–करुणा के भाव, क्रंदन करते लोगों की पुचकार, जरूरतमंद की आवश्यकतापूर्ति का मन में संकल्प, गरीब बच्चों और दिव्यांगों के चेहरों की खुशी के लिए तैयार रहना, बुजुर्गों के बीच टाइम व्यतीत करना और उन्हें स्नेह की थपकी देना…समाजसेवा का उभरता नाम मंजू गहलोत
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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समाज में अक्सर यह धारणा बनी रहती है कि सेवा कार्य के लिए किसी बड़ी संस्था, एनजीओ या ट्रस्ट का होना आवश्यक है। लेकिन इस सोच को अपने जीवन से गलत साबित किया है मंजू गहलोत ने। मंजू गहलोत का नाम अपने आप में एक संस्था है। वे यह साबित करती हैं कि यदि हृदय में करुणा, मन में सेवा का भाव और जीवन में दूसरों को सहारा देने की लगन हो, तो व्यक्ति अकेला होकर भी समाज में अनगिनत परिवर्तन ला सकता है।
सेवा का भाव : जीवन का अभिन्न हिस्सा
मंजू गहलोत का कहना है कि उनके लिए समाजसेवा केवल कोई कार्य नहीं, बल्कि उनका शौक है। इसे वे अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती हैं। उनके अनुसार, इंसान को केवल अपने परिवार की सीमाओं तक नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने आसपास के वंचित, जरूरतमंद और पीड़ित वर्ग की जिम्मेदारी भी उठानी चाहिए।
वे कहती हैं—
“मेरी कोई संस्था नहीं है, मैं किसी एनजीओ से नहीं जुड़ी हूँ। मैं बस जहाँ भी जरूरत दिखती है, वहाँ अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करती हूँ।”
बुजुर्गों की सेवा : वृद्धाश्रम में मुस्कान
हमारे समाज में सबसे अधिक उपेक्षित वर्ग अक्सर बुजुर्ग होते हैं। कई बार उन्हें अपनों का साथ नहीं मिलता और वे वृद्धाश्रम में जीवन व्यतीत करने को विवश हो जाते हैं। मंजू गहलोत हर महीने वृद्धाश्रम में भोजन की व्यवस्था करती हैं।
सिर्फ भोजन ही नहीं, बल्कि उनके मनोरंजन और मानसिक संतुलन के लिए भी समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती हैं। उनके लिए सेवा का अर्थ केवल शरीर को भोजन देना नहीं, बल्कि मन को प्रसन्नता और आत्मा को सुकून देना है। बुजुर्गों के चेहरे पर आई मुस्कान ही उनकी सेवा का सबसे बड़ा पुरस्कार है।
अनाथ और वंचित बच्चों के लिए समर्पण
मंजू गहलोत हर महीने अनाथालयों, कच्ची बस्तियों और स्लम क्षेत्रों में जाकर वहाँ के बच्चों और जरूरतमंदों को सूखी राशन सामग्री, उपयोग की वस्तुएँ और त्योहारी सामान उपलब्ध कराती हैं।
वे यह मानती हैं कि इन बच्चों को केवल दान ही नहीं, बल्कि स्नेह और अपनापन की आवश्यकता होती है। इसी कारण वे अपने परिवार के किसी भी त्यौहार, बच्चे का जन्मदिन या यहाँ तक कि अपना जन्मदिन भी इन बच्चों के बीच मनाती हैं।
उनके अनुसार,
“त्योहार का सच्चा आनंद तब है जब कोई अनाथ बच्चा भी मिठाई खाकर मुस्कुराए, कोई गरीब माँ अपने बच्चों को नए कपड़े पहनाकर गर्व से भर जाए।”
कुष्ठ और अपना घर आश्रम की सेवा
सामाजिक सेवा केवल आसान कार्य नहीं है। गरीबों और अनाथ बच्चों तक तो बहुत लोग पहुँचते हैं, परंतु कुष्ठ रोगियों और बेसहारा बुजुर्गों तक पहुँचना एक असाधारण साहस और करुणा का काम है।
मंजू गहलोत नियमित रूप से कुष्ठ आश्रम और अपना घर आश्रम जाती हैं। वहाँ जरूरत की वस्तुएँ उपलब्ध कराती हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि वे समय निकालकर इन लोगों के साथ बैठती हैं, उनसे बातें करती हैं। वे उन्हें यह एहसास कराती हैं कि वे समाज से कटे हुए नहीं हैं।
हर अवसर पर सेवा
मंजू का जीवन ऐसा है कि उन्होंने सेवा को हर अवसर से जोड़ दिया है।
- परिवार में बच्चों का जन्मदिन हो,
- उनका खुद का जन्मदिन हो,
- कोई त्यौहार या पर्व हो—
इन सभी अवसरों पर वे गरीब और वंचित वर्ग के साथ आनंद बाँटती हैं।
उनके लिए पूजा-पाठ का अर्थ केवल मंदिर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि ईश्वर की सच्ची पूजा जरूरतमंद की सेवा में है।
संस्कृति और परंपरा के प्रति लगाव
मंजू गहलोत केवल सामाजिक सेवा तक ही सीमित नहीं हैं। वे मानती हैं कि समाज को जड़ों से जोड़े रखने के लिए संस्कृति और परंपरा का संरक्षण जरूरी है।
इसी कारण वे समय-समय पर राजस्थान की लोक-संस्कृति से जुड़े तीज-त्योहार, पारंपरिक उत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रम निशुल्क आयोजित करती हैं। उनका उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ना है।
बिना संस्था भी सेवा संभव
मंजू गहलोत का जीवन सबसे बड़ा उदाहरण है कि समाजसेवा के लिए किसी संस्था या एनजीओ की आवश्यकता नहीं होती।
- वे स्वयं धन इकट्ठा करती हैं।
- स्वयं जाकर जरूरतमंदों तक पहुँचती हैं।
- स्वयं आयोजन करती हैं।
उनके अनुसार, हर व्यक्ति अपने आप में एक संस्था है। यदि मन में निस्वार्थ सेवा का भाव हो तो कोई भी अकेला इंसान भी समाज में क्रांति ला सकता है।
सेवा का मकसद
मंजू का कहना है—
“मेरी सेवा का मकसद केवल इतना है कि जिनके चेहरे पर तकलीफ, बेबसी और भूख की रेखाएँ हैं, वहाँ मैं थोड़ी मुस्कान पहुँचा सकूँ। यही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है। यही मेरे जीवन को सार्थक बनाती है।”
उनकी दृष्टि में सेवा किसी दिखावे या प्रचार के लिए नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष के लिए होती है।
समाज के लिए संदेश
मंजू गहलोत का जीवन हमें यह सिखाता है कि—
- यदि मन में सेवा हो तो संसाधन बाधा नहीं बनते।
- यदि हृदय में करुणा हो तो बड़े-बड़े आयोजन भी अकेला इंसान कर सकता है।
- समाज में बदलाव के लिए संस्था का नाम नहीं, बल्कि इंसान का कर्म मायने रखता है।
सेवा ही परम धर्म : जब तक सांस है सेवा जारी रहेगी
मंजू गहलोत वास्तव में समाज के उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में से हैं, जिन्होंने यह साबित किया कि सेवा ही परम धर्म है।
वे कहती हैं—
“मैं कोई संस्था नहीं हूँ, लेकिन मेरी आत्मा सेवा है, मेरा जीवन सेवा है। जब तक साँस है, तब तक सेवा जारी रहेगी।”
उनकी जीवन यात्रा यह संदेश देती है कि—
-हर इंसान अपने आप में एक संस्थान है।
-हर दिल में करुणा हो, तो पूरा समाज बदल सकता है।
-और हर मुस्कुराता चेहरा ही सच्चे जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार है।
मंजू गहलोत—एक नाम, एक विचार, एक प्रेरणा, और स्वयं में एक संपूर्ण संस्थान।









