डीके पुरोहित | नई दिल्ली, diliprakhai@gmail.com तीसरी किस्त
1965 की गर्मियों में इंग्लैंड के कैम्ब्रिज में एक इटैलियन लड़की को भारतीय युवक से प्रेम हो गया। वह युवक कोई आम छात्र नहीं था—वह था भारत के पूर्व प्रधानमंत्री का बेटा, राजीव गांधी। उस इटैलियन युवती का नाम था—एड्विज़ एंटोनिया अल्बिना माइनो। लेकिन भारत उसे आज जानता है: सोनिया गांधी के नाम से।
जैविक रूप से विदेशी, पर भावनात्मक रूप से भारतीय राजनीति की धुरी—सोनिया गांधी की कहानी “The Red Sari” (जवियर मोरो) पुस्तक के ज़रिए जो चित्रित होती है, वह किसी भी थ्रिलर से कम नहीं।
एक विदेशी लड़की का भारतीय परिवार में प्रवेश
सोनिया गांधी का जन्म 1946 में इटली के लुसियाना में हुआ था। उनके पिता स्टेफ़ानो माइनो एक कट्टर फासीवादी थे जो मुसोलिनी के समर्थक माने जाते थे। सोनिया की परवरिश एक पारंपरिक ईसाई वातावरण में हुई।
लेकिन नियति कुछ और लिख चुकी थी। इंग्लैंड में राजीव गांधी से मुलाकात, प्रेम, फिर विवाह (1968) और फिर भारत आना—यह उनके जीवन का पहला बड़ा मोड़ था।
नेहरू-गांधी खानदान में कदम और आत्म-संघर्ष
नई बहू बनने के बाद सोनिया नेहरू-गांधी परिवार के ‘राजनीतिक वंशवाद’ के बीच एक चुप और संकोची महिला की तरह उभरीं। इंदिरा गांधी के साए में उन्होंने भारतीय संस्कृति, खाना, भाषा और रहन-सहन सीखा।
वह साड़ी पहनने लगीं, हिंदी बोलने लगीं, और खुद को “परछाईं में रहनेवाली बहू” के रूप में ढालने लगीं। लेकिन उनके लिए सबसे कठिन समय तब आया जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजनीति ने राजीव को मजबूर किया—और फिर 1991 में राजीव गांधी की भी हत्या हो गई।
राजनीति से नफरत से सत्ता के सिंहासन तक
राजीव की हत्या के बाद सोनिया बुरी तरह टूट गईं। उन्होंने कई सालों तक राजनीति से दूरी बनाई। कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने उन्हें कई बार पार्टी की कमान संभालने का अनुरोध किया, लेकिन वह बार-बार मना करती रहीं।
लेकिन 1998 में, जब कांग्रेस गिरती हालत में थी, सोनिया गांधी ने कमान संभाली और कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष बनीं।
उनके इस निर्णय ने न केवल पार्टी में नई जान फूंकी, बल्कि यह संदेश भी दिया कि “वह विदेशी बहू अब केवल एक परिवार की नहीं, एक राजनीतिक पार्टी की भी नेता है।”
2004: जब भारत ने एक विदेशी को प्रधानमंत्री बनने से रोका
2004 के आम चुनाव में जब कांग्रेस गठबंधन ने NDA को हराया, तो स्वाभाविक रूप से सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनना था। लेकिन ठीक इसी समय विपक्ष ने “विदेशी मूल” का मुद्दा उठाया।
सुषमा स्वराज और उमा भारती जैसी भाजपा नेता खुले आम कहने लगीं कि “अगर सोनिया प्रधानमंत्री बनीं, तो हम सिर मुंडवा देंगे, धरना देंगे, आत्महत्या करेंगे।”
इस राष्ट्रीय दबाव के बीच सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद ठुकरा दिया और एक अप्रत्याशित निर्णय लिया—डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया।
उनकी यह ‘त्याग की राजनीति’ आज भी भारतीय राजनीति की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक है।
राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और “सुपर पीएम” का आरोप
प्रधानमंत्री न बनकर भी सोनिया गांधी की शक्ति कम नहीं हुई। उन्होंने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) बनाई, जिससे मनरेगा, सूचना का अधिकार (RTI), खाद्य सुरक्षा जैसे कई ऐतिहासिक कानून बने।
लेकिन साथ ही यह आरोप भी लगे कि वह पर्दे के पीछे से सरकार चला रही थीं—“सुपर प्राइम मिनिस्टर” की तरह।
किताब में जिक्र है कि कई बार कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्री NAC के फैसलों से असहमत होते, लेकिन “10 जनपथ” की मंजूरी उनके ऊपर हावी होती।
भाजपा का विरोध और “लाल साड़ी” का विवाद
The Red Sari पुस्तक के प्रकाशन के समय कांग्रेस ने किताब का विरोध किया और भारत में इसे बैन करवाने की कोशिश की। दावा था कि इसमें सोनिया गांधी की निजी जिंदगी को “गलत तरीके से चित्रित” किया गया है।
लेकिन लेखक जवियर मोरो ने कहा—“इस किताब में हर तथ्य सार्वजनिक रिकॉर्ड से लिया गया है। मैंने न तो महिमामंडन किया है, न ही आलोचना। यह केवल एक कहानी है—एक महिला की जो राजनीति में नहीं आना चाहती थी, लेकिन इतिहास ने उसे वहां ला खड़ा किया।”
‘परिवार बनाम संस्थान’ की बहस और कांग्रेस की गिरावट
2014 के बाद जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई, तो सोनिया गांधी पर “परिवार को संस्थान पर हावी करने” का आरोप लगा। राहुल गांधी को प्रमोट करना, पार्टी में वंशवाद को बढ़ावा देना—ये सब आलोचना के केंद्र में रहे।
यह भी पुस्तक में उल्लेखित है कि कैसे कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी सोनिया से तो संतुलन बनाए रखती थी, लेकिन राहुल के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाई।
पुस्तक की अंतर्धारा: त्याग, त्रासदी और ताक़त
The Red Sari एक जीवनी से ज़्यादा है। यह एक विदेशी महिला की भारत में सांस्कृतिक पुनर्जन्म की कथा है।
यह उस स्त्री की कहानी है जिसने—
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पति को खोया,
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बच्चों को राजनीति से दूर रखना चाहा,
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लेकिन खुद राजनीति में डूब गई,
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और फिर देश की सबसे शक्तिशाली महिला बनी।
क्यों आज भी सोनिया गांधी एक पहेली हैं
सोनिया गांधी आज भी सार्वजनिक रूप से कम बोलती हैं, लेकिन हर राजनीतिक समीक्षक मानता है कि उनका ‘साइलेंस’ भी कई बार एक रणनीति रहा है।
उनकी शक्ति, विरोध और विरासत पर किताब का निष्कर्ष यह कहता है:
“सोनिया गांधी एक परछाईं की तरह हैं—न तो पूरी तरह से दिखती हैं, न ही पूरी तरह से छुपी रहती हैं।”
‘The Red Sari’ के 5 सबसे विवादित दावे
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राजीव गांधी और संजय गांधी के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा।
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इंदिरा गांधी की सोनिया से पहली बेरुख़ी।
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सोनिया का सास-ससुर से रिश्तों को संभालने का संघर्ष।
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सोनिया द्वारा पीएम पद ठुकराना पूर्व नियोजित था।
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कांग्रेस में वंशवाद की रणनीति एक दीर्घकालीन योजना थी।
सोनिया गांधी का प्रभावी योगदान
| क्षेत्र | योगदान |
|---|---|
| राजनीतिक पुनर्जागरण | 1998 में कांग्रेस की कमान संभालकर उसे पुनर्जीवित किया |
| कल्याणकारी योजनाएं | मनरेगा, RTI, खाद्य सुरक्षा अधिनियम |
| संगठनात्मक मजबूती | यूपीए गठबंधन की नींव और 10 साल की सरकार |
Author: Dilip Purohit
Group Editor









