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Thursday, April 30, 2026, 7:13 pm

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आशीष वडेरा का जज्बा… “थैलेसीमिया को हराने की जिद: जोधपुर थैलेसीमिया वॉरियर्स बना बच्चों की जिंदगी का संरक्षक”

थैलेसीमिया के खिलाफ जोधपुर में जागा जुनून, बच्चों के लिए मुस्कान बन रही ‘वॉरियर्स’ की टीम

राखी पुराेहित. जोधपुर

8302316074 rakhipurohit066@gmail.com

थैलेसीमिया… एक ऐसी आनुवांशिक बीमारी जिसमें जन्म से लेकर जीवनभर खून की जरूरत बनी रहती है। बच्चों की मासूम आंखों में दर्द के साए होते हैं, हर महीने, कभी-कभी हर हफ्ते अस्पताल के चक्कर और ब्लड यूनिट्स के भरोसे चलती जिंदगी। लेकिन इन बच्चों के लिए जोधपुर और उसके आसपास की मिट्टी से एक उम्मीद की किरण निकली है — जोधपुर थैलेसीमिया वॉरियर्स।

चार साल पहले स्थापित यह एनजीओ न केवल रक्तदान को लेकर समाज में जागरूकता फैला रहा है, बल्कि थैलेसीमिया से ग्रसित बच्चों के इलाज, परीक्षण और भावनात्मक सहयोग तक हर मोर्चे पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

टीम बदल रही समाज में सोच

संस्था के मुख्य पदाधिकारी आशीष वडेरा, मणिकांत मोयल, नेमीचंद माली, हिमांशु परिहार, नेहा मोयल, दीपिका सांखला, लक्षिता भाटी सहित टीम का कहना है कि समाज में धीरे-धीरे सोच बदल रही है। विशेषकर युवा अब थैलेसीमिया पीड़ितों के लिए स्वेच्छा से रक्तदान कर रहे हैं।

नेहा मोयल बताती है कि, “हमारे प्रयासों से अब लोगों को पता चल रहा है कि सिर्फ सहानुभूति से कुछ नहीं होगा, जब तक रक्त की जरूरत समय पर पूरी नहीं होगी थैलीसीमिया से पीड़ित बच्चों का जीवन खतरे में रहेगा। अब माहौल ऐसा बन चुका है कि जागरूकता से भावनात्मक जुड़ाव भी बढ़ा है।”

दीपिका सांखला बताती हैं कि जोधपुर में लगभग 500 थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे हैं। कुछ को हर 10 दिन में खून चढ़ाना पड़ता है, तो कुछ को 15 या 30 दिन में।

हेल्पलाइन बना रही है जिंदगी आसान

टीम के हिमांशु परिहार बताते हैं कि उन्होंने हेल्पलाइन नंबर 8306858488 जारी किया है, जहां रजिस्ट्रेशन करवा कर लोग रक्तदान के लिए नाम दर्ज करवा सकते हैं। इससे समय पर ब्लड उपलब्ध करवाने में मदद मिल रही है।

सरकार की ओर से थैलेसीमिया पेशेंट्स को दवा और खून तो निशुल्क दिया जा रहा है, पर HPLC टेस्ट को लेकर कोई अनिवार्यता नहीं है — यही एक बड़ी चिंता का विषय है।

HPLC टेस्ट अनिवार्य क्यों हो?

आशीष वडेरा बताते हैं कि HPLC टेस्ट हर नवविवाहित जोड़े के लिए अनिवार्य किया जाना चाहिए। इस टेस्ट से यह पता चल सकता है कि दंपती के जीन में थैलेसीमिया की संभावना है या नहीं। अगर दोनों कैरियर हैं, तो संतान में थैलेसीमिया मेजर होने की आशंका बढ़ जाती है।

इस टेस्ट की लागत लगभग 2 हजार रुपये है, जो बीमारी के खतरे की तुलना में बहुत कम है। वेस्ट बंगाल ,मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह टेस्ट पहले से अनिवार्य किया जा चुका है, राजस्थान में भी इसे लागू करने की मांग उठ रही है।

थैलीसीमिया का इलाज।
एक मात्र इलाज है BONE MARROW TRANSPLANT जिसके लिए
एचएलए टेस्टिंग है जरूरी

अभी तक के शिविरों के आधार पर 22 बच्चों का एचएलए मिलान सफलतापूर्वक हुआ है और उसमें से 12 बोन मैरो ट्रांसप्लांट की पाइपलाइन में हैं।

कुछ पेशेंट ऐसे भी हैं जो आज स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। कुछ ने 15 साल पहले, कुछ ने 10 साल पहले तो कुछ ने 7 साल पहले बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराया है। नेमीचंद माली बताते हैं कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट थैलेसीमिया का स्थायी इलाज है, लेकिन इसकी लागत 20 से 30 लाख रुपये तक होती है। इतना खर्च हर परिवार नहीं उठा सकता। ऐसे में सरकारी और सामाजिक स्तर पर सहयोग जरूरी है।

लक्षिता भाटी के सुझाव जो नीति बदल सकते हैं

-राजस्थान में सभी सरकारी व निजी अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ विभाग में HPLC टेस्ट अनिवार्य किया जाए।

CSR फंड से थैलेसीमिया बच्चों के लिए बेहतर सुविधाएं हो , उच्च स्तर की दवाएं मिले, बोन मैरो ट्रांसप्लांट में सहयोग मिले।

स्कूल और कॉलेज स्तर पर जागरूकता शिविर चलाए जाएं।

रक्तदान के लिए युवा क्लबों को विशेष रूप से प्रेरित किया जाए।

थैलेसीमिया कैरियर कपल्स के लिए परामर्श किए जाएं।

राज्य सरकार से मांग

1- जोधपुर थैलेसीमिया वॉरियर्स सरकार से मांग करती है कि थैलेसीमिया रोगियों को दी जाने वाली आयरन चिलेशन की दवाइयां प्रभावशाली नहीं है। इनके लेने से आयरन की मात्रा उनके शरीर में नियंत्रित नहीं रह पाती है। अतः इनके स्थान पर सिप्ला , सनफार्मा, नोवार्टीज कंपनी की प्रभावशाली दवाइयां उपलब्ध करवाई जाएं।

2-आयरन चेलेशन में सबसे ज्यादा कारगर दवाई , डेस्फरल इंजेक्शन उपलब्ध करवाए जाएं

3–सभी को NAT टेस्टेड रक्त मिले, जिससे इन बच्चों में रक्त से होने वाले संक्रमण का खतरा कम हो सकें।

4–थैलेसीमिया बच्चों को दि्व्यांग श्रेणी में होने के बावजूद सरकारी नौकरियों में आरक्षण नहीं दिया जा रहा है। जो कि इन बच्चों के साथ अन्याय है। इन बच्चों को भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। जोधपुर थैलेसीमिया वॉरियर्स की यह लड़ाई सिर्फ चिकित्सा की नहीं है, यह लड़ाई उम्मीद की है, जीवन को बेहतर बनाने की है। संस्था का प्रयास है कि बच्चों को न केवल समय पर ब्लड व दवाएं मिले, बल्कि वे आगे चलकर इस समाज का मजबूत हिस्सा बनें।

इस टीम की सच्ची ताकत है — आपसी सहयोग, निस्वार्थ सेवा और हर बच्चे की मुस्कान को जिंदा रखने की भावना।

“एक यूनिट ब्लड किसी के लिए सिर्फ एक बोतल हो सकती है, लेकिन किसी बच्चे के लिए वो पूरी जिंदगी है।” इसी सोच के साथ जोधपुर थैलेसीमिया वॉरियर्स निरंतर आगे बढ़ रहा है और थैलेसीमिया को पराजित करने की कहानी लिख रहा है — खून की हर बूंद से उम्मीद की एक नई सुबह ।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor