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Thursday, July 9, 2026, 11:13 pm

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विश्व संगीत दिवस पर विशेष आलेख: “महाराजा मान सिंह और जोधपुर की सुरमयी धरोहर”

विश्व संगीत दिवस पर जोधपुर के महान राजपरिवार को समर्पित

डी के पुरोहित. जोधपुर

संगीत वह अमूर्त अनुभूति है जो न जाति देखती है, न भाषा, न धर्म और न ही सीमाएँ। यह हृदय से निकलती है और सीधे आत्मा को स्पर्श करती है। 21 जून को ‘विश्व संगीत दिवस’ (World Music Day) इसी सार्वभौमिक भाषा का उत्सव है — एक ऐसा दिन जब दुनिया संगीत की विविध शैलियों, कलाकारों और परंपराओं का सम्मान करती है।

भारत में इसकी जड़ें प्राचीनतम सभ्यता से जुड़ी हैं। इस दिन का स्मरण करते हुए राजस्थान के जोधपुर राज्य के महान शासक महाराजा मान सिंह को याद करना न केवल ऐतिहासिक रूप से उचित है, बल्कि संगीत-संस्कृति के लिए प्रेरणास्पद भी है। वे एक दूरदर्शी शासक, विद्वान, और संगीत के मर्मज्ञ संरक्षक थे।


महाराजा मान सिंह: एक संगीतप्रेमी राजा की गाथा

महाराजा मान सिंह  जोधपुर रियासत के उन विशिष्ट शासकों में से थे जिन्होंने केवल प्रशासनिक कुशलता नहीं दिखाई, बल्कि कला, संस्कृति और विशेष रूप से संगीत के संरक्षण में अमूल्य योगदान दिया।

● संगीत के प्रति उनका व्यक्तिगत झुकाव:

महाराजा मान सिंह केवल संगीत संरक्षक ही नहीं, बल्कि स्वयं भी संगीत के पारखी और रसिक थे। वे ध्रुपद, ख्याल और मारवाड़ी राग-रागनियों के मर्मज्ञ माने जाते थे। उन्होंने अपने दरबार में देश भर से प्रतिभावान संगीतज्ञों को आमंत्रित किया और उन्हें सम्मान एवं संरक्षण प्रदान किया।


नाथ संप्रदाय और महाराजा मान सिंह का संगीत-सम्बंध

जोधपुर राज्य में नाथ संप्रदाय एक पुरानी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा रही है। इस संप्रदाय के संत संगीत, योग और तंत्र के माध्यम से साधना करते थे। महाराजा मान सिंह ने नाथ योगियों के संगीत अभ्यास को राजाश्रय प्रदान किया।

● नाथ संप्रदाय का संगीत:

नाथ संप्रदाय के संत ‘एकतारा’, ‘रावणहत्था’, ‘डमरू’ जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ भक्ति, ज्ञान और योग पर आधारित गीत गाते थे। इनके भजन केवल साधना नहीं, बल्कि लोक शिक्षा का माध्यम थे।

● संरक्षकता का स्वरूप:
  • महाराजा मान सिंह ने नाथ संप्रदाय के प्रमुख गायक-संतों को राजकीय सम्मान, भूमि और आश्रम निर्माण हेतु सहायता प्रदान की।
  • जोधपुर के कई मंदिरों और अखाड़ों में संगीत को आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में स्थापित किया गया।

मारवाड़ शैली और संगीत का नवोन्मेष

महाराजा मान सिंह के शासनकाल में मारवाड़ की शास्त्रीय और लोकसंगीत परंपराओं में अद्वितीय समन्वय देखने को मिला। उन्होंने लोक रचनाओं को दरबारी संगीत से जोड़ने का साहसिक कार्य किया।

● लोक और शास्त्रीय का समन्वय:
  • मांगणियारों और लंगाओं को दरबार में आमंत्रित कर उनकी लोकशैली को सम्मान दिया।
  • पारंपरिक राजस्थानी राग जैसे ‘मांड’, ‘मारू बिहाग’, ‘राजस्थानी तिलक’ को नए आयाम मिले।
● दरबारी संगीत का विस्तार:
  • मान सिंह के दरबार में पखावज, वीणा, सारंगी, सितार, तबला जैसे वाद्ययंत्रों की संगत में नियमित गायन हुआ करता था।
  • दिल्ली, बनारस और जयपुर से आए संगीतज्ञों ने जोधपुर दरबार को संगीत का एक समृद्ध केंद्र बना दिया।

संगीत को लेकर दृष्टिकोण: साधना, शिक्षा और संरचना
● संगीत को आध्यात्मिक मार्ग के रूप में देखना:

महाराजा मान सिंह ने संगीत को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मिक उत्थान और ध्यान का माध्यम माना। उनके निजी कक्षों में नियमित रूप से रात्रि समय संगीत सत्र हुआ करते थे।

● संगीत शिक्षा का विकास:
  • उन्होंने राज्य में संगीत विद्या के औपचारिक शिक्षण की नींव रखी।
  • कई मंदिरों और संस्थानों में गुरु-शिष्य परंपरा के तहत संगीत प्रशिक्षण केंद्र स्थापित हुए।

मान सिंह का सांस्कृतिक नेतृत्व और जोधपुर का संगीत उत्थान

मान सिंह के कार्यकाल को जोधपुर में ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण का स्वर्णयुग’ कहा जा सकता है। संगीत और कला को उनका दिया संरक्षण आज भी अमिट है।

● मारवाड़ संगीत महोत्सव की नींव:

हालांकि औपचारिक रूप से आधुनिक ‘मारवाड़ संगीत महोत्सव’ स्वतंत्रता के बाद शुरू हुआ, परन्तु इसकी सांस्कृतिक भावना की जड़ें मान सिंह के दरबार में मिलती हैं, जहाँ वर्षभर संगीत उत्सव, वाद्य-संगीत प्रतियोगिताएँ और रागों का प्रस्तुतीकरण होता था।


संगीत और समाज: लोक कलाकारों को पहचान

महाराजा मान सिंह के शासन में निम्न समुदायों से आए कलाकारों को भी विशेष मान्यता मिली:

समुदाय प्रमुख वाद्य शैली
मांगणियार खमायचा, डफ सूफी और लोक
लंगा सारंगी, मंजीरा लोक भजन और शृंगार गीत
नाथ संप्रदाय रावणहत्था, डमरू योग-संगीत और भक्ति

इन समुदायों को मान सिंह ने केवल संरक्षण ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें सामाजिक सम्मान भी दिलाया।


विश्व संगीत दिवस की प्रासंगिकता और महाराजा मान सिंह की प्रेरणा

आज के डिजिटल युग में जहाँ संगीत मुख्यतः मनोरंजन बन गया है, वहां महाराजा मान सिंह का दृष्टिकोण प्रेरणास्पद है, जिन्होंने इसे जीवन-दर्शन, आध्यात्मिकता और लोक-जागरूकता का माध्यम माना।

विश्व संगीत दिवस पर यह स्मरण जरूरी है कि:
  • संगीत केवल श्रवण का नहीं, संवेदना का माध्यम है।
  • संगीत कला ही नहीं, संस्कृति का वाहक है।
  • संगीत में विविधता है, परंतु वह एकता का सूत्र भी बनता है।

संगीत-सम्राटों की धरोहर को संभालें

आज जब हम विश्व संगीत दिवस मना रहे हैं, तो हमें महाराजा मान सिंह जैसे शासकों की दृष्टि और योगदान को याद करना चाहिए, जिन्होंने संगीत को केवल दरबार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि आमजन की आत्मा से जोड़ा

उनकी प्रेरणा से हम यह सीख सकते हैं:

कलाकारों को संरक्षण दीजिए
संगीत को शिक्षा का हिस्सा बनाइए
लोकसंगीत और शास्त्रीय संगीत में संतुलन लाइए
संस्कृति को बाजार नहीं, मानवता से जोड़िए

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor