राखी पुरोहित, एडिटर-इन-चीफ राइजिंग भास्कर
समाचार पत्र आमतौर पर अपने पाठकों को समस्याओं, अपराधों, घोटालों और राजनैतिक उठा-पटक से रूबरू कराते हैं। लेकिन एक अखबार ऐसा भी है जिसने तय किया कि केवल बुराइयों की गिनती करना ही उसका उद्देश्य नहीं है, बल्कि अच्छाइयों को उजागर करना और समाज में सकारात्मक ऊर्जा भरना भी उसकी ज़िम्मेदारी है।
यह काम किसी विदेशी संस्था, किसी NGO या सरकार ने नहीं किया, बल्कि भारत के सबसे बड़े हिंदी दैनिक दैनिक भास्कर ने किया, अपने “मंडे पॉजिटिव” अभियान के ज़रिए।
अब न्यूज़ वॉच नामक एक स्वतंत्र NGO ने जो ताज़ा रिपोर्ट जारी की है, उसमें यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि केवल एक अखबार की इस सकारात्मक पहल ने देश में 17% तक अपराधों में कमी लाने में भूमिका निभाई है।
यह कोई भावनात्मक दावा नहीं, बल्कि वर्षों के डेटा, सर्वे और समाजशास्त्रीय अध्ययन पर आधारित निष्कर्ष है।
1. जब समाचार सिर्फ “समाचार” नहीं रहे, बल्कि प्रेरणा बने
मंडे पॉजिटिव की शुरुआत एक दशक पहले हुई. जब अखबार के चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल ने संपादकीय टीम को निर्देश दिया कि हर सोमवार को पहले पन्ने पर सिर्फ पॉजिटिव खबरें छपेंगी।
यह फैसला उस समय बेहद असामान्य और साहसिक था, क्योंकि पत्रकारिता का मूल स्वभाव ही “जो बुरा है, वही ख़बर है” जैसे सिद्धांत पर चलता रहा है।
मगर रमेशजी ने अपनी दूरदर्शिता से इस धारणा को चुनौती दी और कहा—
“समाज को सिर्फ डर और निराशा नहीं दी जा सकती। उसे उम्मीद भी देनी होगी।”
उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे, दैनिक भास्कर के एमडी सुधीर अग्रवाल, ने अपने पिता को दिए वचन को निभाया और “मंडे पॉजिटिव” को कभी बंद नहीं होने दिया।
2. न्यूज़ वॉच की रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:
नई दिल्ली स्थित न्यूज़ वॉच संस्था, जो मीडिया इम्पैक्ट पर वर्षों से अध्ययन करती रही है, ने 2025 की शुरुआत में एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। इसमें दैनिक भास्कर के मंडे पॉजिटिव के प्रभाव का मूल्यांकन किया गया। रिपोर्ट की फाउंडर वंदना व्यास ने राइजिंग भास्कर से बातचीत में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को साझा किया:
अपराधों में 17% तक गिरावट
मंडे पॉजिटिव में दिखाई गई प्रेरणात्मक कहानियों—जैसे पूर्व अपराधी का समाजसेवी बनना, गाँव के युवाओं का नशा छोड़कर स्टार्टअप शुरू करना, या पुलिस अफसर की ईमानदारी—ने पाठकों के दृष्टिकोण को बदला।
6 राज्यों के 42 जिलों में अपराधियों की मनोवैज्ञानिक प्रोफाइलिंग से पता चला कि प्रेरणादायक खबरें अपराध को विकल्प की बजाय निरर्थक प्रयास की तरह पेश करती हैं।
12% अमीरों में ‘देने का सुख’
उद्योगपति, डॉक्टर, व्यापारी और रिटायर्ड अफसर वर्ग के लोगों में एक नई प्रवृत्ति देखी गई—सामाजिक कार्यों में हिस्सा लेने की।
एक सर्वे में पाया गया कि जो लोग नियमित रूप से मंडे पॉजिटिव पढ़ते थे, उनमें से 12% ने पिछले 5 वर्षों में किसी न किसी जनसेवा अभियान में हिस्सा लिया—चाहे वो शिक्षा दान हो, रक्तदान हो या पर्यावरण संरक्षण।
ब्यूरोक्रेट्स का नज़रिया बदला
IAS, IPS और PCS अधिकारियों से जुड़े इंटरव्यू और केस स्टडीज़ में सामने आया कि मंडे पॉजिटिव के आलेखों ने सरकारी काम को केवल जिम्मेदारी नहीं, एक सेवा समझने का भाव जगाया।
मध्यप्रदेश के एक कलेक्टर ने तो मंडे पॉजिटिव पढ़कर ‘ऑक्सीजन गाँव’ की योजना शुरू की, जिससे पूरा गाँव हरियाली में बदल गया।
आध्यात्मिक झुकाव में वृद्धि
खबरों के बीच जब कोई बच्चा गीता पाठ के ज़रिए गाँव का माहौल बदलता है, या एक युवती ध्यान और योग से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाती है—तो पाठक इन अनुभवों को व्यक्तिगत जीवन में भी अपनाने लगते हैं।
इसी कारण, रिपोर्ट बताती है कि मंडे पॉजिटिव के नियमित पाठकों में आध्यात्मिक साहित्य की बिक्री में 8% की वृद्धि देखी गई।
समाज में सकारात्मक ऊर्जा का विकास
मंडे पॉजिटिव सिर्फ खबर नहीं, सामूहिक मानसिकता का एक टॉनिक बन चुका है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसे “कॉमन साइकॉलॉजिकल टीका” कहा है, जो लोगों को निराशा से बचाता है।
3. सुधीर अग्रवाल: उस वचन के रक्षक
जब रमेश चंद्र अग्रवाल अंतिम बार अस्पताल में भर्ती थे, उन्होंने अपने बेटे सुधीर से कहा था—
“अगर कभी तुम्हें घाटा हो तब भी मंडे पॉजिटिव मत बंद करना। ये लोगों की ज़रूरत है, और तुम्हारे पिता की आत्मा की शांति का कारण।”
सुधीर अग्रवाल ने इस वचन को व्यक्तिगत मिशन बना लिया। जबकि बाकी अख़बार विज्ञापन और राजनीतिक दबावों के बीच खबरों का चेहरा बदलते रहे, दैनिक भास्कर ने हर सोमवार को पॉजिटिव खबरों की पवित्रता को बनाए रखा।
उन्होंने मंडे पॉजिटिव टीम के लिए अलग डेस्क, अलग ट्रेनिंग और स्थानीय संवाददाताओं से प्रेरक कहानियां जुटाने की विशेष व्यवस्था की।
4. मंडे पॉजिटिव की कुछ यादगार कहानियाँ
- रायगढ़ की नीलिमा ठाकुर, जिसने बाल विवाह से बचकर गाँव की पहली महिला ड्राइवर बनी।
- बनारस के रवि पांडे, जो भिखारियों को नाई बनाकर आत्मनिर्भर बना रहे हैं।
- जयपुर की दृष्टिहीन सखियों की टोली, जो कविताओं के ज़रिए स्कूलों में बच्चों को नैतिक शिक्षा दे रही हैं।
- जोधपुर के वृद्धाश्रम का एक युवक, जिसने AI सीखकर पूरी व्यवस्था ऑनलाइन कर दी।
इन कहानियों ने पाठकों को यह एहसास दिलाया कि “हमारे बीच ही नायक होते हैं, बस उनकी कहानी सुनने की ज़रूरत होती है।”
5. मीडिया की भूमिका: डर बेचने से उम्मीद देने तक
आज की मीडिया TRP और क्लिकबेट के दबाव में अपराध, बलात्कार, घोटाले और घृणा से भरी खबरें परोसती है। मगर मंडे पॉजिटिव ने यह साबित कर दिया कि उम्मीद भी बिकती है, और लोग उसे पढ़ना चाहते हैं।
5000 से अधिक पत्र लिखे गए दैनिक भास्कर को, जिनमें लोगों ने बताया कि कैसे मंडे पॉजिटिव ने उन्हें आत्महत्या से रोका, नशा छोड़ने की प्रेरणा दी या रिश्तों को जोड़ने में मदद की।
6. अब आगे क्या? क्या और अखबार सीखेंगे?
न्यूज़ वॉच की फाउंडर वंदना व्यास मानती हैं कि:
“अगर सभी अखबार सप्ताह में एक दिन सिर्फ पॉजिटिव खबरें छापें, तो देश की सामूहिक चेतना बदल सकती है।”
भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भी इस रिपोर्ट पर संज्ञान लेते हुए मीडिया संस्थानों को प्रेरणा देने की बात कही है।
जब एक अख़बार, मिशन बन जाए
रोज़मर्रा की गहमागहमी में शायद कई लोगों को यह महसूस नहीं होता कि एक पेज की पॉजिटिव खबर कैसे उनके सोचने का तरीका बदल रही है।
लेकिन न्यूज़ वॉच की रिपोर्ट ने यह सिद्ध कर दिया है कि अखबार सिर्फ सूचना नहीं, चेतना का निर्माण कर सकते हैं।
दैनिक भास्कर का “मंडे पॉजिटिव” अब केवल एक कॉलम नहीं, बल्कि एक आंदोलन बन चुका है—जिसे सुधीर अग्रवाल ने अपने पिता के आशीर्वाद और वचन से सींचा है।






