लघुता में रहकर गुरुता को नमन करने की तैयारियां शुरू
विभिन्न शहरों से टीम राइजिंग भास्कर
गुरु पूर्णिमा, जिसे व्यास पूर्णिमा और वेद पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय संस्कृति का एक दिव्य पर्व है। यह पर्व हर वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को बड़े ही श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया जाता है। इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 10 जुलाई को मनाई जाएगी। यह दिन न केवल शास्त्रीय ज्ञान की परंपरा को याद करने का अवसर है, बल्कि यह जीवन में गुरु के महत्व को समझने और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पावन क्षण भी है।
गुरु: केवल शिक्षक नहीं, साक्षात ब्रह्म स्वरूप
हिंदू दर्शन में गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। कहा गया है—
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
गुरु को त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश का साक्षात स्वरूप माना गया है। यह केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक अर्थों से परिपूर्ण भाव है। गुरु न केवल शिक्षा देते हैं, वे शिष्य के जीवन का अंधकार मिटाकर उसमें ज्ञान का प्रकाश भरते हैं।
क्यों कहते हैं इसे ‘व्यास पूर्णिमा’?
गुरु पूर्णिमा को ‘व्यास पूर्णिमा’ के रूप में मनाने के पीछे का कारण है कि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। वेदव्यास ने चारों वेदों का संकलन कर उन्हें व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया, महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना की और अठारह पुराणों की स्थापना की। उन्होंने वेदों को मानव समाज के लिए सुलभ बनाया, जिससे ज्ञान की अलौकिक धारा सब तक पहुँच सकी।
इसीलिए गुरु पूर्णिमा को ‘वेद पूर्णिमा’ भी कहा जाता है — वेदों के प्रकटीकरण का दिन।
देव, दानव और मानव: तीनों के लिए गुरु अनिवार्य
भारतीय ग्रंथों में देवताओं से लेकर दानवों तक के जीवन में गुरु के महत्व को दर्शाया गया है।
- देवताओं के गुरु बृहस्पति थे, जो उन्हें नीति, धर्म और ब्रह्मज्ञान की शिक्षा देते थे।
- दानवों के गुरु शुक्राचार्य थे, जो तप, त्याग और रहस्यमय विद्याओं में पारंगत थे।
- मानवों के लिए समय-समय पर ऋषियों और मुनियों ने गुरुकुल व्यवस्था के माध्यम से ज्ञान का वितरण किया।
इससे यह स्पष्ट होता है कि गुरु केवल आध्यात्मिक या धार्मिक शिक्षक नहीं, बल्कि संस्कृति, समाज और सत्ता की धुरी रहे हैं।
आधुनिक युग में गुरु का रूप बदला, महत्व नहीं
आज के समय में गुरु का स्वरूप अवश्य बदल गया है, लेकिन उनका महत्व पहले जैसा ही बना हुआ है। पहले के गुरु गुरुकुल में शिक्षा देते थे, अब स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालयों में आधुनिक गुरु छात्रों को शिक्षित कर रहे हैं। तकनीक का युग होने के बावजूद शिष्य और गुरु के संबंध में जो आत्मीयता, श्रद्धा और संवाद का भाव होता है, वह आज भी प्रासंगिक है।
गुरु पूर्णिमा पर देश भर में तैयारियां
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर देशभर में कई आध्यात्मिक संस्थानों, गुरुद्वारों, आश्रमों और शिक्षण संस्थानों में विशेष आयोजन किए जा रहे हैं।
वाराणसी, ऋषिकेश, हरिद्वार, नासिक, उज्जैन, अहमदाबाद, जयपुर, मैसूर, पुणे, कोलकाता और भोपाल जैसे शहरों में हजारों शिष्य अपने-अपने गुरु के सान्निध्य में पहुँच रहे हैं। गुरुओं के प्रवचनों, ध्यान सत्रों, भजन कीर्तन और यज्ञ-हवन की तैयारी हो रही है!
विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी गुरु वंदना होगी
देश के प्रमुख शिक्षण संस्थानों जैसे कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, पुणे यूनिवर्सिटी और राज्य स्तरीय विद्यालयों में शिष्य अपने गुरुओं की वंदना करेंगे!छात्र-छात्राएं अपने शिक्षकों को सम्मान स्वरूप उपहार, पुष्प और कृतज्ञता भरे भाषण प्रस्तुत करेंगे!
डिजिटल युग में भी गुरु-शिष्य परंपरा जीवंत
कोरोना काल के बाद से गुरु-शिष्य का संबंध ऑनलाइन प्लेटफार्मों पर भी विस्तृत हुआ है। आज हजारों शिक्षक यूट्यूब, ज़ूम, गूगल मीट और अन्य डिजिटल माध्यमों से विद्यार्थियों को ज्ञान दे रहे हैं। यह दर्शाता है कि समय चाहे जैसा भी हो, जब तक शिष्य में सीखने की भावना और गुरु में देने की शक्ति है, यह परंपरा अटूट रहेगी।
आध्यात्मिक गुरुओं के संदेश
स्वामी रामदेव, श्री श्री रविशंकर, स्वामी अवधेशानंद, डॉ राम प्रसाद महाराज, प्रेमानन्द महाराज, स्वामी ओम पूर्ण स्वतंत्र, जैसे आध्यात्मिक गुरुओं के लाखों अनुयायी इस दिन विशेष साधना, प्रवचन, ध्यान और यज्ञ में भाग लेने की तैयारी कर रहे हैं!
सद्गुरु और संतों का कहना है कि, “गुरु पूर्णिमा केवल एक दिन नहीं, यह जीवन भर चलने वाली यात्रा की याद दिलाता है — अज्ञान से ज्ञान की ओर। जब आप गुरु को पा लेते हैं, तो आप दिशा पा लेते हैं।”
गुरु और शिष्य: भारतीय संस्कृति की रीढ़
भारतीय संस्कृति का संपूर्ण ढांचा गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित रहा है। चाहे वो राम और वशिष्ठ हों, कृष्ण और संदीपनि हों, या छत्रपति शिवाजी और स्वामी समर्थ रामदास — सभी महान व्यक्तित्वों के निर्माण के पीछे एक श्रेष्ठ गुरु की भूमिका रही है।
यह परंपरा महज औपचारिक नहीं, बल्कि वह संस्कार है जो पीढ़ियों तक ज्ञान और चरित्र का पोषण करती है।
‘गुरु-दक्षिणा’: केवल भेंट नहीं, समर्पण का भाव
गुरु पूर्णिमा के दिन शिष्य अपने गुरुओं को गुरु-दक्षिणा अर्पित करते हैं। यह केवल वस्त्र, धन या सामग्री नहीं होती, बल्कि यह संकल्प होता है कि हम उनके बताए मार्ग पर चलेंगे और अपने जीवन को सार्थक बनाएंगे।
आज के दिन यदि कोई शिष्य यह प्रतिज्ञा कर ले कि वह आलस्य, अज्ञान और अहंकार को त्यागकर विनम्रता, ज्ञान और साधना का मार्ग अपनाएगा, तो वही सच्ची गुरु दक्षिणा होगी.
गुरु हैं तो जीवन है
गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, यह हमारी चेतना को झकझोरने का दिन है। यह वह दिन है जब हम यह महसूस करते हैं कि ज्ञान के बिना जीवन अधूरा है और ज्ञान के लिए गुरु का होना अनिवार्य है।
गुरु केवल व्यक्ति नहीं होते, वे एक ऊर्जा होते हैं, एक चेतना जो हमें अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाती है।









