राखी पुरोहित, एडिटर इन चीफ राइजिंग भास्कर
“वल्लभ श्याम ताश मिल खेलो सांवरिया, जिसमें बादशाह बनवारी, जिसमें बेगम राधा प्यारी…”
जब यह पद गूंजता है, तो लगता है जैसे किसी मंदिर में घंटियां नहीं, ब्रह्मांड की परतें खुल रही हैं। यह कोई साधारण भजन नहीं, बल्कि एक ऐसा दार्शनिक रहस्य है जिसमें ताश के पत्तों के पीछे छुपे ईश्वर तत्व और ब्रह्मांडीय प्रतीकों की झलक मिलती है।
इस भजन की गहराई में झांकें तो समझ आता है कि ताश केवल खेल नहीं, बल्कि सृष्टि का लघु रूप है – एक दिव्य गीता, जिसमें आत्मा, प्रकृति, और परमात्मा सभी समाहित हैं।
ताश की गड्डी या ब्रह्मांड की व्यवस्था?
एक गड्डी में 52 पत्ते होते हैं – 13-13 के चार भाग: इक्का, दो, तीन… दस, गुलाम, बेगम, बादशाह। क्या यह मात्र संयोग है? नहीं, इसे देखें ईश्वर के चश्मे से –
- बादशाह (King): श्रीकृष्ण स्वयं – योगेश्वर, नीति के महारथी।
- बेगम (Queen): राधा – शक्ति का स्त्रोत, प्रेम और भक्ति की मूर्ति।
- गुलाम (Jack): जीवात्मा – कभी भटकी हुई, कभी प्रभु में लीन।
- इक्का (Ace): ‘एक ओंकार’ – अद्वैत का प्रतीक, परमात्मा की एकता।
इन सबके नीचे संख्यात्मक पत्ते हैं जो कालचक्र और तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं:
- 2 से 10 तक के पत्ते: जीवन की विविध अवस्थाएं और अनुभव।
- 9 – नवदुर्गा, 8 – अष्टकमल, 7 – सप्तसागर, 6 – ऋतुएं, 5 – इंद्रियाँ, 4 – वेद, 3 – त्रिगुण, 2 – द्वैत, 1 – अद्वैत।
‘खेलो सांवरिया’ – क्या यह सिर्फ निमंत्रण है?
नहीं, यह वो पुकार है जो ईश्वर से कहती है –
“हे सांवरिया! इस जीवन रूपी ताश के खेल में मेरे संग चलो।”
हर बार जब हम ताश की गड्डी खोलते हैं, वह हमें सिखाती है कि जीवन में कोई कार्ड सर्वोच्च नहीं, सबका स्थान है – जैसा गीता कहती है: “समत्वं योग उच्यते।”
सात ऋषि और चार वेद: प्रतीकों का मेला
भजन के आगे के चरणों में जिन ब्रह्मांडीय तत्वों का समावेश है, वे साफ़ बताते हैं कि यह ताश केवल मानव मन का अविष्कार नहीं, ईश्वरीय प्रेरणा से उत्पन्न संरचना है –
- सप्त ऋषि: ज्ञान के सात स्तंभ – ब्रह्मा की वाणी।
- छ ऋतुएं: प्रकृति का चक्र – संयोग और परिवर्तन।
- पंच तत्व: जीवन की रचना – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी।
- चार वेद: अस्तित्व की भाषा।
- तीन लोक: भू, भुव: और स्व:।
- दुग्गी चाँद-सूरज: समय और प्रकाश के प्रतीक।
- ‘एक’ संसार: ईश्वर की एकता में लीन समस्त विविधता।
ताश: पाप या परमात्मा का प्रवेश द्वार?
हमारे समाज में ताश को जुए और व्यसन का प्रतीक बना दिया गया। लेकिन क्या हमने कभी उसकी आध्यात्मिकता को समझा? यदि भजन में ‘ताश मिल खेलो सांवरिया’ का आवाहन है, तो यह कोई सांसारिक जुआ नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक खेल है – लीला, जिसमें कृष्ण रचयिता हैं, राधा भक्ति हैं और हम सब केवल पात्र।
हर शफल में छुपा है एक नया ब्रह्मांड
जब ताश की गड्डी को शफल किया जाता है, तो यह किसी पुनर्जन्म की तरह होता है – नए प्रारब्ध, नई संभावनाएं, और एक नई कथा। ये गड्डी हमें सिखाती है कि जीवन में हार-जीत तो आती-जाती है, लेकिन जिस भाव से हम खेलते हैं वही हमें मुक्त करता है या बाँधता है।
दर्शन या भक्ति – क्या कहती है संतवाणी?
जोधपुर के संत कहते हैं –
“ताश को यदि सांसारिक मोह से हटाकर देखें तो वह श्रीकृष्ण की रासलीला जैसा अनुभव देती है। हर कार्ड कृष्ण के किसी रूप की तरह है – कोई दाऊ, कोई उद्धव, कोई बलराम, कोई सुदामा।”
जीवन एक ताश है, ईश्वर उसका खिलाड़ी
इस भजन ने जिस तरह ताश को एक आध्यात्मिक दर्शन में परिवर्तित कर दिया, वह अपने आप में विलक्षण है। जब ‘बादशाह बनवारी’ हो, ‘बेगम राधा प्यारी’ हो, ‘गुल्लो गिरधारी’ हो और दासी ‘दशों दिशाएं’ – तब हर ताश का पत्ता एक मंत्र बन जाता है।
तो चलिए, वल्लभ श्याम के साथ ताश मिल खेलिए – और हर कार्ड में ईश्वर का रूप देखिए।



