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Thursday, July 9, 2026, 2:39 am

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Lifestyle

 क्या आप सच में जानते हैं आप क्या खा रहे हैं? वायरल वीडियो ने खोली पैकेज्ड फूड की ‘पारदर्शिता’ की पोल

राखी पुरोहित, एडिटर-इन-चीफ

आप जो बाजार से खरीद रहे हैं, उसमें क्या-क्या है—क्या आप सच में जानते हैं?”
यह सवाल पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो की वजह से लाखों उपभोक्ताओं के दिल में घर कर गया है।

एक साधारण दिखने वाला वीडियो, जिसमें एक युवा उपभोक्ता ने सुपरमार्केट से खरीदे गए स्नैक्स के पैकेट को कैमरे पर दिखाते हुए पूछा—

“ये जो आप खा रहे हैं, उसमें क्या है? यह तो अंग्रेज़ी में इतने बारीक अक्षरों में लिखा है कि पढ़ना भी मुश्किल है। क्या कंपनियां जानबूझकर हमें गुमराह कर रही हैं?”

इस वीडियो को अब तक 7 मिलियन से ज़्यादा लोग देख चुके हैं, और इसने पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री की पारदर्शिता, उपभोक्ता अधिकारों, और भाषा की बाधा जैसे गंभीर मुद्दों पर नई बहस छेड़ दी है।

राइजिंग भास्कर इस विषय पर कोई मत व्यक्त नहीं कर रहा, लेकिन प्रस्तुत कर रहा है एक विस्तृत रिपोर्ट—जिसमें वह सब कुछ शामिल है जो आप जानना चाहते हैं।


1. समस्या क्या है? पढ़ा ही नहीं जा सकता, फिर जाना कैसे जाएगा?

खाद्य सामग्री का पैकिंग लेबल उपभोक्ता के अधिकारों का सबसे बुनियादी स्रोत होता है। लेकिन आज भी ज़्यादातर कंपनियाँ:

  • सामग्री (Ingredients) की सूची बारीक अक्षरों में छापती हैं
  • टेक्स्ट केवल अंग्रेज़ी भाषा में होता है
  • कई बार वैज्ञानिक या तकनीकी नामों (जैसे INS-330, E-635, Sodium Benzoate) का प्रयोग होता है, जिनका सामान्य उपभोक्ता को कोई मतलब नहीं पता
  • शुगर, सॉल्ट, ट्रांस फैट जैसे हानिकारक तत्वों को छुपाने के लिए पेचीदा शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है (जैसे Glucose Syrup, Maltodextrin, Sucrose)

यह सब मिलकर उपभोक्ता को अनजाने में ही गलत खाने के लिए मजबूर कर देता है।


2. वायरल वीडियो में क्या है खास?

इस वायरल वीडियो में एक युवा ग्राहक सुपरमार्केट से कुछ मशहूर स्नैक आइटम्स (जैसे नमकीन, इंस्टैंट नूडल्स, बिस्किट्स) को कैमरे पर दिखाते हुए एक-एक कर पढ़ने की कोशिश करता है। लेकिन वह कहता है:

“ये इतना छोटा लिखा है कि चश्मा पहनकर भी मुश्किल से पढ़ा जा सकता है… और सब कुछ अंग्रेज़ी में… फिर गांव की दादी क्या जानेगी उसमें MSG है या नहीं?”

फिर वह सुझाव देता है—

“कंपनियां क्यों नहीं एक सरल QR कोड छापतीं, जिसे स्कैन करके ग्राहक अपनी भाषा में सबकुछ जान सके?”

वीडियो की भाषा सरल, अंदाज़ व्यंग्यात्मक और भाव गहराई लिए हुए हैं—इसीलिए यह हर उम्र, वर्ग और क्षेत्र के लोगों को छू गया।


3. क्या QR कोड समाधान हो सकता है?

प्रस्तावित समाधान काफी व्यावहारिक और आधुनिक है। QR कोड से:

  • उपभोक्ता सामग्री को अपनी भाषा में पढ़ सकता है
  • मोबाइल एप्लिकेशन से Real-time जानकारी मिल सकती है
  • बीमार व्यक्ति, डायबिटिक, या एलर्जी से ग्रसित लोग यह जान सकते हैं कि यह उत्पाद उनके लिए सुरक्षित है या नहीं
  • कंपनियों के लिए जिम्मेदारी तय करना आसान हो जाता है
  • सरकार निगरानी कर सकती है कि उपभोक्ता को सही जानकारी दी गई या नहीं

भारत जैसे बहुभाषी देश में जहां 65% आबादी अब भी ग्रामीण और गैर-अंग्रेज़ी पृष्ठभूमि से आती है, यह समाधान “पारदर्शिता और समावेशिता” दोनों का प्रतीक हो सकता है।


4. कंपनियों की चतुराई या मजबूरी?

