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Friday, May 1, 2026, 6:18 am

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गुरु गोविंद कला की कहानी : गुरु भी वहीं, गोविंद भी वही…संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला, साहित्य, गीत लेखन, कार्टूनिस्ट सहित कई क्षेत्रों में पूनम का चांद बन छाए रहे जोधपुर के आकाश पर

भीतरी शहर में बसती है जोधपुर की आत्मा…इस आत्मा में बसते हैं एक- गोविंद…जो गुरु के नाम से प्रसिद्ध थे। पूरा नाम था गुरु गोविंद कल्ला…। लोक संगीत माड शोध संस्थान के फाउंडर कल्ला का 26 नवंबर 2024 को देवलोक गमन होने के बाद आज उनकी यादें रह गई हैं। राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित और एडिटर इन चीफ राखी पुरोहित आज गुरु के पुत्र आनंदप्रकाश कल्ला से गुरु से गोविंद बनने के इतिहास को जानने उनके आवास पर पहुंचे और विस्तार से बातचीत की। संस्थान के वर्तमान अध्यक्ष आनंदप्रकाश कल्ला से राइजिंग भास्कर ने इंटरव्यू किया। यहां प्रस्तुत हैं संपादित अंश-
8302316074 diliprakhai@gmail.com
राइजिंग भास्कर : गुरु गोविंद कल्ला के बारे में कुछ बताएं?

आनंदप्रकाश : एमए, एमएड, आरडीएस, आईजीडी, साहित्य रत्न, संगीत प्रभाकर, राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। शिक्षाविद, भारतीय शास्त्रीय संगीत की ध्रुपद गायकी में तानसेन के गुरु बाबा हरिदास जी डागर घराना पुरस्कार से सम्मानित। चित्रकार, मूर्तिकार, साहित्यकार, राजस्थानी भाषा के कवि, गीतकार एवं संगीत निर्देशक, फिल्मों में कला निर्देशक एवं लाइट एंड साउंड तकनीक के जाने-माने निर्देशक तथा रंगकर्मी…। साथ में वैदिक श्याम गायन में राग व्याकरणाचार्य, रत शताब्दी की नई शास्त्रीय राग अटल विजयश्री के रचयिता, कार्टूनिस्ट, पत्रकार, कॉलम हथाई, मारवाड़ रत्न, कला पुरौधा एवं अन्य जानी-मानी सर्वांगीण प्रतिभा के धनी सकल फाग के गीतकार व संगीत निर्देशक एवं जागरूक युवा फोर्स के संरक्षक जिनकी देशभर में ग्लोबल गुरु गोविंद कल्ला नाम से पहचान थी।

राइजिंग भास्कर : अपने आप में संस्थान थे गुरु…उन्होंने किस संस्थान की नींव रखी और क्यों?

आनंदप्रकाश : गुरु गोविंद कल्ला ने लोक संगीत माड शोध संस्थान की 1980 में नींव रखी। माड गायकी को कहते हैं और स्थानीय भाषा में इसका अर्थ चावल का बचा हुआ पानी भी होता है। गुरु गोविंद कल्ला ने इस संस्था की नींव इसलिए रखी ताकि संगीत जगत से जुड़ी प्रतिभाओं को पहचाना जा सकें। उन्हें तराश कर आगे बढ़ाया जा सकें। साथ ही लोक कलाओं, लोक संस्कृति, लोक भजनों का संरक्षण हो सकें। माड को प्रचारित-प्रसारित करना। कार्यशालाओं के माध्यम से माड को घर-घर पहुंचाना और घर-घर से लोकजन तक माड पहुंचाना संस्था का उद्देश्य रहा। कल्ला का मानना था कि माड राग नहीं गायकी है जो अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से गाई जाती हैं।

राइजिंग भास्कर : गोविंद से गुरु बनने की यात्रा पर कुछ प्रकाश डालें?

आनंदप्रकाश : गोविंद कल्ला के लिए गुरु बनने की राह आसान नहीं थी। कल्ला प्रतिभा के धनी थे। जोधपुर जैसे शहर में उन्होंने अपनी प्रतिभा से सबका मन जीत लिया। 1975 से 1984 तक जब टेलीविजन संस्कृति का चलन नहीं था। गोविंद कल्ला ने गांधी मैदान में लाइट एंड साउंड के माध्यम से रामलीला का मंचन करवाया। स्टेडियम मैदान, उम्मेद स्टेडियम, गीता भवन में भी आयोजन करवाए। यहीं से उनकी प्रतिभा को मान्यता मिली जो आगे जाकर मील के पत्थर में बदल गई। जैसलमेर में सम के धोरों में पर्यटन विभाग की ओर से 80-90 के दशक में लाइट एंड साउंड से मरु मेला में हेमू हीरा जो प्रेम गाथा थी, उसका दो बार मंचन हुआ।

(देवलोकगमन से 10 दिन पहले का वीडियो।)
राइजिंग भास्कर : गुरु गोविंद कल्ला जोधपुर का स्थापना दिवस तिथियों के अनुसार क्यों मनाते थे?

आनंदप्रकाश : सारा शहर और देश जोधपुर का स्थापना दिवस 12 मई को मनाता है। लेकिन गुरु गोविंद कल्ला ऐसी शख्सियत थी जो जोधपुर का स्थापना दिवस तिथियों के अनुसार हर साल निर्जला एकादशी को ही मनाते थे। उनका मानना था कि तिथियों के अनुसार ही स्थापना दिवस मनाना उचित होता है। यह हमारी संस्कृति का प्रतीक है। 525वें जोधपुर स्थापना दिवस से लेकर अब तक 567वें स्थापना दिवस को तिथियों के अनुसार मनाया गया। इस दिन गुरु गोविंद कल्ला जोधपुर की अलग-अलग क्षेत्र की प्रतिभाओं को सम्मानित करते थे। जैसे बृजेश एवं जोधपुरी कोट बनाने वालों का सम्मान करना। सोने के परंपरागत जेवर बनाने वालों का सम्मान। परंपरागत मिठाई बनाने वाले कारीगरों एवं दुकानदारों का सम्मान। पत्थर का काम करने वालों का सम्मान। सौ-सौ साल पुरानी स्कूलों जैसे पुष्टिकर स्कूल, चौपासनी स्कूल, सुमेर स्कूल, प्रताप स्कूल…ऐसी स्कूलों के संस्था प्रधानों को सम्मानित करने की परंपरा गुरु गोविंद कल्ला ने ही शुरू की। वे बंधेज कारीगरों, कुंभकारों, 50 से अधिक बार रक्तदान करने वाले कपल, धींगा गवर में धींगाणा करने वाले वाली तीजणियों का भी सम्मान करवाते थे।

राइजिंग भास्कर : गुरु गोविंद कल्ला के हथाई कॉलम के बारे में बताएं?

आनंदप्रकाश : गुरु गोविंद कल्ला उस जमाने में 1970 में समाचार पत्र में हथाई कॉलम लिखते थे। हथाई परंपरा को पंख लगाने वाले गुरु गोविंद कल्ला ही थे। हथाई को उन्होंने घर-घर पहुंचाया। हथाई की परंपरा भीतरी शहर में आज भी जिंदा है। वे हथाई कल्चर के पक्षधर थे। हथाई पर कई बार माहौल गर्म हो जाता था। इतना कि बात हाथापाई पर आ जाती तो गुरु का एक ही जुमला था हथाई है, हाथापाई नहीं। यहां खूब हथाई करो, लेकिन हाथापाई नहीं होनी चाहिए। हथाई के बारे में वे कहते थे- आ हथाई है, अठै हाथापाई नहीं… बात मूंडे री मूंडे सूं और खबर टूंडे सूं…। वे हथाई पर पहुंचते तो सुबह 4 बजे तक हथाई चलती रहती।

राइजिंग भास्कर : गुरु के शिष्य उनके बारे में क्या सोचते हैं?

आनंदप्रकाश : गुरु गोविंद कल्ला की एक शिष्य जो अंडमान निकोबार में एक लेक्चरर है। ओम ज्योति नाम की यह शिष्या गुरु गोविंद कल्ला पर पीएचडी कर चुकी हैं। कई अन्य शिष्य गुरु गोविंद कल्ला के विविध पक्षों पर आज भी शोध कर रहे हैं। गुरु कल्ला अपने आप में एक संस्थान थे। ऐसी आत्मा विरली ही होती है जो शरीर धारण कर पृथ्वी पर आती है और सबका मन जीत कर दुनिया से प्रस्थान कर जाती हैं। वे अजातशत्रु थे। उनके कोई दुश्मन नहीं थे। उन्होंने जोधपुर में प्रेम और स्नेह का संदेश दिया और संगीत को ईश्वर मानने वाले गुरु कल्ला ने संगीत में ईश्वर को तलाशा।

राइजिंग भास्कर : हमें पता चला है कि गुरु ने एक नई राग की खोज की थी, जरा बताएं?

आनंदप्रकाश : दरअसल कारगिल विजय पर कई गीत लिखे गए। कई रागें बनाई गई। उसी में से एक नई राग उत्पन हुई। इस राग की खोज गुरु गोविंद कल्ला ने ही की। इस राग काे नाम दिया- राग अटल विजयश्री। यह अनूठी खोज थी। आज भी इस राग में कई गीत गाए जा रहे हैं और इस पर शोध किया जा रहा है। राजस्थानी कवि के साथ सर्व प्रथम 1960 में राजस्थानी ग़ज़ल के रचयिता भी थे।

राइजिंग भास्कर : नई प्रतिभाओं को गढ़ने और बढ़ने में गुरु के योगदान पर संक्षेप में बताएं?

आनंदप्रकाश : आज कई कलाकार जो विश्व स्तर पर छाए हुए हैं उनमें कई गुरु गोविंद कल्ला की देन हैं। खुशबू कुंभट, महेंद्र सिंह पंवार सहित कई कलाकार आज भी कल्ला को अपना गुरु मानते हैं। वो जमाना भी आया जब युवा कलाकार 24 और 48 घंटे लगातार गायन में रिकॉर्ड बनाते रहे। इसमें गुरु गोविंद कल्ला उनका हौसला बढ़ाते। कई प्रतिभाएं देश भर में फैली हुई है। विदेशों में भी कई कलाकार गुरु के नाम को आगे बढ़ा रहे हैं। गुरु गोविंद कल्ला ने सकल फाग, सोहन फाग व कई गाने लिखे। पुष्करणा गौरव माईदास थानवी भी उनके लिखे श्लील गीत गाते थे। उन्होंने मंडोर में लगी मूर्तियों का भी संरक्षण किया।

राइजिंग भास्कर : धींगा गवर को लेकर गुरु गोविंद कल्ला ने तीजणियों को कैसे मंच दिया?

आनंदप्रकाश : धींगा गवर  के अवसर पर कार्यक्रम करते थे। वे अपनी नई पहचान रखते थे। विश्व में अपनी अलग पहचान रखने वाला जोधपुर का धींगा गवर माता का धींगाणा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। गुरु गोविंद कल्ला पिछले 40 वर्षों से हनुमान चौक, जालप मोहल्ला में गवर माता विराजमान करते रहे। जहां जागरूक युवा फोर्स का पूरा सहयोग रहता है और परंपरागत तरीके से तीजणियाें को गाने के लिए मंच प्रदान करते हैं। इसे मीडिया जब बेंतमार गवर के रूप में पहचान देने लगा, तब उनका कहना था कि यह बेंत नहीं बल्कि दुलार की छड़ी है और इसे माता के आशीर्वाद के रूप में लिया जाता है। वर्तमान में उसका प्रभाव देखने को मिला बड़े स्टेज बंद हो रहे हैं। तीजणियों को पूजा करने के रूप में स्टेज मिलने लगे हैं जो संस्कृति का संरक्षण कर रहे हैं।

राइजिंग भास्कर : अब संस्थान की विरासत को कौन आगे बढ़ा रहा है?

आनंदप्रकाश : मैं यानी आनंदप्रकाश कल्ला वर्तमान में लोक संगीत माड शोध संस्थान का अध्यक्ष हूं। सुमनेश व्यास सचिव और संतोष कुमार कल्ला कोषाध्यक्ष हैं। हम गुरु गोविंद कल्ला के सपनों को साकार करने का प्रयास कर रहे हैं। गत 6 जून को निर्जला एकादशी पर आयोजित जोधपुर स्थापना दिवस समारोह में हमने 21 संगीत क्षेत्र की प्रतिभाओं को गुरु गोविंद संगीत सेवा श्री सम्मान से नवाजा था। यही नहीं भक्ति संगीत गायन क्षेत्र की प्रसिद्ध हस्ती सरिता जोशी को भी हमने सम्मानित किया था। अब हमारा उद्देश्य मानव मात्र के कल्याण के साथ गुरु गोविंद कल्ला के कार्यों को आगे बढ़ाना है। हमें शहरवासियों और हर समुदाय का सहयोग मिल रहा है।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor