, प्रजनन क्षमता, गर्भावस्था, रजोनिवृत्ति, हार्मोनल परिवर्तन, और सामाजिक व सांस्कृतिक प्रतिबंध जैसी अनेक परतें जुड़ी होती हैं।

आज हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि महिलाएं स्वास्थ्य के प्रति कितनी सजग हैं, क्या हमारी सामाजिक व्यवस्थाएं उन्हें पर्याप्त जागरूकता और सुविधा देती हैं, और हमें बतौर समाज किन मोर्चों पर सुधार करना चाहिए।

1. महिला स्वास्थ्य की परिभाषा

महिला स्वास्थ्य केवल गर्भधारण और प्रसव तक सीमित नहीं है। इसमें मासिक धर्म की नियमितता, पोषण की स्थिति, मानसिक स्वास्थ्य, यौन एवं प्रजनन अधिकार, हड्डियों की मजबूती, हार्मोनल संतुलन, कैंसर की रोकथाम (जैसे स्तन व गर्भाशय कैंसर), और वृद्धावस्था में स्वास्थ्य प्रबंधन जैसे विषय शामिल होते हैं।

2. किशोरावस्था में स्वास्थ्य चेतना

A. मासिक धर्म और जागरूकता

भारत में आज भी मासिक धर्म एक वर्जित विषय है। लड़कियों को स्कूल में, घर में, और समाज में इस विषय पर खुलकर बात करने की छूट नहीं होती। नतीजतन, वे मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता के नियमों का पालन नहीं कर पातीं, जिससे संक्रमण और अन्य रोगों का खतरा बढ़ता है।

B. पोषण की कमी

किशोर लड़कियों में खून की कमी (एनीमिया) एक आम समस्या है। WHO के अनुसार, भारत में लगभग 55% किशोर लड़कियां एनीमिया से पीड़ित हैं। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई, मानसिक विकास और भविष्य की प्रजनन क्षमता पर पड़ता है।

3. युवावस्था और प्रजनन स्वास्थ्य

A. गर्भनिरोध और यौन शिक्षा

अक्सर युवा महिलाएं गर्भनिरोध के विकल्पों, यौन संचारित रोगों (STDs), और परिवार नियोजन के तरीकों के बारे में जानकारी से वंचित होती हैं। कई जगहों पर उन्हें यह भी नहीं पता होता कि मासिक धर्म का मतलब क्या है और गर्भधारण कैसे होता है।

B. गर्भावस्था और प्रसव

भारत में हर वर्ष हजारों महिलाएं प्रसव के दौरान उचित चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में जान गंवा देती हैं। प्रसवपूर्व और प्रसवोत्तर देखभाल (Antenatal and Postnatal Care) का अभाव महिलाओं के लिए जानलेवा हो सकता है।

4. मध्यवय में स्वास्थ्य की चुनौतियाँ

A. रजोनिवृत्ति (Menopause)

40-50 वर्ष की आयु के बीच अधिकतर महिलाएं रजोनिवृत्ति के दौर से गुजरती हैं। इस समय हार्मोनल असंतुलन, हड्डियों की कमजोरी, मानसिक चिड़चिड़ापन, और अनिद्रा जैसी समस्याएं होती हैं। दुर्भाग्यवश, इस अवस्था में महिलाओं की स्वास्थ्य जरूरतों पर कम ध्यान दिया जाता है।

B. स्तन और गर्भाशय कैंसर

स्तन कैंसर भारत में महिलाओं में सबसे सामान्य कैंसर बन चुका है। समय पर स्क्रीनिंग और जांच के अभाव में यह घातक हो सकता है। बहुत सी महिलाएं ‘मैमोग्राफी’ या ‘पैप स्मीयर टेस्ट’ जैसे शब्दों से भी परिचित नहीं होतीं।

5. वृद्धावस्था में महिला स्वास्थ्य

बुजुर्ग महिलाओं को अक्सर ‘अदृश्य’ मान लिया जाता है — घर में भी और स्वास्थ्य व्यवस्था में भी। उन्हें हड्डियों की कमजोरी (ऑस्टियोपोरोसिस), गठिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, और अकेलेपन जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है।

उचित देखभाल और सामाजिक सम्मान की कमी के कारण बुजुर्ग महिलाएं मानसिक और शारीरिक रूप से अवसाद में डूब जाती हैं।

6. मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक चेतना

महिलाएं जीवन भर विभिन्न मानसिक दबावों का सामना करती हैं:

किशोरावस्था में शारीरिक बदलाव और सामाजिक बंधन

विवाह और ससुराल की अपेक्षाएं

मातृत्व की जिम्मेदारी

कार्यस्थल पर भेदभाव

वृद्धावस्था में उपेक्षा

इन सभी दबावों के बावजूद, मानसिक स्वास्थ्य को लेकर महिलाओं में जागरूकता बेहद कम है। भारत में महिला अवसाद पीड़ितों की संख्या पुरुषों से कहीं अधिक है।

7. सामाजिक व सांस्कृतिक बाधाएं

A पर्दा, शर्म और स्वास्थ्य

अनेक ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में महिलाएं केवल इसलिए डॉक्टर के पास नहीं जातीं क्योंकि उन्हें ‘शर्म आती है’। पुरुष डॉक्टर से बात करना वर्जित माना जाता है, और महिला डॉक्टरों की संख्या कम होती है। इसके अलावा, कई बार घर के पुरुष सदस्य अनुमति नहीं देते।

B. घरेलू हिंसा

WHO की रिपोर्ट के अनुसार, हर तीन में से एक महिला जीवन में कभी न कभी घरेलू हिंसा का शिकार होती है। यह शारीरिक के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। अधिकांश महिलाएं इसे ‘नियति’ मानकर चुपचाप सहन करती हैं।

8. शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता का संबंध

महिला शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता, स्वास्थ्य चेतना से सीधा संबंध रखते हैं। पढ़ी-लिखी और स्वावलंबी महिलाएं न केवल अपनी सेहत को प्राथमिकता देती हैं, बल्कि परिवार के स्वास्थ्य के प्रति भी अधिक जागरूक होती हैं।

स्वास्थ्य बीमा, नियमित जांच, पौष्टिक आहार, और स्वस्थ दिनचर्या अपनाने की प्रवृत्ति पढ़ी-लिखी महिलाओं में अधिक देखी जाती है।

9. सरकार और समाज की भूमिका

A. सरकारी योजनाएं

भारत सरकार ने महिलाओं के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं:

जननी सुरक्षा योजना

आयुष्मान भारत योजना

POSHAN अभियान

Ujjwala Yojana (स्वास्थ्यकारी ईंधन)

हालांकि, इन योजनाओं का लाभ सभी महिलाओं तक नहीं पहुंच पाता, खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में।

B. जागरूकता अभियान

सरकारी व गैर-सरकारी संगठनों द्वारा स्वास्थ्य शिविर, जागरूकता रैलियाँ, और स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम चलाए जाते हैं। परंतु अभी भी यह प्रयास समावेशी और निरंतर नहीं हैं।

10. आप स्वयं क्या कर सकते हैं?

A. व्यक्तिगत स्तर पर

महिलाओं से जुड़े स्वास्थ्य विषयों पर बात करें।

अपनी बहन, मां, पत्नी, बेटी को नियमित जांच कराने के लिए प्रेरित करें।

पोषणयुक्त आहार और व्यायाम को प्राथमिकता दें।

मानसिक स्वास्थ्य पर भी उतना ही ध्यान दें जितना शारीरिक पर।

B. सामूहिक स्तर पर

महिलाओं के लिए स्वास्थ्य शिक्षा शिविर आयोजित करें।

ग्रामीण महिलाओं को मुफ्त सैनेटरी नैपकिन, आयरन की गोलियाँ, और परामर्श दें।

लड़कियों के लिए स्कूल में यौन शिक्षा अनिवार्य बनाएं।

सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने के लिए संवाद प्रारंभ करें।

महिला स्वास्थ्य केवल महिला का नहीं, पूरे समाज का विषय है। एक स्वस्थ महिला एक स्वस्थ पीढ़ी की जननी होती है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता केवल डॉक्टर और सरकार की जिम्मेदारी नहीं — यह हम सबका दायित्व है।

तो, अगली बार जब आप अपनी मां को अनदेखी बीमारी के बावजूद रसोई में काम करते देखें, अपनी बहन को मासिक धर्म की बात पर चुप होते देखें, या अपनी बेटी को अपने शरीर से असहज होते देखें — तो सोचिए, क्या आप महिला स्वास्थ्य के प्रति सचेत हैं?

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor