Explore

Search

Sunday, March 15, 2026, 12:56 pm

Sunday, March 15, 2026, 12:56 pm

LATEST NEWS
Lifestyle

पतासलू की विजय — तिरंगे का गौरव : 14 हजार फीट की ऊंचाई, 8 दिव्यांग बच्चे और अक्षय गौड़ का नेतृत्व…यात्रा अभी जारी है…

हौसलों से हाशिए पर आ जाते हैं पर्वत : अक्षय गौड़

17 अक्टूबर से 23 अक्टूबर 2023 के वे यादगार पल अक्षय की जुबानी

दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर

8302316074 diliprakhai@gmail.com

उद्घाटन दृश्य

(कैमरा धीरे-धीरे बादलों को चीरता हुआ हिमाचल प्रदेश राज्य की मनाली की ऊंची चोटी पर घूमता है। यहां 14 हजार फीट की ऊंचाई पर है पतासलू चोटी। ठंडी हवाएं गूंज रही हैं। स्क्रीन पर तारीख उभरती है : 17 अक्टूबर 2023। बैकग्राउंड में वॉयसओवर शुरू होता है। यह वही चोटी है जहां पर 10 दिव्यांग बच्चे अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोही और बिजनेसमैन अक्षय गौड़ के निर्देशन में 101 फीट तिरंगा फहराने के मिशन पर निकले हैं। आप भी अनुभव करें पर्वत की चोटी पर 101 फीट तिरंगा फहराने के उस गौरवमयी पल को।)

वॉयसओवर (गंभीर और प्रेरणादायी स्वर में) : “हर पर्वत की ऊँचाई चुनौती नहीं होती… कभी-कभी वो किसी के साहस की परीक्षा बन जाती है। और जब दिव्यांग बच्चे अपने सपनों के सहारे 14,000 फीट की ऊँचाई पर कदम रखते हैं… तो यह सिर्फ एक चढ़ाई नहीं, बल्कि इरादों की पराकाष्ठा होती है।”

दृश्य 1 : यात्रा की शुरुआत

(स्टेशन का दृश्य। धुंधली सुबह। प्लेटफार्म पर  10 दिव्यांग बच्चे, बैशाखियां और व्हीलचेयर। पृष्ठभूमि में ट्रेन की सीटी गूंजती है।)

कैमरा फोकस: अक्षय गौड़ बच्चों को व्यवस्थित कर रहे हैं। हर बच्चे के हाथ में छोटा-सा बैग, आंखों में चमक और दिल में उत्साह।

अक्षय (मुस्कुराते हुए): “तैयार हो ना सब? यह सफर आसान नहीं होगा… लेकिन याद रखना—हमारा सपना बहुत बड़ा है।”

(बच्चे उत्साहित स्वर में चिल्लाते हैं: “भारत माता की जय!”)

वॉयसओवर: “दिल्ली तक की यात्रा ट्रेन से…रिजर्वेशन, ताकि बच्चों की सुविधा में कोई कमी न रहे। यह यात्रा केवल मंज़िल तक पहुंचने की नहीं थी… यह आत्मविश्वास जगाने की थी।” फिर मनाली अगला लक्ष्य।

दृश्य 2 : दिल्ली से मनाली का सफर

(दृश्य बदलता है। रात का समय। वॉल्वो बस चमचमाती सड़कों से गुजरती है। बच्चे खिड़की से झांकते हैं। एक बच्चा बर्फीली चोटियों की झलक देखकर उत्साहित हो जाता है।)

बच्चा 1 (चमकती आंखों से): “सर… क्या सच में हम वहां झंडा फहराएंगे?”

अक्षय (गंभीर लेकिन प्रेरणादायी स्वर में): “हां… बिल्कुल। और जब तिरंगा लहराएगा, तो पूरी दुनिया देखेगी कि दिव्यांगता इरादों को नहीं रोक सकती।”

(कैमरा धीरे-धीरे बच्चों की आंखों में चमकता आत्मविश्वास कैद करता है।)

दृश्य 3 : मनाली से पतासलू की ओर

(सुबह। बर्फ से ढंकी पहाड़ियां। मनाली का अद्भुत नज़ारा। बस रुकती है। बच्चे बैशाखियों और सहारे से उतरते हैं। सांसों से भाप निकल रही है। चारों ओर ठंडी हवा।)

वॉयसओवर : “यहां से शुरू हुई असली परीक्षा। पतासलू पर्वत की ओर यात्रा। 14 हजार फीट ऊंचाई… जहां ऑक्सीजन कम थी, रास्ते पथरीले थे और हर कदम भारी।”

(कैमरा बच्चों के संघर्ष को स्लो-मोशन में दिखाता है: कोई बैशाखी से संतुलन बना रहा है, कोई ठंडी हवा से कांप रहा है, कोई गिरकर फिर उठ खड़ा होता है।)

बच्चा 2 (थककर):
“सर… सांस नहीं ले पा रहा… बहुत मुश्किल है।”

(अक्षय उसका हाथ पकड़ते हैं।)

अक्षय:
“मुश्किल है… लेकिन नामुमकिन नहीं। रुकना मत। हर कदम हमें तिरंगे के करीब ले जा रहा है।”

दृश्य 4 : वापसी और दृढ़ता

(ऊंचाई बढ़ती जाती है। हवा पतली। दो बच्चे सांस लेने की समस्या के कारण रुक जाते हैं। उन्हें नीचे लौटने का सुझाव देते हैं।)

बच्चा 3 (आंखों में आंसू):
“सर… मैं आगे नहीं जा पाऊंगा।”

(अक्षय बच्चे को गले लगाते हैं।)

अक्षय:
“तुम्हारा इरादा ही हमारी जीत है। वापस जाना हार नहीं… बल्कि समझदारी है। तुमने जितना किया… उतना ही देश को गर्व दिलाया।”

(वॉयसओवर:) “दो बच्चे लौटे… लेकिन आठ बच्चे और अक्षय आगे बढ़ते रहे। हर सांस भारी… मगर हौसले उससे भी भारी।”

दृश्य 5 : पर्वत पर चढ़ाई का संघर्ष

(कैमरा ऊंचाई से दिखाता है। बच्चों के चेहरे लाल हो चुके हैं, सांस तेज़ है। ठंडी हवाएं कान फाड़ रही हैं।)

(स्लो-मोशन में एक बच्चा बैशाखी से फिसलता है लेकिन तुरंत संतुलन बना लेता है। दूसरा बच्चा बर्फ पर बैठ जाता है, फिर साथियों के हौसले से खड़ा हो जाता है।)

बच्चा 4 (हांफते हुए) : “सर… अब और नहीं…”

अक्षय (जोश भरते हुए) : “बस थोड़ी और दूरी… और वहां हमारी मंज़िल है। याद रखो—आज तुम सिर्फ अपने लिए नहीं… पूरे भारत के लिए चढ़ रहे हो।”

(पृष्ठभूमि में प्रेरणादायक संगीत। कैमरा बच्चों की आंखों में चमक दिखाता है। वे फिर चल पड़ते हैं।)

दृश्य 6 : शिखर पर पहुंचना और 101 फीट तिरंगा फहराना

(कैमरा धीरे-धीरे ऊपर की ओर जाता है। बर्फीली चोटी। 14,000 फीट ऊंचाई। बच्चे और अक्षय पहुंचते हैं। सभी थके हुए, लेकिन चेहरे पर गर्व की चमक।)

वॉयसओवर (भावुक स्वर में) : “और आखिरकार… 14 हजार फीट की ऊंचाई पर… उन्होंने इतिहास रच दिया।”

(अक्षय और बच्चे मिलकर 40 किलो वजनी, 101 फीट लंबा तिरंगा खोलते हैं। तेज़ हवाएं। झंडा उड़ाना मुश्किल हो रहा है। बच्चे ठंड से कांप रहे हैं, लेकिन उनके हाथ मजबूत हैं।)

कैमरा फोकस: बच्चे झंडे को पकड़ने में संघर्ष कर रहे हैं। झंडा हवा में लहराता है। चेहरे पर आंसू—लेकिन गर्व के।

बच्चा 5 (जोश में) : “भारत माता की जय!!!”

(सभी मिलकर राष्ट्रगान गाते हैं और जोर से नारा लगाते हैं।)

अक्षय (गला भरकर):
“देखो… हमारा तिरंगा… दुनिया की सबसे ऊंची पहाड़ियों पर लहरा रहा है।”

दृश्य 7 : गौरव का क्षण

(कैमरा तिरंगे को ऊपर से दिखाता है। नीचे बादल। तिरंगा हवा में गर्व से लहरा रहा है। पृष्ठभूमि में राष्ट्रगान की धुन बजती है। बच्चे एक-दूसरे को गले लगाते हैं। किसी की आंखों में आंसू हैं, कोई जोर से मुस्कुरा रहा है।)

वॉयसओवर: “वो केवल पर्वत नहीं था… वो इरादों का प्रतीक था। दिव्यांग बच्चों ने साबित कर दिया—शरीर की कमजोरी मन की उड़ान को कभी रोक नहीं सकती।”

दृश्य 8 : वापसी और सीख

(वापसी का दृश्य। बच्चे थके लेकिन गर्वित। जोधपुर पहुंचने पर रेलवे स्टेशन और विकलांग शिक्षण संस्थान में दिव्यांग बच्चों का जोरदार स्वागत होता है। लोग मालाएं और तिलक लगाकर अभिनंदन करते हैं। कैमरा बच्चों के चेहरे पर गौरव दिखाता है।)

अक्षय (बच्चों से) : “तुम सबने केवल एक पर्वत नहीं फतह किया… तुमने करोड़ों दिल जीत लिए।” (बच्चे मुस्कुराते हैं। कैमरा धीरे-धीरे तिरंगे पर जाता है, जो अब भी ऊंचाई पर लहरा रहा है।)

और अब कहानी अक्षय गौड़ की : 

मेरे आदर्श मेरे माता-पिता, जिनकी प्रेरणा और आशीर्वाद से सफल पर्वतारोही बना। उन्होंने कहा था- बेटा कितनी ही ऊंचाई छू लो कदम हमेशा जमीन पर हो

जोधपुर। राइजिंग भास्कर डॉट कॉम के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित और एडिटर इन चीफ राखी पुरोहित की 13 साल से फाइनेंस और टूर एंड ट्रेवल्स का बिजनेस करने वाले अक्षय से उनके आवास पर मुलाकात हुई। बड़ी ही आत्मीय मुलाकात थी। उन्होंने शिकंजी और नाश्ते के साथ ही अपने बारे में बताना शुरू किया। वे बोले मूलत: मैं बिजनेसमैन हूं, लेकिन लोग मुझे अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोही के रूप में जानते हैं। मैंने पर्वतारोही बनने का सपना अपने स्व. पिता हीरालाल गौड़ और माता स्व. स्नेहलता शर्मा की प्रेरणा और आशीर्वाद से देखा। उन्होंने कहा था बेटा- पर्वतों की चाहे लाख ऊंचाइयां छू लो पर कदम हमेशा जमीन पर ही रहने चाहिए। ये आज की युवा पीढ़ी के लिए भी एक संदेश है जो सपने पूरे होने पर संस्कार भूल जाते हैं।

1-कुछ अपने बारे में बताएं?

-मेरे फूफाजी श्यामसुंदर शर्मा जलदाय विभाग में एक्सईएन थे। वे विवेकानंद आश्रम से जुड़े थे और लोगों को याद सिखाते थे। जब वे घर आते थे तो हम बच्चों को भी योग और व्यायाम करवाते थे। बस तभी से शारीरिक रूप से फिट होने का मंत्र उनसे मिला। बाद में मैंने युवा काल में बुक्स में पढ़कर और कुछ इंटरनेट पर पढ़कर पर्वतारोही बनने का सपना देखा।

2-पर्वतारोही का सपना सच करने के लिए क्या किया?

-कायलाना के छोटे-छोटे पहाड़ चढ़े। साइक्लिंग और ट्रैकिंग की। धीरे-धीरे योगा, रनिग, स्ट्रेचिंग, साइक्लिंग, स्वीमिंग और एक्सरसाइज से अपनी स्टेमिना बढ़ाई। साथ ही साथ सफल पर्वतारोही बनने के लिए स्टडी जारी रखी। जयपुर में अपने मित्र  की फाेरटिन माउंटेन एडवंचर्स कंपनी के माध्यम से ट्रेकिंग और क्लाइमिंग की ट्रेनिंग भी ली।

3-पर्वतारोही के संदर्भ में अपनी कुछ उपलब्धियों के बारे में बताएं?

-आठ दिव्यांग बच्चों के साथ पतासलू पर 101 फीट तिरंगा फहराने की कहानी मैं बता चुका हूं। मैंने गत जून को लेह-लद्दाख के बारालाया पास की 16000 फीट की ऊंचाई पर चोटी पर तिरंगा लहराया था। इस दौरान खूब बर्फबारी हुई थी और बारिश भी हुई थी। इससे मुझे कुछ परेशानी हुई। मुझे बार-बार कर्पूर की गोलियां लेनी पड़ी। पर मैं बाधाओं से घबराने वाला नहीं था। कई बार आत्मविश्वास की परीक्षा हुई। साहसी लोगों की असली परीक्षा ऐसी ही घड़ी में होती है। माता-पिता के आशीर्वाद से मैं सफल रहा और आखिर मैंने यहां पर भी तिरंगा फहराया।

4-बारालाया पास की चोटी पर तिरंगा फहराने के कुछ यादगार पलाें के बारे में बताएं?

-एंटी करपेप्शन ब्यूरो (एसीबी) के पूर्व डीजीपी श्री रविप्रकाश मेहरड़ा ने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया। सही मायने में वे मेरे मेंटोर हैं। मेहरड़ाजी ने मुझे अपने घर पर सम्मानित किया और तिरंगा और सर्टिफिकेट देकर मेरा उत्साह बढ़ाया। इसी तरह मानवाधिकार आयोग के कमिश्नर श्री किशन सहाय ने पुलिस हैड क्वार्टर में मेरा स्वागत किया और सर्टिफिकेट भेंट कर उत्साह बढ़ाया।

5-अब भविष्य का क्या प्लान है?

-मैं सितंबर-अक्टूबर में अफ्रीका महाद्वीप में कीनिया और तंजानिया के बॉर्डर पर स्थित किलीमंझारो ज्वालामुखी पर चढ़कर तिरंगा फहराने जाऊंगा। इसकी मेरी तैयारी चल रही है। इसके बाद एवरेस्ट के बेस कैंप यानी 5648 मीटर की ऊंचाई पर तिरंगा फहराने जाऊंगा। मेरी इच्छा है कि महाद्वीप के सारे माउंटेन पर तिरंगा लहराऊं।

6-बिजनेस और पर्वतारोहण के अलावा क्या गतिविधियां रहती हैं?

-समाजसेवा में मेरी रुचि है। जितना हो सके समाज के पीड़ित लोगों की मदद करने का प्रयास करता हूं। मुझे जताने से ज्यादा करने में विश्वास है। मैं अन्य समाजसेवियों के माध्यम से भी सेवा कार्य करता रहता हूं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor