नरेंद्र मोदी आज के चाणक्य हैं, उनमें श्री कृष्ण की तरह कौशल और कूटनीति है वे ही भारत की नौका के खेवनहार हैं, उनके हाथों में भारत सुरक्षित है, आज वे ही भारतीय जनता पार्टी हैं…
डी के पुरोहित. नई दिल्ली
भारतीय राजनीति का इतिहास विविध विचारधाराओं, आंदोलनों और दलों से समृद्ध रहा है। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस का प्रभुत्व अनेक दशकों तक रहा, परंतु इसके समानांतर एक विचारधारा का उद्भव हुआ जो भारत की सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रवादी भावनाओं को मुखर करता था। यह विचारधारा थी—जनसंघ की, जिसे बाद में जनता पार्टी और फिर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रूप में नवजीवन मिला। 1951 से लेकर 2025 तक की यात्रा में इस दल ने न केवल स्वयं को सशक्त किया, बल्कि भारत की राजनीति, नीति-निर्माण और वैश्विक पहचान को भी एक नया आयाम दिया। इस यात्रा के प्रमुख पथप्रदर्शक रहे अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और अंततः नरेंद्र मोदी।
1. जनसंघ की स्थापना और प्रारंभिक वर्ष (1951–1977)
1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। इसका उद्देश्य था भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद, और अखंड भारत के विचार को केंद्र में रखते हुए एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच प्रदान करना। प्रारंभ में यह दल सीमित क्षेत्रों तक सीमित था, विशेषकर उत्तर भारत में, परंतु इसकी वैचारिक स्पष्टता और संगठनात्मक मजबूती ने इसे धीरे-धीरे विस्तार दिया।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विचारधारा स्पष्ट थी: “एक देश, एक विधान, एक निशान”। उन्होंने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 का विरोध करते हुए बलिदान दिया। यह बलिदान जनसंघ की आत्मा बन गया और वर्षों तक इसकी वैचारिक नींव बना रहा।
आगे चलकर बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने इसे गति दी। वाजपेयी की उदार राष्ट्रवादी छवि और आडवाणी की संगठन क्षमता ने जनसंघ को एक ठोस वैकल्पिक शक्ति के रूप में खड़ा करना शुरू किया।
2. जनता पार्टी और आपातकाल के बाद की राजनीति (1977–1980)
1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल ने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिए। इस अवधि में समूचा विपक्ष एकजुट हुआ और 1977 में “जनता पार्टी” के रूप में कांग्रेस के विरुद्ध एकजुट होकर चुनाव लड़ा। जनसंघ इसमें एक महत्वपूर्ण घटक था। इस चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
जनता पार्टी सरकार में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, और वाजपेयी विदेश मंत्री। हालांकि विचारधारात्मक मतभेदों और संगठनात्मक कमजोरियों के कारण यह सरकार अधिक समय तक नहीं चल सकी। 1980 में जनता पार्टी से अलग होकर जनसंघ के नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) की स्थापना की।
3. भारतीय जनता पार्टी का गठन और प्रारंभिक संघर्ष (1980–1990)
1980 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा का गठन हुआ। शुरू में भाजपा ने “गांधीवादी समाजवाद” की नीति अपनाई, जिससे उसके पारंपरिक समर्थकों में भ्रम पैदा हुआ। 1984 के आम चुनाव में भाजपा को केवल 2 सीटें मिलीं।
इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी ने नेतृत्व संभाला और पार्टी को वैचारिक रूप से पुनः जनसंघ की मूल विचारधारा—हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद—की ओर लौटाया। राम जन्मभूमि आंदोलन (अयोध्या) ने पार्टी को जन समर्थन दिलाया और भाजपा तेजी से राष्ट्रीय राजनीति में उभरी। 1991 में भाजपा संसद में मुख्य विपक्षी दल बन गई।
4. सत्ता का स्वाद और अटल युग (1996–2004)
1996 में भाजपा पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, परंतु उनकी सरकार 13 दिन में गिर गई।
उन्होंने प्रधानमंत्री का पद तीन बार संभाला है, वे पहले 13 दिन के लिए 16 मई 1996 से 1 जून 1996 तक। फिर लगातार 2 साशन; 8 महीने के लिए 19 मार्च 1998 से 13 अक्टूबर 1999 और फिर वापस 13 अक्टूबर 1999 से 22 मई 2004 तक भारत के प्रधानमन्त्री रहे। वे हिन्दी कवि, पत्रकार व एक प्रखर वक्ता थे।
वाजपेयी का कार्यकाल भारतीय राजनीति के लिए स्वर्ण युग के समान था। पोखरण परमाणु परीक्षण, कारगिल युद्ध में विजय, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, और पाकिस्तान के साथ “लाहौर बस यात्रा”—इन सबने भारत की छवि को मजबूती दी। उनके नेतृत्व में भाजपा एक उदार राष्ट्रवादी और विकासोन्मुख दल के रूप में उभरी।
