“आंखों की रोशनी से रौशन हो जीवन, मृत्यु के बाद भी अपनी आंखों से देखिए मानवता का उजास”
दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर
8302316074 diliprakhai@gmail.com
दोपहर के 4 बजे रहे थे। अगस्त की तेज धूप टैक्सी की खिड़की से चेहरे पर पड़ रही थी, लेकिन भीतर का माहौल… किसी फिल्मी सीन जैसा।
“तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है”… टैक्सी में हल्की आवाज़ में यह गीत बज रहा था।
अचानक दूसरा ट्रैक—
“मेरे नैना सावन भादो, फिर भी मेरा मन प्यासा…”
हम दोनों ने एक दूसरे की आंखों में देखा…—दोनों ने अनकहे स्वर में कहा, “शायद आज ईश्वर भी चाहता है कि आंखों पर बात हो।”
टैक्सी झटके से रुकी। हम आई बैंक सोसायटी ऑफ राजस्थान – जोधपुर चैप्टर के चेयरमैन राजेंद्र जैन के आवास पर। दरवाज़ा खुला और जैसे ही भीतर दाखिल हुए, सामने एक तख्ती थी—
“नेत्रदान महादान है। जीवन की ज्योति को अमर करें।”
सीन-1: मुलाकात एक मिशनरी से
राजेंद्र जैन हमें देख मुस्कराए, फिर बेहद विनम्र भाव से बोले,
“पहुंचने में कोई दिक्कत तो नहीं हुई?”
हमने सिर हिलाकर कहा, “बिलकुल नहीं, बल्कि रास्ता भी आंखों की तरह सुंदर रहा।”
उन्होंने हमें अपने सामने सोफे पर बैठने का इशारा किया। ऑफिस में एक और तख्ती चमक रही थी—
“दान करो आंखों के मोती, अमर रहेगी जीवन ज्योति।”
नींबू-पानी के साथ बातचीत शुरू हुई—और एक अद्भुत, मानवीय यात्रा पर निकल पड़े हम।
सीन-2: एक यात्रा की शुरुआत – ट्रेन के डिब्बे से जोधपुर तक
राजेंद्र जैन ने कहानी सुनाई—जो उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट थी।
“एक ट्रेन में सफर कर रहा था। एक पिता अपने बेटे को खिड़की के बाहर दिख रही हर चीज़ के बारे में बता रहा था—’बेटा, ये गाय है… बेटा, ये ऊंट है… बेटा, ये नीम का पेड़ है…बेटा यह तालाब है…बेटा यह बिजली का खंंभा है…’।
मैं भी पास ही बैठा था। तभी एक युवक झल्लाया और बोला, ‘अंकल, क्या 12-13 साल के बच्चे को ये नहीं पता?’
पिता की आंखें भर आईं। वह बोला—’मेरा बेटा जन्म से अंधा था। किसी भले इंसान ने आंखें दान दी हैं। पहली बार ये बच्चा दुनिया देख रहा है—तो मैं बता रहा हूं कि जो दिख रहा है वो क्या है।’
“बस वहीं मैंने ठान लिया… मैं कुछ करूंगा।” और राजेंद्र जैन आज नेत्रदान महादान महाअभियान को जोधपुर ही नहीं आस पास के क्षेत्र में घर-घर पहुंचाने की यात्रा में लगे हुए हैं।
सीन-3: सेवा का संकल्प – आई बैंक से समाज तक
14 माह तक लॉयंस क्लब के माध्यम से यह सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ। लेकिन फिर एक दिन आई बैंक सोसायटी ऑफ राजस्थान की जोधपुर इकाई का दायित्व मिला। अब तक 300 से अधिक कॉर्निया प्रत्यारोपण करवा चुके हैं।
“रोज़ दो-तीन कॉल आते हैं,” जैन बताते हैं।
“कोई कहता है—पापा की डेथ हो गई है, हम नेत्रदान करवाना चाहते हैं। ये समाज में बदलाव का प्रतीक है।”
सीन-4: आंखों की अलख – विरोध और विश्वास की दीवारें
“जब मथुरादास माथुर अस्पताल में नेत्रदान के लिए परिजनों से आग्रह किया, तो एक बार विरोध का सामना करना पड़ा,” उन्होंने याद करते हुए कहा।
“मगर हम रुके नहीं। हम 25 लोगों की टीम है—स्कूल, कॉलेज, गांव, शहर, हर जगह अलख जगा रहे हैं।”
“25 अगस्त से 8 सितंबर तक नेत्रदान पखवाड़ा मनाएंगे,” उन्होंने ठोस योजना साझा की।
“प्रतियोगिताएं, निबंध, डिबेट—हर मंच से जागरूकता फैलाएंगे।”
सीन-5: जब साहित्य और संगीत बने कारक
“मशहूर उपन्यासकार और शाइर हबीब कैफ़ी साहब कह चुके हैं—’कुछ देकर ही जाना है तो आंखें ही दान कर दो'” – जैन ने बताया।
“कविता, शायरी, लेखन—ये सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, परिवर्तन की मशाल हैं।”
हमने महसूस किया—यह सिर्फ अभियान नहीं, एक आंदोलन है।
सीन-6: रिकॉर्ड की चाह – 21000 संकल्प पत्र से अधिक का लक्ष्य
“कोशिश थी कि प्रकाश जायसवाल जब कलेक्टर थे, तब एक ही दिन में रिकॉर्ड बनाए जाएं। 21000 से अधिक संकल्प पत्र भरवाएं।”
“राजकोट का रिकॉर्ड तोड़ना था—मगर कलेक्टर महोदय का ट्रांसफर हो गया। फिर सब रुक गया…” फिर कोरोना ने दस्तक दे दी और हमारी योजना अधर में लटक गई।
हमने कहा—”तो अब राइजिंग भास्कर इस मिशन में आपके साथ है।”
जैन की आंखों में हल्की नमी और चमक दोनों थीं—”तो अब जरूर होगा।”
सीन-7: सबसे अहम सवाल – कौन कर सकता है नेत्रदान?
राजेंद्र जैन ने स्पष्टता से बताया—
दो साल के बाद का कोई भी स्वस्थ व्यक्ति नेत्रदान कर सकता है।
मृत्यु के 6 से 8 घंटे के भीतर कॉर्निया निकाला जा सकता है।
संपूर्ण आंख नहीं, केवल कॉर्निया निकाला जाता है—चेहरा विकृत नहीं होता।
मोतियाबिंद, चश्मा, डायबिटीज, हाइपरटेंशन वाले भी नेत्रदान कर सकते हैं।
केवल एड्स, हैपेटाइटिस, रेबीज आदि संक्रामक रोगों वाले नहीं कर सकते।
नेत्रदान नि:शुल्क होता है—परिवार को कोई खर्च नहीं करना पड़ता।
टेलीफोन पर टीम घर पहुंच जाती है—कहीं ले जाने की जरूरत नहीं।
ऑनलाइन फॉर्म आसानी से भरा जा सकता है।
मृत्यु के समय मृतक की पलकों पर गीला रुमाल रखें, पंखा बंद करें।
“बस यही कहना चाहता हूं—ये आंखें किसी को रोशनी दे सकती हैं… उसे दुनिया दिखा सकती हैं… जीवन बदल सकती हैं।”
सीन- 8 : आई बैंक सोसायटी ऑफ राजस्थान की यात्रा की शुरुआत
जैन बताते हैं कि जस्टिस एनएन माथुर साहब आई बैंक सोसायटी ऑफ राजस्थान, जोधपुर चेप्टर के संरक्षक हैं। रतन लाहोटी ( IAS Retd ), समाज सेवी सुरेश राठी, शिक्षाविद डॉ. निर्मल गहलोत, श्रीचंद सिंघवी, पुखराज अग्रवाल, जगदीश सोनी, मनोज मेहता, राजेश सिंघवी सहित कई लोग सोसायटी से जुड़े हैं। जैन ने बताया कि राजस्थान सरकार के चीफ सेक्रेटरी स्व. मीठालाल मेहता ने 2002 में संस्था की स्थापना की। जोधपुर का कार्यभार हम देख रहे हैं। वर्तमान में रिटायर आईएएस बीएल शर्मा प्रदेश के प्रेसिडेंट हैं। रिटायर आईएएस ललित कोठारी प्रदेश सचिव हैं। कई रिटायर आईएएस, आईपीएस और आईएफएस जुड़े हुए हैं। राजीव दासोत, अशोक भंडारी, सुरेश मेहता, एसएस बिस्सा सहित कई हस्तियां जुड़ी हुई हैं।
सीन- 9 : क्या देश में नेत्रदान अनिवार्य हो सकता है?
हमने राजेंद्र जैन से सवाल किया-क्या नेत्रदान देश में सरकार अनिवार्य कर सकती है? तो वे बोले- यह लोकतंत्र हैं। यहां ऐसा संभव होता नहीं दिखता। फिर वे बताते हैं कि श्रीलंका में पहले ऐसा था। अभी भी वहां 97 प्रतिशत लोग डेथ पर नेत्रदान करते हैं। पूर्व राष्ट्रपति जयवर्धने की मृत्यु के उपरांत नेत्रदान हुए थे जो दो जापानी लोगों को लगाए गए थे। जैन से नेत्रदान विषय पर कई मुद्दों पर बात हुई। उन्होंने बताया कि नेत्रदान होने पर फर्स्ट बस से कॉर्निया जयपुर भिजवाते हैं। ब्लड ग्रुप भी लिया जाता है। स्क्रूटनी होती है। फिर नियमानुसार दो दृष्टिहीन को रोशनी मिलती है। जैन ने बताया कि वे सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक जेके बालानी का 97 साल की उम्र में नेत्रदान करवा चुके हैंं। अब तक 300 से ज्यादा कॉर्निया लगाए जा चुके हैं। 25 अगस्त से 8 सितंबर तक नेत्रदान पखवाड़ा मनाया जाएगा। हमारी 10 अगस्त को मीटिंग होगी, जिसमें रूपरेखा बनाएंगे। स्कूलों-कॉलेजों-विवि में निबंध और डिबेट आदि करवाए जाएंगे। शिक्षाविद डॉ. वंदना माथुर को जिम्मेदारी सौंपी गई है।
सीन 10 : बाहर आते ही टैक्सी में फिर एक गीत बजा—
“इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं…”
हमारी आंखें नम थीं… मगर अब स्पष्ट दिख रहा था—एक रास्ता, एक मिशन, एक उजास…क्या आप तैयार है अपनी आंखों की रौशनी से किसी का जीवन बदलने के लिए? संपर्क करें : 9314419846…ऑनलाइन संकल्प फॉर्म भरें और बनें दृष्टिदाता।
आइए मिलकर संकल्प लें—मरते वक्त केवल शरीर छूटे, पर आंखों से कोई और जीना शुरू कर दे…