उद्योग विशेषज्ञ मानते हैं कि कंपनियां ऐसा सिर्फ ग्राहकों को भ्रमित करने के लिए नहीं करतीं, बल्कि वे यह भी कहती हैं कि:

  • पैक पर जगह सीमित होती है
  • सभी भाषाओं में छापना महंगा और तकनीकी रूप से जटिल है
  • QR कोड से जानकारी देने का कोई अनिवार्य नियम नहीं है

लेकिन उपभोक्ता अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का कहना है कि यह “मजबूरी नहीं, चालाकी है”

कुछ कंपनियां ‘Zero trans-fat’ का दावा करती हैं, मगर बारीक अक्षरों में Hydrogenated Oil भी लिखा होता है।

प्रश्न यह नहीं है कि जगह है या नहीं… प्रश्न यह है कि “ईमानदारी है या नहीं।”


5. सरकार और FSSAI की भूमिका

FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) ने समय-समय पर लेबलिंग को लेकर दिशानिर्देश जारी किए हैं:

  • Green, Orange और Red मार्किंग सिस्टम (Health Star Rating)
  • अलर्ट टैग: “High Sugar”, “High Salt”
  • Pack size के अनुसार minimum font size का निर्देश

लेकिन इन नियमों का अनुपालन 100% नहीं हो रहा है।

FSSAI की वेबसाइट पर भी QR कोड को लेकर कोई स्पष्ट दिशा नहीं है। हालांकि कुछ खाद्य उत्पादों (जैसे देसी घी, ऑर्गेनिक अनाज) पर अब QR कोड आने लगे हैं, मगर यह अभी स्वैच्छिक है, अनिवार्य नहीं।


6. उपभोक्ता की स्थिति: कहीं भ्रमित, कहीं बेबस

हमने देशभर के 20 उपभोक्ताओं से बात की—शहर, गांव, युवा, वृद्ध, पढ़े-लिखे और अनपढ़। लगभग सभी ने कहा कि:

  • उन्हें नहीं पता कि वे क्या खा रहे हैं
  • वे केवल ब्रांड पर भरोसा करते हैं
  • अधिकतर सामग्री पढ़े बिना ही खरीदते हैं

रायपुर की गृहिणी कविता पांडे कहती हैं:

“पैक पर लिखा भी है तो इतना छोटा कि मेरी नज़रें थक जाती हैं… अब मैं बस ऊपर बने फोटो और ब्रांड से अंदाज़ा लगाती हूं।”

उदयपुर के कॉलेज छात्र अयान ने कहा:

“कई बार बाद में पता चला कि जिसमें दूध लिखा है, उसमें ‘milk solids’ हैं। यह तो धोखा है ना?”


7. क्या QR कोड को अनिवार्य किया जा सकता है?

तकनीकी रूप से यह बिल्कुल संभव है। आज अधिकांश लोग स्मार्टफोन रखते हैं। QR कोड को:

  • बेसिक कैमरा एप से स्कैन किया जा सकता है
  • सरकारी पोर्टल से लिंक किया जा सकता है
  • हर राज्य की क्षेत्रीय भाषा में जानकारी दी जा सकती है

इसके लिए सरकार को:

  • FSSAI एक्ट में संशोधन करना होगा
  • स्टैंडर्ड फॉर्मेट तय करना होगा
  • ग्रामीण और बुजुर्गों को भी इसका उपयोग सिखाना होगा

यदि डिजिटल इंडिया की सोच को सही मायनों में “स्वस्थ भारत” के साथ जोड़ना है, तो यह कदम जरूरी बन जाता हैं.


8. कुछ कंपनियों ने किया है प्रयोग

कुछ FMCG कंपनियां ने अपने कुछ उत्पादों पर QR कोड की शुरुआत की है:

  • Amul के दूध पैकेट पर QR कोड स्कैन कर ताज़गी की तारीख, स्रोत और पोषण जानकारी देखी जा सकती है
  • ITC के आटा पैक पर उसकी शुद्धता और प्रयोगशाला परीक्षण के विवरण उपलब्ध कराए जाते हैं

लेकिन यह अभी अपवाद हैं, सामान्य चलन नहीं। उपभोक्ताओं का दबाव ही कंपनियों को इस ओर मजबूर करेगा।


9. सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं

कुछ टिप्पणियाँ:

  • “जैसे गाड़ियों के लिए PUC सर्टिफिकेट ज़रूरी है, वैसे ही खाने के लिए QR ट्रांसपरेंसी अनिवार्य होनी चाहिए।”
  • “हमें केवल स्वाद नहीं, सच भी चाहिए।”
  • “ब्रांड चाहे जितना बड़ा हो,ConsumerAwarenesखिला रहे हैं।”

10 जो दिखता है, वो ही सच्चाई नहीं होता…

आज की भागदौड़ में उपभोक्ता पैक देखता है, चमकता डिजाइन देखता है, और खरीद लेता है। लेकिन क्या वह सच जानता है? शायद नहीं।

इस वायरल वीडियो ने एक सवाल नहीं, पूरा आंदोलन खड़ा कर दिया है—एक स्वस्थ, जागरूक और पारदर्शी भारत के लिए।

सरकार अगर चाहे, तो QR कोड जैसी तकनीक से हर उपभोक्ता को सशक्त बना सकती है। कंपनियां अगर चाहें, तो केवल मुनाफे से आगे बढ़कर ईमानदारी की नई परिभाषा लिख सकती हैं।

और हम अगर चाहें…
तो अगली बार कुछ भी खरीदते समय यह ज़रूर पूछें—
“मैं क्या खा रहा हूं?”


 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor