कवि : एनडी निंबावत ”सागर”
तू अकेले होने का रंज न कर
तू अकेले होने का रंज न कर
अपनी गति से अनवरत चल
कोई बात नहीं मिल रही ठोकरें
जरा इन ठोकरों से संभल
तू अकेले होने का रंज न कर
जरा सूरज चांद को देख
वो अकेले उगते, अकेले रहे ढल
तू अकेले होने का रंज न कर
धरती अकेली, है आकाश अकेला
बदौलत इनकी हम सब रहे पल
तू अकेले होने का रंज न कर
कब दिया किसी ने किसी का साथ
इस भ्रम से तू बाहर निकल
तू अकेले होने का रंज न कर
बस अपने साथ रख हौंसला
देखना, मुसीबतें सब जाएंगी टल
तू अकेले होने का रंज न कर
नसीब में जो होना है होकर रहेगा
इंतज़ार कर, वो आज नहीं तो कल
तू अकेले होने का रंज न कर
कोई तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता
मिलता है केवल अपने कर्मो का फल
तू अकेले होने का रंज न कर
एडवोकेट एन डी निम्बावत “सागर”
जोधपुर (राज.)