5. संघर्ष का काल और पुनरुत्थान (2004–2014)
2004 के आम चुनावों में अप्रत्याशित रूप से भाजपा की हार हुई और कांग्रेस सत्ता में आई। 2009 में भी भाजपा पराजित हुई। इस काल को भाजपा के लिए आत्ममंथन का समय कहा जा सकता है। संगठन में आंतरिक मंथन हुआ, नेतृत्व परिवर्तन हुए, और जमीनी स्तर पर कार्य किया गया।
इस काल में नरेंद्र मोदी, जो 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रभावशाली नेता के रूप में उभरे। 2002 के गुजरात दंगों के कारण आलोचना झेलने के बावजूद, उन्होंने गुजरात में आर्थिक विकास, औद्योगीकरण और प्रशासनिक दक्षता का एक मॉडल प्रस्तुत किया, जिसे “गुजरात मॉडल” कहा गया।
6. नरेंद्र मोदी का उदय और भाजपा का स्वर्ण काल (2014–2024)
2014 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। उन्होंने एक व्यापक और आक्रामक चुनाव प्रचार अभियान चलाया, जिसमें “अच्छे दिन”, “सबका साथ, सबका विकास” और “विकासवाद” प्रमुख नारे बने। परिणामस्वरूप भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने।
मोदी का नेतृत्व निर्णायक, रणनीतिक और जनभावनाओं से जुड़ा हुआ रहा है। उन्होंने आर्थिक सुधार, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत, उज्ज्वला योजना, जन-धन योजना, और GST जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए। विदेश नीति में भी उन्होंने भारत को वैश्विक मंच पर सशक्त किया।
2019 में पुलवामा हमले के बाद बालाकोट एयरस्ट्राइक, और अनुच्छेद 370 को हटाने जैसे निर्णयों ने उनकी राष्ट्रवादी छवि को और प्रबल किया। 2020 के बाद कोविड-19 महामारी में सरकार की भूमिका, टीकाकरण अभियान, और आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम भी चर्चा में रहे।
7. मोदी युग: एक नया भारत, एक नई पहचान
नरेंद्र मोदी को एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जिनमें श्रीकृष्ण की नीति, कौशल और चाणक्य की दूरदर्शिता है। वे न केवल राजनीतिक रणभूमि के महारथी हैं, बल्कि जनभावनाओं को पढ़ने और उसे संगठित करने की विलक्षण क्षमता भी रखते हैं। उनके शासन में भारत न केवल आर्थिक रूप से सशक्त हुआ है, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैश्विक पहचान भी मजबूत हुई है।
आधुनिक चाणक्य और रणनीतिक कौशल
मोदी की रणनीतिक क्षमता को देश और विदेश में स्वीकार किया गया है। चाहे वह चुनावी प्रबंधन हो या कूटनीतिक वार्ताएं, वे हर कदम पर लक्ष्य के प्रति स्पष्ट रहते हैं। उनके राजनीतिक अभियान रणनीति, समयबद्धता और जन-संवाद पर आधारित होते हैं।
उनकी शैली में एक तरफ श्रीकृष्ण की नीतिकुशलता है—जनता के हृदय को छूने वाली भाषा, और दूसरी ओर चाणक्य जैसी रणनीति—सुनियोजित निर्णय, दीर्घकालिक सोच और परिणामों का संपूर्ण आंकलन।
8. भाजपा का वर्तमान और भविष्य
2024 में तीसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटना भाजपा के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि रही। यह केवल एक व्यक्ति की लोकप्रियता नहीं, बल्कि एक संगठनात्मक और वैचारिक विजय थी। आज भाजपा केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक आंदोलन बन चुका है जो भारत के हर कोने में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है।
भविष्य में भाजपा के समक्ष कई चुनौतियाँ भी होंगी—आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, जलवायु संकट, और सामाजिक समरसता बनाए रखना। परंतु नरेंद्र मोदी की नेतृत्व क्षमता, भाजपा का संगठनात्मक बल, और जनता का विश्वास इसे इन चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है।
मोदी का जवाब खुद मोदी है
1951 में जनसंघ की स्थापना से लेकर 2025 में भाजपा के वैश्विक राजनीतिक मंच पर प्रभावशाली उपस्थिति तक की यात्रा अद्वितीय है। यह यात्रा केवल एक दल की नहीं, एक विचारधारा की भी है जिसने भारत के आत्मबोध, सांस्कृतिक गरिमा और विकास की परिभाषा को नया आयाम दिया है।
नरेंद्र मोदी आज केवल प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि एक विचार, एक प्रेरणा और एक युगदृष्टा बन चुके हैं। उनके नेतृत्व में भारत आत्मनिर्भरता, सशक्तिकरण और वैश्विक संवाद के नए चरण में प्रवेश कर चुका है।
यदि अटल बिहारी वाजपेयी ने भाजपा को राजनीतिक वैधता दी और लालकृष्ण आडवाणी ने वैचारिक आधार को मजबूत किया, तो नरेंद्र मोदी ने इसे वैश्विक शक्ति और जन-आस्था में परिवर्तित किया। उनका नेतृत्व भारत के लिए न केवल राजनीतिक सुरक्षा है, बल्कि सांस्कृतिक और वैश्विक पुनर्जागरण का प्रतीक भी है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor












