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Thursday, April 30, 2026, 6:29 pm

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एनडी निंबावत ”सागर” की कविता

कवि : एनडी निंबावत ”सागर”

तू अकेले होने का रंज न कर

तू अकेले होने का रंज न कर
अपनी गति से अनवरत चल

कोई बात नहीं मिल रही ठोकरें
जरा इन ठोकरों से संभल
तू अकेले होने का रंज न कर

जरा सूरज चांद को देख
वो अकेले उगते, अकेले रहे ढल
तू अकेले होने का रंज न कर

धरती अकेली, है आकाश अकेला
बदौलत इनकी हम सब रहे पल
तू अकेले होने का रंज न कर

कब दिया किसी ने किसी का साथ
इस भ्रम से तू बाहर निकल
तू अकेले होने का रंज न कर

बस अपने साथ रख हौंसला
देखना, मुसीबतें सब जाएंगी टल
तू अकेले होने का रंज न कर

नसीब में जो होना है होकर रहेगा
इंतज़ार कर, वो आज नहीं तो कल
तू अकेले होने का रंज न कर

कोई तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता
मिलता है केवल अपने कर्मो का फल
तू अकेले होने का रंज न कर

एडवोकेट एन डी निम्बावत “सागर”
जोधपुर (राज.)

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor